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हिमालय की जैव विविधता बेहद समृद्ध, मानव सभ्यता की खातिर संरक्षण अनिवार्य: प्रो. एसपी सिंह

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर की ओर से विकसित भारत 2047 के तहत सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजीएस) पर दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी, उत्तराखंड के पूर्व कुलपति एवं प्रख्यात पर्यावरणविद प्रो. एसपी सिंह ने हिमालय को ‘थर्ड पोल’ की संज्ञा देते हुए कहा कि हिमालय केवल भारत ही नहीं, बल्कि चीन, म्यांमार और अन्य एशियाई देशों के लिए भी जल, जैव विविधता और जलवायु संतुलन का प्रमुख स्रोत है। हिमालय से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों के जीवन, कृषि, पेयजल और उद्योगों को सहारा देती हैं, क्योंकि यहां ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद सबसे अधिक बर्फ और हिम भंडार मौजूद है।

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्र में बर्फ का तेजी से पिघलना और जलवायु परिवर्तन गंभीर खतरे का संकेत है। यदि यह प्रक्रिया इसी तरह जारी रही, तो सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदी प्रणालियों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, जिससे कृषि, जल सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता संकट में आ सकती है। उन्होंने कहा कि हिमालय की जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है और इसका संरक्षण मानव सभ्यता के भविष्य के लिए अनिवार्य है।

प्रो. सिंह ने नदी सर्वेक्षण, कृषि उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और संसाधनों के सतत उपयोग को भी अत्यंत आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र को समस्या नहीं, बल्कि समाधान का हिस्सा बनाना होगा। इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरणीय जागरूकता और सामुदायिक सहभागिता जरूरी है।

वे तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर द्वारा ‘विकसित भारत 2047’ के अंतर्गत सतत विकास लक्ष्यों पर आयोजित दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि सहित अन्य विशिष्ट अतिथियों ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर की। इस अवसर पर कॉन्फ्रेंस की कार्यवाही (प्रोसिडिंग) का विमोचन भी किया गया।

सम्मेलन में राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. गोपाल कृष्ण, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, अल्मोड़ा के वैज्ञानिक डॉ. केएस कानवाल, टीएमयू की डीन एकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन और एग्रीकल्चर कॉलेज के डीन प्रो. प्रवीन कुमार जैन समेत कई शिक्षाविद और शोधकर्ता उपस्थित रहे। संचालन डॉ. नेहा आनंद ने किया।

प्रो. सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि आज कृषि, पर्यावरण और जल संसाधनों के सामने संतुलित विकास की चुनौती सबसे बड़ी है। सतत विकास का अर्थ केवल आर्थिक उन्नति नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों और आने वाली पीढ़ियों के हितों को ध्यान में रखते हुए विकास करना है। उन्होंने जल संकट, मृदा क्षरण, प्रदूषण और कृषि अपशिष्ट प्रबंधन को भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याएं बताया और टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने पर जोर दिया।

उन्होंने ‘कार्बन जस्टिस’ की अवधारणा पर भी बल देते हुए कहा कि विकास और उत्सर्जन का भार सभी पर समान रूप से होना चाहिए, ताकि पर्यावरणीय न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

डीन एकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन ने ‘इंस्टीट्यूशंस इनोवेशन काउंसिल’ (आईआईसी) की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह मंच छात्रों में नवाचार, उद्यमिता और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करता है। उन्होंने ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स 2023’ के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि मोटे अनाज जलवायु परिवर्तन के दौर में पोषण और टिकाऊ खेती का मजबूत विकल्प हैं।

एग्रीकल्चर कॉलेज के डीन प्रो. प्रवीन कुमार जैन ने कहा कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को साकार करने के लिए प्राकृतिक खेती, मृदा संरक्षण, जल प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा।

कॉन्फ्रेंस सचिव प्रो. गणेश दत्त भट्ट ने कहा कि यह आयोजन केवल अकादमिक चर्चा नहीं, बल्कि सतत विकास को व्यवहार में उतारने की दिशा में एक ठोस पहल है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शोधार्थी, प्राध्यापक और बीएससी व एमएससी एग्रीकल्चर के छात्र उपस्थित रहे।

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