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संपादकीय :  ऐसे ‘राघू’ उड़ते ही रहेंगे!

भारतीय संसदीय लोकतंत्र का और कितना पतन देखना बाकी है? राघव चड्ढा सहित सात राज्यसभा सांसद ‘आप’ का त्याग कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। चड्ढा के साथ सांसद अशोक मित्तल गए। दस दिन पहले ही मित्तल के शैक्षणिक संस्थानों और उद्योगों पर ईडी के छापे पड़े थे। ये छापे क्यों मारे गए, इसका खुलासा अब हो गया है। मित्तल, चड्ढा के गुट में शामिल होकर भाजपा में आएं, इसके लिए ईडी के हथियार का इस्तेमाल किया गया। मोदी-शाह एक तरफ पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार में नैतिकता पर भाषण दे रहे हैं और दूसरी तरफ दिल्ली व पंजाब में विपक्षी दलों के सांसद तोड़ रहे हैं। मित्तल ने मनी लॉन्ड्रिंग की, भ्रष्ट तरीके से अपना विश्वविद्यालय चलाया इसलिए ‘ईडी’ उनके घर में घुसी। अब मित्तल भाजपा की ‘वॉशिंग मशीन’ में ही घुस गए हैं इसलिए सारे दाग धुल गए। राघव चड्ढा तो कल तक ‘भाजपा मतलब गुंडों की पार्टी’ होने का ढिंढोरा पीट रहे थे। भ्रष्ट और गुंडों की पार्टी ने देश का बेड़ा गर्क कर दिया है, ऐसा चड्ढा का कहना था। अब उन्हीं गुंडों की पार्टी में चड्ढा शामिल हो गए और भाजपा अध्यक्ष नबीन ने चड्ढा को पेड़ा खिलाया। यह भारतीय लोकतंत्र में निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। चड्ढा कहते हैं, ‘उनके पास राज्यसभा में दो-तिहाई सांसदों का बल है। इसलिए वे राज्यसभा की ‘आप’ का भाजपा में विलय कर रहे हैं।’ चड्ढा की यह भूमिका
अवैध और असंवैधानिक
है। दसवीं अनुसूची में स्पष्ट लिखा है कि किसी भी प्रकार की फूट, चाहे वह संख्या दो-तिहाई ही क्यों न हो, उसे संविधान की मान्यता नहीं है इसलिए आम आदमी पार्टी के सात सांसदों की फूट असंवैधानिक ठहरती है। यह तो हुई संविधान की किताब की बात, लेकिन क्या मौजूदा मोदी-शाह की सरकार, उनका चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, राज्यसभा के सभापति संविधान की इन धाराओं का सम्मान करते हैं? तो इसका उत्तर ‘नहीं’ ही देना पड़ेगा। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस में फूट की सुनवाई चार साल से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने चल रही है। यहां भी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ द्वारा अवैध दलबदल को स्वीकार करने के बावजूद, दसवीं अनुसूची के अनुसार फूटे हुए विधायकों पर कार्रवाई नहीं हुई। तारीख पर तारीख पड़ रही है और दलबदल की गंदगी करनेवाले विधायक महाराष्ट्र में सत्ता का आनंद ले रहे हैं। लोकतंत्र के लिए यह चित्र भयावह है। भाजपा ने राज्यसभा में ‘आप’ के जो सांसद तोड़े हैं, वे हवा के बुलबुले हैं। व्यापारी, उद्योगपति जैसे ये लोग; इनका जनता से कोई संबंध नहीं है। राघव चड्ढा का मामला ‘पेज थ्री’ का है। वह उतने तक ही सीमित रहेगा। इन सबसे भाजपा पंजाब में विधानसभा चुनाव जीत जाएगी, यह भ्रम है। पंजाब के एक प्रमुख नेता और कांग्रेस के दो बार मुख्यमंत्री रहे वैâप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ जैसे नेता भी भाजपा को विजय नहीं दिला सके, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक भूख
भस्मासुर और बकासुर की
है। उन्हें देश के सभी विपक्षी दलों को निगलना है और इसके लिए वे ईडी, सीबीआई का उपयोग कर रहे हैं। संघर्ष करने की हिम्मत जिनमें है, वे इस बवंडर में टिकते हैं और जो डरपोक हैं वे भाग जाते हैं या शरण में चले जाते हैं। महाराष्ट्र में मिंधे (शिंदे), अजीत पवार शरण में चले गए। दिल्ली में शराब घोटाले के नाम पर मुख्यमंत्री केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, सांसद संजय सिंह को मोदी-शाह ने जेल भेज दिया। इसी आरोपपत्र में राघव चड्ढा का भी नाम था, लेकिन वे गिरफ्तारी से बचने के लिए पत्नी सहित लंदन भाग गए। लंदन से ही मोदी परिवार के साथ सौदा करके भारत लौटे और अब ‘आप’ से अलग हो गए। ‘आप’ के राघव चड्ढा और उनके साथ के छह लोग भाजपा में गए तो उन शरणागतों के लिए विलाप क्यों करना? ‘आप’ के ये सभी भगोड़े विभिन्न भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी हैं। ये कारनामे ईडी और अन्य जांच एजेंसियों ने कागजों पर दर्ज किए हैं इसलिए ‘आप’ के भ्रष्टाचार की एक धारा भाजपा की दूसरी भ्रष्ट धारा में शामिल हो गई, बस इतना ही कहना है। मिंधे, चड्ढा, मित्तल का कोई विशेष राजनीतिक चरित्र नहीं है। भाजपा तो इस मामले में चरित्रहीन बन गई है। वर्तमान राजनीति का कोई चरित्र नहीं है। यही भारत का चरित्र बन गया है। जब तक दाने डाले जा रहे हैं, तब तक ऐसे ‘राघू’ (तोते) उड़ते ही रहेंगे। उड़ने दो!

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