अनिल तिवारी, मुंबई
उत्तर प्रदेश में २०२७ का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन चुनावी मौसम की पहली कृत्रिम वर्षा शुरू हो चुकी है। खेत में फसल अभी बोई भी नहीं गई, पर कुछ अखबारों ने परिणाम की बोरियां अभी से गिननी शुरू कर दी हैं। लोकतंत्र की इस अद्भुत खेती में जनता बाद में वोट डालेगी, सर्वे पहले ही सरकार बना देगा।
एक ताजा सर्वे आया है। सर्वे भी कोई साधारण नहीं, ऐसा कि मानो ईवीएम ने रात में चुपके से सपना देखा हो और सुबह अखबार ने उसे चुनावी भविष्यवाणी बनाकर छाप दिया हो। सर्वे कहता है कि अगर आज चुनाव हुए तो उत्तर प्रदेश में भाजपा तीसरी बार सरकार बना लेगी। ४०३ सीटों में भाजपा २५६ सीटें जीत सकती है। यानी पिछले चुनाव से केवल दो सीटों का नुकसान। वाह! क्या स्थिरता है। इतनी स्थिरता तो सरकारी कुर्सी में भी नहीं होती, जितनी इस सर्वे में भाजपा की सीटों में दिख रही है।
सर्वे की जादूगरी!
समाजवादी पार्टी को १३५ सीटें बताई गई हैं। यानी २८ सीटों का बड़ा फायदा। यह भी कमाल है। विपक्ष मजबूत भी हो रहा है, लेकिन सरकार फिर भी आराम से भाजपा की ही बन रही है। मतलब सर्वे ने सभी को थोड़ा-थोड़ा प्रसाद बांट दिया। भाजपा को सत्ता, सपा को संतोष, कांग्रेस को वही पुरानी दो सीटें और क्षेत्रीय दलों को राजनीतिक मोक्ष।
सबसे रोचक कथा भाजपा के सहयोगी दलों की है। सर्वे के अनुसार, भाजपा तो सिंहासन पर बैठी रहेगी, लेकिन उसके साथ चलनेवाले दलों की हालत बारात में पीछे छूटे बैंडवालों जैसी हो जाएगी। आरएलडी घटकर ४ सीटों पर, अपना दल १३ से घटकर ३ पर, निषाद पार्टी १ पर, सुभासपा साफ। यानी सरकार की गाड़ी भाजपा अकेले खींचेगी और सहयोगियों को पीछे ‘धन्यवाद, फिर आइएगा’ कहकर विदा कर देगी।
अब प्रश्न यह है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश में ऐसा कौन-सा राजनीतिक चमत्कार कर दिया कि जनता उसे फिर २५६ सीटों पर बैठाने को तैयार है, लेकिन उसी गठबंधन में शामिल दलों से इतनी नाराज है कि उनका टिकट ही कटवा देना चाहती है? यह जनता का गणित है या सर्वे की रसायन विद्या?
राजनीति में सर्वे अब केवल जनमत नापने का यंत्र नहीं रहे। कई बार वे माहौल बनाने की मशीन भी लगते हैं। पहले अखबार खबर छापते थे, अब कई बार भविष्य छापने लगे हैं। पहले पत्रकार जनता से पूछता था, अब लगता है जनता से पहले राजनीतिक हवा से पूछ लिया जाता है ‘बताइए, इस बार किसे जिताना है?’
अब जनता की बारी…
सवाल सर्वे से नहीं, उसकी नीयत और पद्धति से है। नमूना कितना बड़ा था? किस इलाके में कौन-सा प्रश्न पूछा गया? गांवों में गए या वातानुकूलित कमरों में बैठकर चुनावी तापमान मापा गया? क्या मतदाता ने सचमुच जवाब दिया या मोबाइल ऐप की उंगलियों ने लोकतंत्र का भविष्य लिख दिया? उत्तर प्रदेश कोई छोटा प्रदेश नहीं है। यहां जाति, क्षेत्र, स्थानीय उम्मीदवार, किसान, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, महंगाई, आरक्षण, धार्मिक ध्रुवीकरण, विकास और सत्ता-विरोध सब मिलकर चुनावी परिणाम बनाते हैं। ऐसे में दो साल पहले ही इतनी आत्मविश्वास से सीटों की माला पिरो देना वैसा ही है- जैसे शादी से पहले बच्चे का नामकरण कर देना। मुद्दा यह नहीं कि भाजपा आगे क्यों दिखाई गई। मुद्दा यह है कि चुनावी लोकतंत्र में अब जनता से पहले सर्वे बोलने लगे हैं। मतदाता अभी चुप है, लेकिन सर्वे महाराज ने घोषणा कर दी, ‘सिंहासन खाली मत करो, जनता बाद में आएगी।’
लोकतंत्र में अखबार का काम जनता की आंख बनना है, सत्ता का चश्मा नहीं। लेकिन जब खबर और प्रचार की रेखा धुंधली होने लगे, तब पाठक को केवल परिणाम नहीं, परिणाम बतानेवाले की नीयत भी पढ़नी चाहिए।
फिलहाल सर्वे कहता है, भाजपा फिर आएगी।
जनता कहती है, अभी हमसे पूछा ही किसने है? हमारी बारी आएगी तो हम बताएंगे कि कौन आएगा।
