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सुप्रसिद्ध लेखिका प्रभा खेतान की दृष्टि :  ‘बाजार के बीच, बाजार के खिलाफ’  -डॉ. सीमा 

समीक्षा
प्रभा खेतान स्वतांत्र्योत्तर महिला लेखिकाओें में एक बहुमुखी,  बहुआयामी, विलक्षण प्रतिभा संपन्न लेखिका है। इन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं कविता, उपन्यास, आलोचना, अनुवाद आदि का सृजन किया वस्तुतः उनके सम्पूर्ण साहित्य संसार के केंद्र में स्त्री है प्रभा खेतान जी बताती है। स्त्रियाँ जन्म से स्त्री नहीं होती अपितु समाज उसे स्त्री बनाता हैं स्त्री तो मनुष्य के रूप में पैदा होती है। समाज उसे, लिंग भेदभाव में बांधता है। लेखिका पाश्चात्य स्त्री लेखिका सिमोन द बोउवार से बहुत प्रभावित थी। इसलिए उन्होंने (सिमोन द बोउवार) ‘द सेकेंड सेक्स’ का हिंदी में “स्त्री उपेक्षिता” के नाम से अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने स्त्री जजज्याओं का अपने साहित्य में सजीव चित्रण किया है। इसके साथ ही उन्होंने भूमंडलीकरण बाजारवाद के दौर में स्त्रियों को मात्र एक उपभोग के रूप में प्रस्तुत करके श्रम के मूल्य को नकारा है। प्रभा खेतान की रचना “बाजार के बीचः बाजार के खिलाफ” में भूमंडलीकरण के संदर्भ में स्त्री के शोषण पर केंद्रित निबंध संग्रह है।
बीज शब्द : भूमंडलीकरण, पूंजीवाद, बाजारवाद, स्त्री, संघर्ष श्रम, दयनीय सजीव, व्यवस्था।
आलेख
सुखी संपन्न मारवाडी़ परिवार में जन्म लेने वाली प्रभा खेतान जी को बचपन से ही परिवार में लड़की के रूप में जन्म लेकर उपेक्षा का सामना करना पड़ता था। घृणा, ईर्ष्या तिरस्कार, हीनता को झेलती वह बड़ी हुई। इन्हीं कटु अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व में पुरातन पंथी समाज व्यवस्था के विरूद्ध विरोध की भावना को जन्म दिया। यह अनुभव उनके लेखन का खजाना है। प्रभा जी एक स्त्री हैं ओर उनका जीवन भी संघर्षमय रहा है। आधी आबादी स्त्रियाँ होने के बावजूद भी पुरुषों ने उन पर राज किया है और करता आ रहा है। और अभी भी कर रहा है। परंपरा से ही स्त्री को जन्म से ही संस्कार दिये जाते है। जिससे स्त्री कभी मुक्त नहीं हो पाती।  प्रभा जी लिखती है। कि दो तिहाई काम करने के बावजूद सबसे उपेक्षित एवं गरीब औरत ही है।
प्रौद्योगिकी के विकास के चरण में स्त्री मुक्ति आंदोलन की अवधारणा सामने आई दूसरे शब्दों में कहें तो एक तरफ बाजारवाद, उदारवाद, मूमंडलीकरण, प्रौद्योगिकीकरण ने दुनिया में विकास की रफ्तार पकड़ी वहीं दूसरी ओर स्त्रियों अपने अधिकारों को लेकर पितृसत्तात्मक समाज से लोहा लेना शुरू किया। भूमंडलीकरण का प्रभाव सभी जगह नजर आता है। प्रभा जी ने “बाजार के बीच बाजार के खिलाफ” कृति में बाजारवाद पर गहन अध्ययन किया है। संग्रह के लेखों में भू-मंण्डलीकरण पर वृद्ध रूप से विश्लेषण किया है। लेखिका ने इस संग्रह में अपने अनुभवों और अनेक देशों के आंकड़ों के आधार पर भूमण्डलीय प्रक्रियाओं का खाका खींचा है। उन्होंने अपने लेखों में इस बात पर ध्यान केन्द्रीत किया कि भूमण्डलीकरण का प्रभाव समाज और समाज में रहने वाले व्यक्तियों पर पड़ा है। भूमण्डलीकरण का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर अच्छा और बुरा प्रभाव एक साथ पड़ा है भूमण्डलीकरण ने नर और नारी को प्रभावित किया।
प्रभा जी ने निबंध संकलन में छ: निबंधों का चित्रण किया है। पहला “एक प्रश्नावाची समय दूसरी – श्रम के स्त्रीकरण की हकीकत, तीसरा – यौनकर्म की कीमत, चौथा – घुमड़ते हुए बादल, पाँचवाँ भोग और भोगा जाना, छठा बहुलता वादी रणनीति चाहिए। यह निबंध संकलन में संकलित हैं। भूमण्डलीकरण ने अमीरी और निर्धनता की खाई अत्याधिक बढ़ा दी।
प्रभा जी मानती हैं कि गरीबी का प्रभाव स्त्री और पुरुष दोनों पर पड़ता है, और इस गरीबी का अनुभव दोनों वर्ग, के लोग अलग-अलग करते हैं।”
लेखिका ने “बाजार के बीच बाजार के खिलाफ” भूमंडलीकरण और स्त्री के  प्रश्न पुस्तक में भूमंडलीकरण और उसके आर्थिक पहलुओं से स्त्री जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा की है उनका यह प्रभाव बहुमुखी होने के साथ ही विरोधाभासी भी हें रचनाकार दो दृष्टिकेण से इस विचार को पकड़ कर  चलती हैं। कि पहला शास्त्री चिंतन और दूसरा उत्तर-आधुनिकतावाद। उन्होंने इन्हीं दोनों नजरियों का तुलनात्मक विश्लेषण किया है।
प्रभा जी ने इस रचना में स्त्री के प्रश्नों को उजागर किया है। भूमंडलीकरण में लगातार सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, परिवर्तन से सभी राष्ट्र एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में मानवीय मूल्यों का हनन करने लगे हैं। आज कल की स्त्री घर से बाहर निकलना सीख गई है। उसका विकास हो रहा है। परंतु इसके साथ-साथ वह भूमंडलीय प्रक्रिया के हाथों का खिलौना बनने लगी है। प्यार, मोहब्बत, सेक्स सभी बिकाऊ हो गया है। स्त्रियाँ भूमंडलीकरण के चक्रव्यूह में अपभोक्ता बनते-बनते उपभोग बनती जा रही है। इन सभी के विषयों पर अग्रसर करने के उद्देश्य से प्रभा खेतान जी ने इस पुस्तक की रचना की है। इस पुस्तक में लेखिका ने पाठक वर्ग का ध्यान केंद्रीत करते हुए स्त्री का गहन चिंतन और मनन किया है। भूमंडलीकरण में लगातार  परिवर्तन के चलते कुछ लोग अपनी सतह में ऊपर उठ गए है। जबकि कुछ लोग अभी भी नीचे ही हैं। भूमंडलीकरण का प्रमुख प्रभाव स्त्री वर्ग पर भी पड़ा है। संक्षिप्त इतिहास पर विचार करते हुए प्रभा जी ने सन् 1960 से सन् 1999 तक घटनाओं में भूमंडलीकरण से बाजार के उतार-चढ़ाव और स्त्री जीवन से संबेंधित आँकड़ों का वर्णन किया है। लेखिका ने दुनिया के भूगोल को दो भागों में बाँटा है। पहला पूंजीवादी दूसरी समाजवादी। भूमंडलीकरण को तीन स्तरों में बाँटा। पहला सन् 1870-1914 के बीच का समय। जो अंतर्राष्ट्रीकरण का था। दूसरी सन् 1950 से 1960 का समय जो बहुराष्ट्रीयकरण रहा और तीसरा वर्तमान युग भूमंडलीकरण का।
आज का भूमंडलीकरण ज्ञान पर आधारित है आर्थिक भूमंडलीकरण के क्षेत्र के पर्यावरण, सार्वजनिक सेवा, सांस्कृतिक भिन्नता आयात-निर्याता उद्योग, परिवहन, स्वास्थ आदि विषयों की प्रमुखता है। ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने की होड़ है। यह भूमंडलीकरण की पहली विशेषता है दूसरी विशेषता मनुष्य के अस्तिव से लेकर प्रयोग होने वाले सभी चीज़ों को वस्तु के रूप में देखता है। जिससे मानवीय पक्षों और अधिकारों का हनन होता है। तीसरी विशेषता निर्यात केंद्रित उत्पादन है। तुलनात्मक सुविधा के अनुसार प्रत्येक देश अपने सक्षम उत्पादक का उत्पादन जयादा से ज्यादा करता है। प्रभा जी का मनना है कि भूमंड़लीकरण अर्थव्यवस्था में आर्थिक रूप से पुरुषों की तुलना में स्त्रियों पर ज्यादा पड़ा है। नारीवादी चिंतकों का भी यही मानना है कि “आर्थिक परिवर्तन का खमियाजा स्त्री वर्ग को ही सबसे ज्यादा भोगना पड़ा है। प्रभा जी का कहना “रूस और भारत जैसे देशों में स्त्रियों को घर-बाहर दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है। जिससे सेवा कार्य एवं पुनरूत्पादन के क्षेत्र में उनके श्रम का शोषण होता है।”  श्रमिक के रूप में वे बेरोजगार, हुई है। स्त्रियों को कम वेतन रोजगार योजनाओं में भेद-भाव, कार्यजगत में यौन-उत्पीड़न आदि ये दमन के विभिन्न पहलू पहले भी थे मगर पश्चिम के दरवाजे खुलने पर यह समस्याएँ ज्यादा प्रकट हुई हैं।
प्रभा जी ने अपने पैंतीस वर्षों के व्यवसायी अनुभव से यह बतलाने का प्रयास किया है कि भूमंड़लीकरण की प्रक्रिया में श्रम व्यवस्था को लचीली तरीके से लागू किया गया है। जिससे स्त्रियों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार मिल सके। इस व्यवस्था के चलते स्त्रियों की माँग बढ़ी और मांग बढ़ने के कारण इसका लाभ स्त्रियों को नहीं मिला श्रम का स्त्रीकरण चार प्रक्रियाओं से संबंधित है जिसे लेखिका ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है।
1. पुरुषों की तुलना में श्रम के बाजार में स्त्री की बढ़ती हुई भागीदारी
2. जिस कार्य को पांरपरिक रूप से पुरुष कर रहे हो उसको औरतें करने लगी।
3.   घरेलू उद्योग में अदृश्य श्रम शक्ति में स्त्री की मौजूदगी।
4. उद्योग व्यवस्था में आए हुए परिवर्तन के कारण मजदूरी वाले और अनियमित और अस्थायी ठेकों में स्त्री की अधिक नियुक्ति।”
सेवा के नाम पर स्त्री शोषण अधिक होता है। लेखिका ने कई देशों में स्त्री की स्थिति का जायजा लेते हुए विशेष तौर पर वियतनाम की स्त्रियों के संगठन को प्रगतिशील बताया है।
यौनकर्म की कीमत नामक रचना में प्रभा जी ने थाईलैंड के चागमाई इलाके की एक यौनकर्मियों की बातचीत से यह बताने का प्रयास किया है कि “और अपने वेश्या होने के कारण किसी अपराध बोध या पाप बोध की शिकार नहीं है। यह भूमंडलीकरण के युग की वेश्या है। इसकी देह उद्य़ोगों में निवेशित नहीं हुई, लेकिन उसने खुद को यौन उद्योग में निवेशित करना सीख लिया है।”  यौन कर्म के संदर्भ में लेखिका एशिया की सेक्स वर्कर के बारे में कहती है कि “फोनों द्वारा इनसे संपर्क किया जाता है, परन्तु शक्ति संरचना बिल्कूल वही है जो इस संसार में इनका स्थान निर्धारित करती है।”  प्रभा जी ने कलकत्ता की तालतल्ला इलाके में रहने वाली एक साठ साल की वेश्या से भी बातचीत की उस वेश्या ने उन्हें बताया कि कई लड़कियाँ उसके अपने गाँव और उनके आस पास के क्षेत्रों से लाई जाती है। प्रभा जी ने स्त्रियों की दो ही श्रेणियाँ बताई हैं अच्छी स्त्री यानि ब्याहता, बुरी अर्थात् वेश्या। लेखिका ने अन्य देशों की स्त्रियों का उदाहरण देते हुए बाल-विवाह के महत्व पर प्रकाश डालने के साथ-साथ ही कम उम्र की बलात्कारी लड़कियों के बारे में भी बताया है। उन्होंने वेश्याओं को चार वर्गें में बाँटा हैं
1. वंशानुगत 2. धर्म-परंपरा के तहत बनी 3. सामाजिक परिस्थितियों की शिकार बहला-फुसलाकर लाई 4. विकृतियों के शिकार महिलाएँ।  कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वेश्यावृति का मुद्दा जटिल है।
लेखिका कहतीं हैं कि भूमंडलीकरण की कारण समाज में सेक्स खरीदना और आसान हो गया है भारत देश में वेश्याओं की बड़ी संख्या दलित अथवा अछूत वर्ग से हैं? ये औरतें शोषण में तीन गुना मार से पीड़ित है। प्रभा जी स्त्री पर चर्चा करते हुए कहती हैं कि “सभी चीजों को बेचने के लिए स्त्री की यौनिकता का उपयोग किया जाता है। सेक्स को गलियों, वेश्यालयों, मालिशघरों, क्लबों तथा विज्ञापनों के जरिए बाजार में लाया जाता है। एशिया में भी यही हो रहा है किंतु एशियाई पुरुष हमेशा इससे इंकार करते हैं।”  प्रभा जी कहती हं कि हमें यह मान लेना चाहिए कि वेश्यावृति सिर्फ निर्धनता के कारीण है यह वह व्यवसाय है जिसकी नीवं स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब तथा समाज के दबे एवं शोषित व विशिष्ट वर्ग के बीच में विकृत संबंधों पर टिकी है।
नारीवादी आंदोलन की गूँज दुनिया के हर कोने में सुनाई देती है। इतर लिंगी यौन व्यवस्था को दी जाने वाली चुनौती नारीवादी आंदोलन का सबसे शक्तिशाली परिवर्तनकारी हस्तक्षेप है। नारीवादी आंदोलन से “गे” और “लेस्बियन” आंदोलन का गहरा संबंध रहा है। इस पर चर्चा करते हुए लेखिका ने ताईपेई का लेस्बियन आंदोलन पर प्रकाश डाला है। यह आंदोलन स्त्री की पारंपरिक छवि पर सवाल उठाता है। 22 मई 1994 में ताईपे में लगभग 800 स्त्रियों ने “हो” नामक एक नारीवादी विद्वान के समर्थन करते हुए एक साथ पितृसत्ता को चुनौती दी। “गे” आंदेलन की शुरूआत न्यूयार्क के मीनवी मीलने में स्टीनवाल रिवोल्ट में हुआ। 1977 में 800 व्यक्तियों ने इस में भाग लिया जिसमें समंलिंगी विवाह के लिए माँग की गई। प्रभा जी के अनुसार इस तरह के आंदोलन के चलते परिवार संकट में पड़ गये हैं।
भूमंडलीकरण संस्कृति में विचार मूल्य, सूचना और आधुनिक रूचियों की प्रमुखता है। जहाँ भी विचारधारा स्थिर नहीं रहता। आज की विचारधारा पर विचार किया जाये तो वह अतीतवाली विचाधराधाओं का विरोध करती है। प्रभा जी कहती हैं कि आज प्रकृति का भी बजारीकरण होने लगा है, जैसे पानी ब्रांड आदि बाजारवाद हमेशा से ही उपभोक्ता को अपनी ओर आकर्षित करता हैं सत्री उपभोक्ता किसी ब्रांड को अगर खरीदती है तो इसके पीछे का कारण है कि वह इस ब्रांड पर और उसकी गुणवत्ता पर भरोसा कर रही है। स्त्री सुंदर दिखने के लिए ऋण लेकर भी अपना शौक पूरा करना चाहती है। भोगवादी संसार उसको विश्वास दिलाता है कि वह हमेशा सुंदर ही बनी रहेगी। स्त्री सुंदर दिखने वाले समानों का प्रयोग भी करती है जैसे, रिम, क्रिम, लोशन आदि वह इन वस्तुओं की माँग भी करती है क्योंकि इसके पीछे का कारण दिन-रात संचार माध्यम द्वारा उसकी चेतना पर वस्तुओं की छाप पड़ती है नॉओमी वुल्फ का कहना है कि “स्त्री को जैसी ही गृहस्थी से मुक्ति मिली तो सौन्दर्य प्रसाधन ने जकड़ लिया।”  प्रभा जी मानती हैं कि जो सुख कभी परिवार से मिलता था वह अब बाजार से मिलने लगा है। परन्तु वह यह भी मानती हैं कि परिवार का स्थान कोई नहीं ले सकता।
प्रभा खेतान जी भूमंडलीकरण के कारण हुए परिवर्तन को समझने के लिए स्त्री की स्थिति, श्रम का बाजार, उपभोक्तावादी संस्कृति को समझने की कोशिश करती है। वह मानती है कि भूमंडलीकरण अपने-आप में एक द्वंदात्मक प्रक्रिया है। प्रभा जी का कहना है कि एक ओर बाजार में आर्थिक उदान्तता है, तो दूसरी ओर बेकारी शोषण, दरिद्रता, अपराध है। बाजारदवार की चर्चा तो सभी जगह होती है परन्तु दरिद्रता और अपराधों पर पर्दा डाल दिया जाता है। मर्दवादी भूमंडलीकरण में स्त्रियाँ कहीं बहुत पीछे छूटती जा रही हैं आज भी अगर निवेश पर चर्चा की जाती है तो वह औरत के पक्ष में नहीं है। यौनवाद भावना के अंतर्गत स्त्री अभी भी पराधीन है। विज्ञापनों में उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने के लिए स्त्री का यौनीकरण किया जाता है। स्त्री पुरुष की असमानता स्त्री के पिछड़ेपन की स्थिति को दर्शाता है लेखिका के अनुसार नारीवाद को ज़मीनी स्तर पर जुड़कर प्रभावी हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि स्त्रियों के हक में कुछ फैसला हो सके।
भारत में भूमंडलीय व्यवस्था को लैंगिक दृष्टि से देखेन पर समाज की यथार्थ संरचना का ज्ञान होता है। कॉरपोरेशन स्थार्थ राष्ट्र पर पूरी तरह से हावी हो चुका है। लेखिका का कहना “भूमंडलीकरण वास्तव में राष्ट्रीय सत्ता को कमजोर करता है क्या इसके तहत अमेरिका अपना वर्चस्व एवं वैश्विक दृष्टिकोण अन्य सभी राष्ट्रों पर आरोपित करता है।”  प्रभा जी का मानना है कि नारीवादी आंदोलन जब भी भूमंडलीकरण की व्याख्या करे वो स्त्री, पर्यावरण और अन्य बातों पर गंभीरता पूर्वक चर्चा की जाये। प्रभा जी के विचारानुसार नारीवादी आंदोलन ही एक ऐसा मजबूत आंदोलन है जिससे सार्वजनिक जीवन का विकास संभव हो सकता है इसके लिए बहुलतावादी राजनीति से काम लेना होगा।
प्रभा खेतान जी एक समग्र लेखिका हैं उपन्यास कविता, चिंतन, अनुवाद जैसी विधाओं में सफलतापूर्वक लेखन कार्य किया है। प्रभा जी का साहित्य भी प्रायः स्त्री केंदित है। लेखिका ने चिंतन क्षेत्र में महतवपूर्ण ग्रंथों का निर्माण किया है उन्होंने हिन्दी साहित्य में स्त्री विषयक प्रश्न भूमंडलीकरण बाजार के बीच बाजार के खिलाफ आदि अस्तित्ववादी सिद्धांतों का अध्ययन मनन कर उसमें सिद्धांतों की बाते की हैं। उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक “बाजार के बीचः बाजार के खिलाफ” से उन्होंने कई मुद्दों पर प्रकाश डाला है। बाजारवाद के नाम पर स्त्री की यथार्थ वादी स्थिति का चित्रण किया है प्रभा जी का भाषा सरल है। सरलता के साथ-साथ यथार्थ को पकड़ सकने में सक्षम है।
वह एक ऐसी लेखिका है जिन्होंने वैश्विक धरातल पर व्यापार करती स्त्री जीवन के संघर्षों को रेखांकित किया है उन्होंने भूमंडलीकरण का स्त्री जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा उसका सजीव चित्रण अपनी लेखन कला के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

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