सामना संवाददाता / मीरा रोड
‘स्वर संगम फाउंडेशन’ और ‘अनभै’ के साझा सहयोग से आयोजित होने वाली मासिक व्याख्यानमाला के तहत एक बेहद अहम कार्यक्रम का आयोजन किया गया। शुक्रवार, 12 जून 2026 को शाम 5:30 बजे, विरंगुला केंद्र, पूनम सागर, मीरा रोड में आयोजित इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता लखनऊ यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष और जाने-माने समाजवादी चिंतक प्रोफेसर रमेश दीक्षित थे। उन्होंने “वर्तमान समय की चुनौतियां!” जैसे गंभीर विषय पर विस्तार से अपनी बात रखी।
इस बहुप्रतीक्षित व्याख्यान की सबसे खास बात यह रही कि लगभग ढाई घंटे तक चले इस कार्यक्रम में श्रोताओं की दिलचस्पी, भागीदारी और ग्रहणशीलता अद्वितीय रही। हॉल में मौजूद लोगों ने प्रो. दीक्षित के विचारों का जबरदस्त स्वागत किया।
कार्यक्रम की शुरुआत परिचय और संवाद से हुई, जिसके बाद प्रो. दीक्षित ने लोकतंत्र और उसके बुनियादी उसूलों से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा, “यूं तो इंग्लैंड, अमेरिका और फ्रांस से लोकतंत्र की शुरुआत हुई, लेकिन इसे सबसे मजबूत आधार भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की दूरदर्शिता और विजन ने दिया। भारतीय लोकतंत्र ने पहले ही दिन से स्त्री और पुरुष दोनों को बराबरी का हक दिया। देश के जन-गण को आजादी, समानता, अभिव्यक्ति और असहमति जताने का सबसे कारगर अधिकार मिला।”
प्रो. दीक्षित ने बेहद अफसोस जताते हुए कहा कि आज हमारे सारे नागरिक अधिकार संदेह और सवालों के दायरे में सिमटते जा रहे हैं। उन्होंने चेताया, “आज हम फिर से एक आजाद नागरिक से सामंती दौर की ‘प्रजा’ बनने के मुहाने पर खड़े हैं। यह हमारे समय की सबसे खतरनाक चुनौती है। भारतीय समाज में आज जितनी नैतिक गिरावट (मूल्यहीनता) दिख रही है, उतनी शायद इतिहास के किसी दौर में नहीं रही।”
अंतरराष्ट्रीय हालात पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का गठन हुआ था और अंतरराष्ट्रीय कानून बने थे। लेकिन आज संयुक्त राष्ट्र संघ एक बेजान और निर्जीव संस्था बनकर रह गया है। साम्राज्यवादी ताकतों ने इसे पूरी तरह बेअसर कर दिया है। आज दुनिया में किसी भी देश की संप्रभुता (सॉवरेनिटी) सुरक्षित नहीं है और हम तेजी से “नॉन-सॉवरेन नेशन” (गैर-संप्रभु राष्ट्र) की तरफ बढ़ रहे हैं। इजरायल, फिलिस्तीन और ईरान के युद्ध ने साबित कर दिया है कि दुनिया अब ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के दौर में जा चुकी है। समाजवाद का सपना महज एक सपना बनकर रह गया है।
गाजा और ईरान में मासूम बच्चों की बेरहमी से की जा रही हत्याओं को उन्होंने मानव इतिहास का सबसे घृणित और शर्मनाक पहलू बताया। उन्होंने अमेरिका और यूरोपीय देशों को घेरते हुए कहा कि ये साम्राज्यवादी मुल्क अपने अंदर तो लोकतांत्रिक हैं, लेकिन एशिया और अफ्रीका के लिए विशुद्ध रूप से साम्राज्यवादी हैं, जिनका मकसद सिर्फ दूसरों के संसाधनों को लूटना और मानवाधिकारों को ताक पर रखना है।
वेनेजुएला का उदाहरण देते हुए प्रो. दीक्षित ने कहा कि आज भारत की संप्रभुता पर भी संकट है। इतने विशाल देश को अमेरिका जैसे मुल्क निर्देशित कर रहे हैं और लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारें बेबस नजर आती हैं।
उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, “एक समय था, जब यूपी अपनी सहिष्णुता, उदारता और जन-आंदोलनों के लिए जाना जाता था, पर आज पूरी दुनिया में उसकी पहचान ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ और ‘बुल्डोजर प्रदेश’ के रूप में बन गई है।”
श्रोताओं की तरफ से पूछे गए तीखे और महत्वपूर्ण सवालों का प्रो. दीक्षित ने बेहद तार्किक और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जवाब दिया। एक सवाल के जवाब में उन्होंने साफ किया कि महात्मा गांधी का सत्याग्रह और उनकी अहिंसक राजनीति ही आज विश्व को इस बड़े संकट से बाहर निकाल सकती है। वहीं, व्यवस्था परिवर्तन के सवाल पर उन्होंने भरोसा जताया कि इस देश के युवा ही इस अधिनायकवादी सिस्टम को बदलने का हौसला और ताकत रखते हैं और वे इसे यकीनन बदलेंगे।
व्याख्यान के बाद हुई खुली चर्चा में शहर के कई प्रबुद्ध नागरिकों और साहित्यकारों ने हिस्सा लिया, जिनमें मुख्य रूप से कवि रमन मिश्र, प्रो. हूबनाथ पांडेय, शैलेश सिंह, पुलक चक्रवर्ती, दिनेश गुप्ता, विष्णु प्रकाश मिश्र, बृजेश सिंह, राकेश शर्मा, प्रतिमा राज, धनंजय, राजीव रोहित, कमलेश शर्मा और प्रो. वी. के. दुबे शामिल रहे।
कार्यक्रम के आखिर में ‘स्वर संगम फाउंडेशन’ के अध्यक्ष हृदयेश मयंक ने हॉल में मौजूद सभी विचारकों, लेखकों और श्रोताओं का दिल से आभार व्यक्त किया।
