मुख्यपृष्ठस्तंभपेरिस मार्का सड़कों के नीचे बजबजाता ‘स्वच्छ' सच

पेरिस मार्का सड़कों के नीचे बजबजाता ‘स्वच्छ’ सच

अग्रिम बधाई हो नई मुंबई! ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ की चमचमाती ट्रॉफियां अलमारी में सज चुकी हैं। देश के सबसे आधुनिक शहरों की लिस्ट में हमारा नाम देखकर छाती चौड़ी होना स्वाभाविक है। मगर ठहरिए, इस चौड़ी छाती के भीतर जो फेफड़े हैं, वे रात के अंधेरे में औद्योगिक इलाकों से छोड़ी गई जहरीली हवा फांक रहे हैं। और हां, अपनी प्यास बुझाने के लिए जरा संभलकर नल खोलिएगा, क्योंकि इन नलों से जो ‘अमृत’ टपक रहा है, उसका रंग और गंध सीधे प्रशासनिक लापरवाही के गटर से मैच खाती है।
साइंस का तमाचा और प्रशासनिक ‘साइलेंस’
गावठनों (गांवों) और घनी आबादी वाले इलाकों की सिविल इंजीनियरिंग देखकर तो मिस्र के पिरामिड बनाने वाले भी शर्म से पानी-पानी हो जाएं। यहां सीवरेज और पीने के पानी की पाइपलाइनें ऐसे एक-दूसरे से गले मिलकर चलती हैं, जैसे बचपन के लंगोटिया यार हों। जब पानी की सप्लाई बंद होती है, तो २० साल पुरानी सड़ चुकी पाइपलाइनों में एक वैक्यूम बनता है। विज्ञान इसे ‘बैक-साइफनेज’ कहता है, और हमारा प्रशासन इसे ‘प्रसाद’ समझकर बांटता है। यह वैक्यूम बगल के गटर से मानव मल और ई-कोलाई बैक्टीरिया को सोख लेता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड चिल्लाता रह जाए कि पानी में कोलीफॉर्म ‘शून्य’ होना चाहिए, यहां तो पानी में कोलीफॉर्म का पूरा ‘कुनबा’ निवास कर रहा है।
असल में, नई मुंबई महानगरपालिका का पूरा तंत्र अब जनसेवा के लिए नहीं, बल्कि ‘अवॉर्ड हंटिंग’ (पुरस्कार के शिकार) के लिए जीता है। जैसे ही दिल्ली से स्वच्छता सर्वेक्षण की टीम आने वाली होती है, पूरा अमला ऐसे अलर्ट मोड पर आता है कि मानो स्वर्ग से देवराज इंद्र खुद चेकिंग के लिए उतर रहे हों। रात-रात भर में सड़कें ऐसी चमकाई जाती हैं कि कुछ वीआईपी इलाके हुबहू पेरिस की गलियों जैसे दिखने लगते हैं। मगर अफसोस, इन चमकीली ‘पेरिस’ की गलियों के ठीक पीछे जो असल नई मुंबई है, वह बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर घुटनों के बल रेंग रही है।
तुलना करनी है तो चंडीगढ़ जैसे शहरों से कीजिए, जहां की साफ-सफाई किसी नेशनल ट्रॉफी को अलमारी में सजाने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए साल के ३६५ दिन ईमानदारी से चलती है। हमारे यहां तो पुरस्कार का ताज सिर पर सजते ही पूरी व्यवस्था ‘कुंभकरणी नींद’ के मोड में चली जाती है। एनजीओ चिल्लाते रहें, नागरिक शिकायतें दर्ज कराते रहें, नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ ही रहना है।
महानगरपालिका को यह कड़वी हकीकत समझनी होगी कि किसी ‘स्मार्ट सिटी’ की महानता उसकी बाहरी चकाचौंध, रंग-रोगन या पीआर स्टंट से नहीं, बल्कि नागरिकों को मिलने वाले शुद्ध पेयजल जैसे संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद २१) से तय होती है। कागजी घोड़े दौड़ाने और अतार्किक बयानों से पल्ला झाड़ने के बजाय अगर तुरंत ग्राउंड रियलिटी पर आकर लीकेज दुरुस्त नहीं किए गए, तो यह तथाकथित ‘पुरस्कार विजेता’ शहर बहुत जल्द एक बड़े स्वास्थ्य आपातकाल की ट्रॉफी थामे खड़ा नजर आएगा।

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