राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार ने बढ़ाया था उत्पाद शुल्क
सुरेश गोलानी / भायंदर
प्रति वर्ष लगभग १४,००० करोड़ रुपए का राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से महायुति सरकार ने पिछले दिनों देशी और भारत में बनी विदेशी शराब (आईएमएफएल) पर उत्पाद शुल्क (इक्साइज ड्यूटी) में भारी वृद्धि कर दी, लेकिन सरकार का ये दांव भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी के कारण उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। इसका एक प्रमुख कारण है आबकारी विभाग और बीयरबार वालों की कथित मिलीभगत से खुलेआम हो रही टैक्स की चोरी है।
ज्ञात हो कि आबकारी नियमों के अनुसार किसी भी परमिटधारी बार मालिक को अधिकृत थोक विक्रेता से देशी शराब तथा आईएमएफएल की खेप खरीदने के लिए परिवहन परमिट प्राप्त करना अनिवार्य होता है। यह प्रक्रिया इस बात की पुष्टि करती है कि बार को अपना स्टॉक आधिकारिक रूप से स्वीकृत माध्यमों से प्राप्त हो रहा है। शराब पर कर राज्य सरकारों के लिए राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। आबकारी विभाग का ये दायित्व है कि बारों से लाइसेंस प्राप्त आपूर्तिकर्ताओं से की गई खरीदारी का विस्तृत रिकॉर्ड, आपूर्ति श्रृंखला और बिक्री की मात्रा का हर महीने निरीक्षण करे, जिससे ये सुनिश्चित हो सके कि उत्पाद शुल्क वसूली का लेखा-जोखा सुव्यवस्थित है या फिर उसमें हेराफेरी की जा रही है, लेकिन मीरा-भायंदर शहर के ज्यादातर बार मालिक इस कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए उचित वाणिज्यिक उत्पाद शुल्क के भुगतान से बचने हेतु आधिकारिक थोक नेटवर्क को दरकिनार कर खुदरा दुकानों से शराब की खरीदारी कर रहें हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं होता है।
हफ्ता वसूली में जुटे हैं प्राइवेट दलाल
सूत्रों के अनुसार, राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाकर आबकारी विभाग (ठाणे) से जुड़े कुछ अधिकारियों के आशीर्वाद से प्राइवेट दलालों की एक टोली इस प्रकार की हेराफेरी और टैक्स चोरी जैसे गंभीर अपराध को संरक्षण देने के नाम पर जमकर बार वालों से हर महीने हफ्ता वसूली कर सरकारी राजस्व डूबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सरकारी राजस्व के नुकसान के अलावा इस प्रकार की अनियंत्रित खरीदी-बिक्री के कारण बाजार में नकली शराब के प्रचलन का खतरा बढ़ गया है जो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा है।
