मुख्यपृष्ठनए समाचारहंसुआ उठाने वाली मां : रूपी सोरेन संघर्ष, संस्मरण और एक खामोश...

हंसुआ उठाने वाली मां : रूपी सोरेन संघर्ष, संस्मरण और एक खामोश जीवन को भावभीनी श्रद्धांजलि-विजय शंकर नायक

 अनिल मिश्र / रांची

झारखंड का इतिहास केवल आंदोलनों, नारों, चुनावों और सत्ता के उतार-चढ़ाव से नहीं बनता। इतिहास के कुछ सबसे मार्मिक अध्याय उन जीवनों में लिखे जाते हैं, जो मंच की रोशनी से दूर रहते हैं, लेकिन संघर्ष की कठिन तपिश को बहुत करीब से महसूस करते हैं।श्रीमती रूपी सोरेन का जीवन ऐसा ही एक अध्याय था।
उनकी कहानी को समझने के लिए भावनाओं के साथ-साथ समय का क्रम भी समझना जरूरी है। इसलिए उनके जीवन के प्रमाणित तथ्यों और उनसे जुड़े संस्मरणों को अलग-अलग रखते हुए उनकी जीवन-यात्रा को कालक्रम में देखना अधिक उचित होगा।रूपी सोरेन : जीवन-यात्रा का कालक्रम
1962-विवाह और संघर्षपूर्ण जीवन की शुरुआत
रूपी सोरेन का विवाह 1 जनवरी 1962 को शिबू सोरेन से हुआ। विवाह के बाद उनका जीवन ऐसे परिवार से जुड़ा, जिसका आगे चलकर झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान बना।
यह वह समय था जब अलग झारखंड राज्य अस्तित्व में नहीं था और शिबू सोरेन का सार्वजनिक संघर्ष अपने शुरुआती दौर में था।रूपी सोरेन की अपनी सार्वजनिक राजनीतिक भूमिका उस समय प्रमुख नहीं थी। उनका जीवन मुख्यतः परिवार और घरेलू जिम्मेदारियों से जुड़ा था।
1960 और 1970 के दशक-संघर्ष की वे स्मृतियां रूपी सोरेन के जीवन के इस दौर से जुड़े अनेक प्रसंग बाद में उनके स्वयं के संस्मरणों और परिवार से जुड़े लोगों के बयानों के माध्यम से सामने आए।2023 के अपने विशेष साक्षात्कार में उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों, महाजनों के दबाव और शिबू सोरेन के लंबे समय तक घर से दूर रहने के प्रसंग याद किए थे।
महाजन और हंसुआ का संस्मरण उनसे जुड़े संस्मरणों में बिष्टु साव नामक महाजन से खेत को लेकर हुए टकराव का प्रसंग विशेष रूप से चर्चित है। बताया गया कि जब खेत पर कब्जे की कोशिश हुई तो रूपी सोरेन ने विरोध किया और हंसुआ उठा लिया। यह प्रसंग उनकी अपनी स्मृति/परिवार के संस्मरण के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि स्वतंत्र रूप से प्रमाणित सरकारी रिकॉर्ड की घटना के रूप में। लेकिन इस संस्मरण का भाव स्पष्ट है—एक महिला अपने परिवार की जमीन और घर की रक्षा के लिए परिस्थिति के सामने खड़ी थी।यहीं से “हंसुआ उठाने वाली मां” का प्रतीकात्मक अर्थ सामने आता है।1970 के दशक-पुलिस की पूछताछ और घर की चौखट
रूपी सोरेन से जुड़े संस्मरणों में यह भी आता है कि शिबू सोरेन के संघर्षपूर्ण दौर में पुलिस घर पर पूछताछ के लिए आती थी। इसी संदर्भ में उनका एक कथित कथन बाद की रिपोर्टों में उद्धृत हुआ-“यह शिबू सोरेन का घर नहीं है, रूपी सोरेन का घर है।”इस कथन को भी रिपोर्टेड संस्मरण के रूप में ही प्रस्तुत करना अधिक उचित है। लेकिन उस एक वाक्य में उनकी मानसिक दृढ़ता की तस्वीर दिखाई देती है। वह किसी राजनीतिक मंच पर नहीं थीं। वह अपने घर की चौखट पर थीं। और वहीं उन्होंने अपने हिस्से का साहस दिखाया।संघर्ष का वही दौर — जंगल में पति की तलाश
रूपी सोरेन के संस्मरणों में यह भी सामने आया कि शिबू सोरेन लंबे समय तक घर से बाहर रहते थे और परिवार को उनकी सही जानकारी नहीं मिल पाती थी। एक प्रसंग के अनुसार रूपी सोरेन अपनी सास और ननद के साथ, छोटे बेटे को लेकर, उन्हें तलाशने जंगलों तक गई थीं।परिवार और मातृत्व-संघर्ष का दूसरा मोर्चा
जब शिबू सोरेन का सार्वजनिक जीवन संघर्षों से घिरा रहा, तब परिवार की जिम्मेदारियां रूपी सोरेन के हिस्से में रहीं। उनकी पहचान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही था कि उन्होंने परिवार को संभाला और बच्चों का पालन-पोषण किया। यहां भावनात्मक सम्मान और तथ्य के बीच संतुलन जरूरी है। यह कहना उचित है कि वह परिवार की महत्वपूर्ण आधार थीं; लेकिन उनके बच्चों की प्रत्येक उपलब्धि का श्रेय केवल उन्हें देना तथ्य-सम्मत नहीं होगा। मां की भूमिका का सम्मान करने के लिए अतिशयोक्ति की आवश्यकता नहीं होती।
1999 — राजनीति में उनका अपना स्पष्ट अध्याय
रूपी सोरेन के जीवन का सबसे स्पष्ट रूप से प्रमाणित राजनीतिक अध्याय 1999 का लोकसभा चुनाव है।दुमका लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार: बाबूलाल मरांडी — 2,01,141 वोट, रूपी सोरेन किस्कू — 1,96,493 वोट, अंतर — 4,648 वोट,वह इस चुनाव में दूसरे स्थान पर रहीं।यह तथ्य उनके जीवन को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि रूपी सोरेन केवल राजनीतिक परिवार की सदस्य भर नहीं थीं; उन्होंने स्वयं भी चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था और एक बेहद करीबी लोकसभा मुकाबला लड़ा था। इसके बाद वह लगातार चुनावी राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं।
15 नवंबर 2000 — झारखंड राज्य का गठन
15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना।
रूपी सोरेन उस ऐतिहासिक परिवर्तन को एक ऐसे परिवार की सदस्य के रूप में देख रही थीं, जिसका जीवन झारखंड के राजनीतिक संघर्ष से गहराई से जुड़ा था।लेकिन उन्हें आंदोलन की औपचारिक नेता कहना उपलब्ध प्रमाणों से आगे जाना होगा। अधिक तथ्य-सम्मत बात यह है कि वह उस संघर्षशील परिवार की सदस्य और उस दौर की निकट साक्षी थीं।
2009 — एक मां का गहरा निजी दुःख
वर्ष 2009 में उनके बड़े पुत्र दुर्गा सोरेन का निधन हुआ।यह उनके जीवन का एक अत्यंत निजी और गहरा आघात था।राजनीतिक इतिहास इस घटना को एक तारीख के रूप में दर्ज कर सकता है, लेकिन एक मां के लिए संतान को खोने का दुःख किसी तारीख में सीमित नहीं होता।रूपी सोरेन के जीवन में यह वह पीड़ा थी, जिसे सार्वजनिक राजनीति के आंकड़ों से समझा ही नहीं जा सकता।
2023 — अपनी कहानी स्वयं कहने का महत्वपूर्ण अवसर
1 मई 2023 को दिए गए विशेष साक्षात्कार में रूपी सोरेन ने अपने जीवन के कई पुराने प्रसंग स्वयं याद किए।महाजनों का दबाव, परिवार की कठिनाइयां, शिबू सोरेन का लंबे समय तक घर से बाहर रहना और उन्हें तलाशने की चिंता जैसे प्रसंग इसी माध्यम से व्यापक रूप से सामने आए।इसलिए उनके जीवन की कहानी लिखते समय 2023 का उनका साक्षात्कार एक महत्वपूर्ण संस्मरण-स्रोत है।
4 अगस्त 2025 — जीवनसाथी की विदाई
4 अगस्त 2025 को शिबू सोरेन का निधन हुआ।छह दशक से अधिक की जीवन-यात्रा में साथ रहे जीवनसाथी की विदाई रूपी सोरेन के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तिगत पड़ाव था। इस घटना के बाद वह परिवार की वरिष्ठतम पीढ़ी की महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में रह गईं।23 जून 2026 — अंतिम सार्वजनिक गौरवपूर्ण क्षणों में से एक 23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण प्रदान किया गया।उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से यह सम्मान ग्रहण किया। वह व्हीलचेयर पर समारोह में उपस्थित थीं।यह दृश्य अपने भीतर एक गहरी जीवन-कथा समेटे था।जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने छह दशक से अधिक जीवन बिताया, उसके जाने के बाद उसी के सम्मान को उन्होंने स्वयं ग्रहण किया।कुछ ही महीनों बाद उनकी अपनी जीवन-यात्रा भी समाप्त हो गई।18 सितंबर 2026 — अस्पताल में भर्ती
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 18 सितंबर 2026 को सांस लेने में परेशानी के बाद रूपी सोरेन को रांची के हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया।उनकी तबीयत गंभीर बनी रही और उनका उपचार जारी रहा।7 अक्टूबर 2026 — एक युग की खामोश विदाई
7 अक्टूबर 2026 को रांची के हिल व्यू अस्पताल में रूपी सोरेन का निधन हुआ। उपलब्ध अस्पताल संबंधी रिपोर्ट में उनके निधन का समय लगभग रात 8:30 बजे बताया गया है।उनके निधन के साथ एक परिवार ने अपनी मां खोई और झारखंड ने उस पीढ़ी की एक ऐसी महिला को खो दिया, जिसकी जीवन-कथा राजनीति के मंच से अधिक परिवार, संघर्ष और स्मृतियों में दर्ज थी। तथ्य और संस्मरण : दोनों को साथ पढ़ने की जरूरत रूपी सोरेन के जीवन की पूरी तस्वीर दो स्रोतों से बनती है।पहला—प्रमाणित तथ्य: विवाह, 1999 का लोकसभा चुनाव, झारखंड राज्य का गठन, दुर्गा सोरेन का निधन, शिबू सोरेन का निधन, पद्म भूषण ग्रहण करना और 7 अक्टूबर 2026 को उनका निधन।
दूसरा—संस्मरण:
महाजन से खेत बचाने का प्रसंग, हंसुआ उठाने की घटना, पुलिस के सामने दिया गया कथित जवाब और जंगल में पति की तलाश जैसे प्रसंग।इन दोनों को एक ही स्तर पर रखना उचित नहीं होगा। तथ्य इतिहास का आधार हैं; संस्मरण उस इतिहास का मानवीय चेहरा और श्रद्धांजलि—उन दोनों के बीच से निकलने वाली हमारी संवेदना है। रूपी सोरेन : इतिहास के पीछे खड़ी एक महिला
रूपी सोरेन को केवल “शिबू सोरेन की पत्नी” कहना उनके जीवन को सीमित कर देगा।लेकिन उन्हें झारखंड आंदोलन की औपचारिक नेता कहना भी उपलब्ध प्रमाणों से आगे जाना होगा।सच्चाई इन दोनों के बीच है। वह एक मां थीं।एक जीवनसंगिनी थीं।एक ग्रामीण आदिवासी महिला थीं। कठिन परिस्थितियों में परिवार संभालने वाली महिला थीं। 1999 में स्वयं चुनाव लड़ने वाली प्रत्याशी थीं और झारखंड के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक दौर की निकट साक्षी थीं।उनकी कहानी की शक्ति किसी अलंकार में नहीं, उसके अपने सच में है। मेरी श्रद्धांजलि श्रीमती रूपी सोरेन जी के निधन से मन गहरे दुःख से भर गया है।
एक मां का जाना केवल परिवार से एक व्यक्ति का जाना नहीं होता। उसके साथ घर की अनेक स्मृतियां, बचपन की आवाजें और पीढ़ियों को जोड़ने वाली एक आत्मीय छांव भी चली जाती है।रूपी सोरेन ने जीवन के लंबे सफर में संघर्ष देखा, परिवार संभाला, अपनों को खोने का दुःख सहा और झारखंड के एक महत्वपूर्ण दौर की साक्षी बनीं। उनका जीवन हमें बताता है कि साहस हमेशा मंच पर दिखाई नहीं देता—कभी वह खेत में हंसुआ थामे खड़ा होता है, कभी जंगल की पगडंडी पर किसी अपने की तलाश करता है और कभी बच्चों को सीने से लगाकर कठिन समय को पार करता है। आज उस मां को मेरा विनम्र नमन है। श्री हेमंत सोरेन जी और पूरे सोरेन परिवार के प्रति मेरी गहरी संवेदना है।रूपी सोरेन जी को भावभीनी श्रद्धांजलि। उनकी स्मृतियों को सादर नमन। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दें और शोकाकुल परिवार को इस अपूरणीय दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।

अन्य समाचार