मुख्यपृष्ठस्तंभयूपी में जातियों के बंदरबांट का पुराना सियासी खेल जारी

यूपी में जातियों के बंदरबांट का पुराना सियासी खेल जारी

डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश में इस बार सियासत का पोस्टर बदल गया है, पर दीवार वही पुरानी है। दीवार पर दलित-पिछड़ा बनाम सवर्ण की धुरी पर अब रोज एक नया तड़का लग रहा है। गांव की चौपाल कहती है माहौल गरम है, लखनऊ की फाइलें कहती हैं सब सामान्य है। सच शायद बीच में कहीं दम तोड़ रहा है।
पूर्वांचल और बुंदेलखंड के कई जिलों से जो सिग्नल आ रहे हैं, वो चिंताजनक हैं। सार्वजनिक जमीन, तालाब, रास्ता-पहले इन पर झगड़ा होता था। अब झगड़े की एंट्री ही इस सवाल से होती है कि “तुम किस बिरादरी से हो?” पंचायत चुनाव में आरक्षित सीट को लेकर, ठेकेदारी में कमीशन को लेकर और स्कूल में मिड-डे मील की पंगत को लेकर टकराहट की खबरें बढ़ी हैं। हर घटना के 10 मिनट बाद दो वीडियो बनते हैं। एक “सवर्ण अस्मिता खतरे में” का, दूसरा “बहुजन अपमान” का। फिर सोशल मीडिया पर हंगामा। पुलिस फेक वीडियो पर केस दर्ज करती है, पर आग तब तक फैल चुकी होती है।
सियासी बयानबाजी ने इसमें घी डालने का काम किया है। एक खेमा PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक के नाम पर गोलबंदी कर रहा है। दूसरा खेमा इसे “तुष्टिकरण की नई बोतल” कहकर पलटवार कर रहा है। सत्ता पक्ष द्वारा तैनाती-पोस्टिंग में “सजातीय झुकाव” दिखता है। सत्ता पक्ष का विपक्ष पर पलटकर आरोप है कि सपा शासन में “यादव प्रेम” हावी था। नतीजा ये कि थानेदार का तबादला हो या लेखपाल की तैनाती, अब आदेश से पहले जाति का हिसाब लग जाता है।
पुलिस कार्रवाई सबसे ज्यादा बहस में है। जब भी एनकाउंटर या बुलडोजर की खबर आती है, अपराधी की जाति ट्रेंड कर जाती है। समर्थक कहते हैं “कानून का डंडा चला”, आलोचक कहते हैं “बदले की कार्रवाई हुई”। हाथरस, बांदा, गाजीपुर में हुई झड़पों के बाद दोनों पक्ष एक साथ थाने पहुंचे। एक ने कहा दबंगों को बचाया गया, दूसरे ने कहा दलित नाम पर घर गिरा दिया गया। पुलिस रिकॉर्ड दिखाती है, गांव वाले वीडियो दिखाते हैं। भरोसा वहीं दरक जाता है। समाजशास्त्री मानते हैं कि यूपी में राज्य कमजोर दिखे तो जाति सबसे मजबूत पहचान बन जाती है। नेताओं के नारे भी उसी गणित पर सेट हो जाते हैं जहां वोट दिखे। PDA हो या दूसरे समीकरण, असली सवाल ये है कि क्या हम संवाद की मेज पर लौटेंगे या हर घटना को जाति का रंग देकर समाज को और बांटेंगे। अगर यही तड़का चलता रहा तो यूपी की साझी मिट्टी धीरे-धीरे बिखर जाएगी। राज्य को अभी संभलना होगा-निष्पक्ष कार्रवाई, तेज संवाद और इस भरोसे से कि गांव सबका है, बिरादरी किसी एक की नहीं।

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