सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपनी विवादित ‘कॉकरोच’ टिप्पणी पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि उनकी आलोचना बेरोजगार युवाओं के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो फर्जी और नकली डिग्रियों के सहारे वकालत जैसे सम्मानित पेशों में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया के एक हिस्से ने उनकी मौखिक टिप्पणी को गलत ढंग से पेश किया।
स्पष्टीकरण अपनी जगह है, लेकिन यह विवाद एक बड़े सवाल को सामने लाता है। देश में बेरोजगारी सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं रह गई है, यह अब युवाओं के मनोबल, आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर सामाजिक संकट बन चुकी है। वर्षों तक पढ़ाई, कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाएं, आवेदन शुल्क, परीक्षा रद्द होना, पेपर लीक, कोर्ट केस और भर्ती अटकना, इन सबने लाखों युवाओं को भीतर तक थका दिया है। ऐसे माहौल में ऊंचे संवैधानिक पदों से निकला एक-एक शब्द बहुत मायने रखता है। अदालत का इरादा चाहे फर्जी डिग्रीधारियों या पेशे की गिरती शुचिता पर चोट करना रहा हो, लेकिन जब शब्द ‘बेरोजगार’, ‘परजीवी’ या ‘कॉकरोच’ जैसे प्रतीकों के साथ जुड़ते हैं तो वे पहले से निराश युवाओं को और आहत कर सकते हैं। न्यायपालिका से समाज केवल निर्णय ही नहीं, संवेदनशील भाषा की भी अपेक्षा करता है। यह भी सच है कि फर्जी डिग्री, फर्जी वकील, फर्जी पत्रकार या ब्लैकमेलिंग की आड़ में चलनेवाली तथाकथित सक्रियता पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे लोग किसी भी पेशे की गरिमा को नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन इस समस्या का समाधान पूरे बेरोजगार युवा वर्ग को संदेह की नजर से देखना नहीं हो सकता। आज जरूरत है कि सरकारें बेरोजगारी को आंकड़ों और घोषणाओं के पीछे छिपाने के बजाय युवाओं की वास्तविक मनोदशा को समझें। नौकरी न मिलना केवल आय का अभाव नहीं, बल्कि परिवार के सामने झुकती नजरों, टूटते आत्मविश्वास और भविष्य के अंधेरे का बोझ है। भर्ती वैâलेंडर समय पर निकले, परीक्षाएं पारदर्शी हों, परिणाम लटकें नहीं और रिक्त पद वर्षों तक खाली न रहें, यही युवाओं के प्रति असली संवेदनशीलता होगी।
मीडिया ने मेरे विचारों को गलत तरीके से पेश किया
अब सफाई देते हुए सीजेआई ने कहा कि मुझे यह पढ़कर बहुत दुख हुआ कि मीडिया के एक वर्ग ने कल एक मामले की सुनवाई के दौरान मेरे मौखिक विचारों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है। मैंने विशेष रूप से उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने फर्जी डिग्रियों की मदद से वकालत जैसे पेशे में प्रवेश किया है। ऐसे ही लोग मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य प्रतिष्ठित पेशों में भी घुसपैठ कर चुके हैं और इसलिए वे परजीवियों के समान हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने आगे कहा कि मुझे हमारे वर्तमान और भविष्य के मानव संसाधन पर गर्व है।
