मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: सहानुभूति की राजनीति अब कितने दिन चलेगी?

रुख-ए-सियासत: सहानुभूति की राजनीति अब कितने दिन चलेगी?

तौसीफ कुरैशी

राजनीति में संयोग कम होते हैं, संदेश अधिक होते हैं। कब क्या कहा जाए, किस समय कहा जाए और किस बात को इतना बड़ा बना दिया जाए कि असली सवाल पीछे छूट जाएं, यही सत्ता की सबसे पुरानी कला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया सोशल मीडिया संबोधन भी इसी कला का एक और प्रदर्शन था। उन्होंने कहा कि उन्हें गालियां दी गईं, उनकी मां को गालियां दी गईं और फिर उन्होंने बड़े दिल का परिचय देते हुए उन लोगों को क्षमा भी कर दिया। सुनने में यह उदारता लगती है। लेकिन लोकतंत्र में हर भाषण के बाद एक सवाल उठता है क्या पूरी कहानी कही गई? अगर राजनीतिक भाषा पर बात हो रही थी तो क्या यह स्वीकार करना भी जरूरी नहीं था कि पिछले दस-बारह वर्षों में भारतीय राजनीति की भाषा को सबसे अधिक किसने प्रदूषित किया? किसने विरोधियों को देशद्रोही कहा, किसने पूरे विपक्ष को अपमानित करने वाली उपमाएं दीं, किसने नेताओं के परिवारों तक को राजनीतिक हमलों का निशाना बनाया? क्या यह सब देश भूल गया है? प्रधानमंत्री चाहते तो एक वाक्य और जोड़ सकते थे `अगर मेरे द्वारा या किसी समर्थक, मेरे किसी सहयोगी या मेरे दल के किसी नेता ने भी किसी की मां-बहन या परिवार के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है तो वह भी गलत है। मैं उसकी भी निंदा करता हूं।’ लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि तब पीड़ित की बनाई गई तस्वीर पूरी तरह निष्पक्ष नहीं रह जाती। नरेंद्र मोदी की राजनीति का यह नया अध्याय नहीं है। यह उनकी सबसे सफल चुनावी रणनीतियों में से एक रही है।
जब भी राजनीतिक दबाव बढ़ा, उन्होंने स्वयं को व्यवस्था का सबसे बड़ा पीड़ित बताकर जनता की भावनाओं से संवाद किया। मणिशंकर अय्यर का `नीच’ वाला बयान याद कीजिए। उस बयान को केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं रहने दिया गया, उसे सामाजिक सम्मान, पिछड़े वर्ग के स्वाभिमान और व्यक्तिगत अपमान का प्रतीक बना दिया गया। चुनावी राजनीति में उसका लाभ भी मिला। लेकिन समय बदल चुका है। अब जनता केवल भाषण नहीं सुनती, पुराने भाषण भी याद रखती है। उसे याद है कि सोनिया गांधी के लिए वैâसी-वैâसी टिप्पणियां की गईं। उन्हें `जर्सी गाय’ तक कहा गया। उसे याद है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के लिए वैâसी भाषा बोली गई। उसे यह भी याद है कि सोशल मीडिया पर विरोधियों की मां-बहनों तक को किस तरह निशाना बनाया गया और अक्सर सत्ता पक्ष की ओर से उस पर कोई स्पष्ट आपत्ति नहीं आई। लोकतंत्र में नैतिकता चयनात्मक नहीं हो सकती। अगर गालियां गलत हैं तो सबके लिए गलत हैं।
अगर परिवारों को राजनीति में घसीटना अनुचित है तो यह नियम हर दल, हर नेता और हर समर्थक पर समान रूप से लागू होना चाहिए। लेकिन जब नैतिकता केवल अपने लिए जागती है और दूसरों के लिए सो जाती है, तब वह नैतिकता नहीं, राजनीतिक रणनीति बन जाती है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा विमर्श ऐसे समय सामने आता है जब देश में बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, किसानों, युवाओं और शासन से जुड़े सवाल तेजी से उठ रहे हैं। बहस मुद्दों पर होनी चाहिए, लेकिन बहस गालियों पर आ जाती है। सवाल जवाबदेही के होने चाहिए, लेकिन चर्चा सहानुभूति पर शुरू हो जाती है। यही राजनीति का सबसे पुराना जादू है मुद्दे बदल दो, बहस बदल जाएगी। लेकिन इस बार हवा कुछ बदली हुई दिखाई देती है। जनता भावनाओं से प्रभावित अवश्य होती है, पर अब केवल भावनाओं के आधार पर निर्णय नहीं करती। वह यह भी देखती है कि बोलने वाला अपने हिस्से की जिम्मेदारी स्वीकार कर रहा है या नहीं। केवल क्षमा करने से पहले आत्मस्वीकृति भी जरूरी होती है। देश को आज ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो कहे `गलत भाषा किसी की भी हो, वह स्वीकार्य नहीं है।’ जो अपने समर्थकों से भी वही अपेक्षा रखे, जो विरोधियों से रखता है। यही लोकतंत्र की असली मर्यादा है। यही नेतृत्व की असली ऊंचाई भी है। सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री को गालियां दी गईं या नहीं। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक संवाद की मर्यादा सबके लिए बराबर होगी? क्या सत्ता भी वही कसौटी अपने ऊपर लागू करेगी, जो वह विपक्ष पर लागू करती है? भारतीय लोकतंत्र अब पहले से कहीं अधिक परिपक्व है। जनता केवल शब्द नहीं सुनती, शब्दों के पीछे की मंशा भी पढ़ती है। इसलिए संभव है कि सहानुभूति की राजनीति का यह पुराना दांव अब पहले जैसा असर न दिखाए। क्योंकि लोकतंत्र में अंतत: जीत उसी की होती है जिसके साथ केवल भावना नहीं, विश्वसनीयता भी खड़ी हो।

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