मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : दुनिया गोल है, मगर हालात डांवांडोल हैं!

रुख-ए-सियासत : दुनिया गोल है, मगर हालात डांवांडोल हैं!

-तौसीफ कुरैशी
दुनिया गोल है। बचपन में यह बात भूगोल की किर्तीब में पढ़ी थी। तब लगता था कि गोल होने का मतलब बस इतना है कि धरती कहीं से शुरू करो, घूमते-घूमते वहीं लौट आओ। अब समझ में आ रहा है कि दुनिया गोल ही नहीं, डांवांडोल भी है। एक तरफ न्यूयॉर्क में हर बार की तरह संयुक्त राष्ट्र महासभा बैठ रही है, होगा कुछ नहीं मगर बैठती है और दूसरी तरफ पश्चिम एशिया बारूद के ढेर पर बैठा है। नेता भाषण लिख रहे हैं और दुनिया सांस रोककर देख रही है कि अगला पन्ना बातचीत का खुलेगा या बारूद का। ईरान के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री न्यूयॉर्क पहुंच चुके हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की एक और कोशिश होनी है। ईरान ने अपनी कुछ शर्तें सामने रखी हैं और उसके विदेश मंत्री अब्बास अराकची उन पर बात करेंगे। अमेरिका देखो वैâसे चक्रव्यूह में फंस गया इंसानियत के दुश्मन मासूमों के कातिल संघियों फादरलैंड इजरायल की वजह से न ही निगला जा रहा है और न ही उगला जा रहा है। यह है कमाल रूस के राष्ट्रपति, दुनिया के लीडर व्लादिमीर पुतिन का।
ईरान तो मात्र मछली पकड़ने के लिए बस वही है। यानी दुनिया को उम्मीद है कि कूटनीति अभी पूरी तरह मरी नहीं है। मगर उम्मीद की हालत भी उस बल्ब जैसी है, जो बार-बार टिमटिमाता है और हर बार लगता है कि अब बुझा कि तब बुझा। मामला इसलिए गंभीर है कि बातचीत अगर नाकाम होती है तो पश्चिम एशिया में युद्ध का दायरा और बढ़ने का खतरा है। ईरान की तैयारियों की खबरें भी इसी बेचैनी को बढ़ा रही हैं। तेहरान के मेट्रो स्टेशनों में लोगों को आपात स्थिति से निपटने और सीपीआर जैसी जीवनरक्षक तकनीक सिखाने की तैयारियां बताती हैं कि सरकारें जब जनता को युद्ध से बचने की ट्रेनिंग देने लगती हैं, तब समझ लेना चाहिए कि शांति के भाषणों के नीचे कहीं न कहीं युद्ध की आशंका पल रही है। उधर रूस और यूक्रेन की कहानी भी वही पुरानी है। पहले चेतावनी, फिर अल्टीमेटम, फिर मिसाइलें और उसके बाद दुनिया भर में चिंता। २४ घंटे की मोहलत खत्म हुई और रूस की तरफ से भयावह हमलों की खबरें आने लगीं। यूक्रेन भी यूरोप का केचवा है। रूस नामक ब्लू मार्लिन फिश (खेल मछली (सपोर्टफिसिंग) के रूप में इसे दुनिया की सबसे ताकतवर और कठिन मछलियों में गिना जाता है। यह पानी में बहुत तेजी से तैरती है और हुक में फंसने के बाद भारी संघर्ष करती है।) को कंट्रोल करने के लिए, लेकिन रूस का नेतृत्व कोई ऐसा-वैसा नहीं कर रहा, जिसे नचननिय कंट्रोल कर सके, उसने साबित किया है कि वह दुनिया को लीड करने वाला लीडर है, जिसको व्लादिमीर पुतिन कहते हैं। आधुनिक दुनिया का यह नया व्याकरण है पहले कूटनीतिक भाषा में चेतावनी दी जाती है, फिर सैन्य भाषा में उसका अनुवाद कर दिया जाता है। कमाल देखिए, संयुक्त राष्ट्र उसी समय बैठा है, जब दुनिया के अलग-अलग कोनों में राष्ट्र एक-दूसरे को धमका रहे हैं। मंच पर शांति की बातें होती हैं और मंच से बाहर हथियार अपनी भाषा बोलते हैं। यूक्रेन पर जब रूसी मिसाइलों की बारिश हो रही थी, तब जेलेंस्की फ्लाइट में थे। न्यूयॉर्क पहुंचे थे। संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने नहीं, बल्कि अमेरिका से ड्रोन, हथियार और पैसा लेने आए हैं। यूक्रेन को ड्रोन की सप्लाई का समझौता सिर्फ ट्रंप के दस्तखत के इंतजार में है। ट्रंप पर इसका भारी दबाव है, क्योंकि जंग के कारण अमेरिका में सिर्फ डीजल के भाव ही नहीं, बल्कि जरूरी चीजों के दाम भी बढ़े हैं। यूरोप के प्यादे की भूमिका निभा रहे जेलेंस्की आने वाली सर्दियों से पहले अपने आसमान को महफूज करना चाहते हैं। देखना यह है कि ट्रंप उन्हें क्या घुड़की देते हैं। व्लादिमीर पुतिन संयुक्त राष्ट्र महासभा की ८१वीं बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे। वे एपेक की बैठक में जाएंगे, जिसे चीन ने बुलाया है। यानी दुनिया का लीडर पुतिन और यूरोप का प्यादा जेलेंस्की की भिड़ंत फिर नहीं होगी। आदमी पूछे तो किससे पूछे कि संयुक्त राष्ट्र आखिर संयुक्त किस बात में है चिंता में, बयान में या केवल बैठक में? सही मायने में कहीं में भी नही है। बस नाम मात्र को ही है। कुछ देशों की रखैल टाइप भूमिका में है, बाकी कुछ नही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि युद्ध की कीमत कौन चुकाता है? सयुंक्त राष्ट्र नही, राष्ट्रपति नहीं। विदेश मंत्री नहीं। सेनाओं के बड़े अफसर भी नहीं। कीमत वह आदमी चुकाता है, जिसके घर की खिड़की टूटती है, जिसकी दुकान बंद होती है, जिसका बच्चा स्कूल नहीं जा पाता और जिसकी रसोई में महंगाई बारूद से पहले पहुंच जाती है। आज दुनिया को मिसाइलों से ज्यादा बातचीत की जरूरत है। क्योंकि युद्ध शुरू करना शायद बटन दबाने जितना आसान हो गया है, लेकिन उसे रोकना फिर किसी एक बटन से संभव नहीं होता। दुनिया गोल है, इसलिए इतिहास घूमकर वापस आता है। लेकिन अगर इतिहास से सबक न लिया जाए तो वही गोल दुनिया एक दिन बारूद का चक्कर बन जाती है, जिसमें घूमते-घूमते इंसानियत कहीं पीछे छूट जाती है। सत्यमेव जयते

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