मुख्यपृष्ठनए समाचाररेलवे पुलिस भर्ती प्रक्रिया में युवाओं के भविष्य से खिलवाड़!

रेलवे पुलिस भर्ती प्रक्रिया में युवाओं के भविष्य से खिलवाड़!

– ५ साल की बेरोजगारी, फिर अस्थायी नौकरी
– सरकारी मनमानी पर उठने लगे सवाल
जेदवी / मुंबई
रेलवे पुलिस बल में भर्ती के नाम पर रेलवे-प्रशासन युवकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है। दरअसल, नियुक्ति पत्र में सरकार ने साफ कर दिया है कि यह सेवा पूरी तरह अस्थायी होगी। रेल पुलिस बल में पांच वर्ष पुरानी भर्ती प्रक्रिया से चयनित उम्मीदवारों की नियुक्तियां अब शुरू की गई हैं। यह वही ‘पुलिस सिपाही भर्ती-२०२१’ है, जिसमें चयनित युवाओं को अब जाकर अस्थायी और तात्कालिक आधार पर नियुक्त किया जा रहा है। सरकार के अनुसार, नियुक्ति प्रक्रिया १२ जनवरी से शुरू हुई है, लेकिन यह देरी अपने आप में सरकारी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
आदेश के बाद टूटी सरकारी नींद
सरकार के मुताबिक, ये नियुक्तियां १७ नवंबर २०२५ को दिए गए निर्णय के आधार पर की जा रही हैं। लेकिन सवाल जस का तस है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था, तो चयनित युवा पांच साल तक बेरोजगारी और अनिश्चितता झेलने को क्यों मजबूर रहे?
२०२१ में भर्ती, २०२६ में ‘अस्थायी’ नौकरी
रेलवे पुलिस बल में वर्ष २०२१ में पुलिस सिपाही (ग्रुप-सी) पदों के लिए लिखित और शारीरिक परीक्षाएं ली गई थीं। सामाजिक और समांतर आरक्षण का पालन करते हुए चयन भी किया गया। कई उम्मीदवार वैद्यकीय परीक्षण, चरित्र सत्यापन और आरक्षण सत्यापन में भी सफल रहे, फिर भी नियुक्ति वर्षों तक लटकी रही।
युवाओं के तीखे सवाल
ऐसे में युवाओं के निम्नलिखित सवाल हैं।- पांच वर्ष की देरी का जिम्मेदार कौन? क्या इतनी लंबी देरी सामान्य मानी जा सकती है? आर्थिक, मानसिक और सामाजिक नुकसान की भरपाई कौन करेगा? ‘कभी भी सेवा समाप्त’ जैसी शर्तों को क्या नौकरी कहा जा सकता है? स्पष्ट है कि सरकार ने युवाओं को स्थायी भविष्य नहीं, बल्कि एक अनिश्चित और अपमानजनक विकल्प दिया है। पांच वर्षों तक प्रतीक्षा करवाने के बाद भी अस्थायी, असुरक्षित और एकतरफा शर्तों पर नौकरी देना व्यवस्था की गंभीर विफलता का प्रमाण है।
नियुक्ति के नाम पर खिलवाड़
नियुक्ति पत्र में सरकार ने साफ कर दिया है कि यह सेवा पूरी तरह अस्थायी होगी। शासन को आवश्यकता न रहने पर बिना कारण बताए और बिना पूर्व सूचना के सेवा समाप्त की जा सकती है। यह शर्त न केवल युवाओं में असुरक्षा पैदा करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सरकार उन्हें दोयम दर्जे का कर्मचारी मान रही है।

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