-संकल्प से शुरू करें सत्कार, तृप्ति के बाद तिलक-दक्षिणा देकर द्वार तक छोड़ें; मान्यता—साथ विदा होते हैं पितर
पितृपक्ष में ब्राह्मण अथवा किसी योग्य जरूरतमंद को भोजन कराना पितरों की तृप्ति का प्रमुख माध्यम माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मणों के साथ पितर वायुरूप में उपस्थित रहते हैं। इसलिए निमंत्रण से लेकर विदाई तक प्रत्येक कार्य श्रद्धा, विनम्रता और शुद्धता के साथ करने का विधान है।
एक दिन पहले दें निमंत्रण
श्राद्ध तिथि से पहले सदाचारी और योग्य ब्राह्मण को विनम्रतापूर्वक भोजन का निमंत्रण दें। उन्हें श्राद्ध की तिथि, समय और स्थान स्पष्ट रूप से बताएं। योग्य ब्राह्मण उपलब्ध न हो तो किसी जरूरतमंद, भूखे व्यक्ति, विद्यार्थी अथवा साधु को भोजन कराया जा सकता है।
घर और भोजन की शुद्धता
श्राद्ध वाले दिन घर और भोजन बनाने के स्थान की सफाई करें। स्नान के बाद स्वच्छ एवं सादे वस्त्र पहनें। भोजन ताजा, सात्त्विक और परिवार की परंपरा के अनुसार तैयार करें। संभव हो तो संबंधित पूर्वज की पसंद का कोई व्यंजन अवश्य बनाएं।
आमतौर पर खीर, पूड़ी, चावल, दाल, सब्जी, दूध, दही और घी से बने पकवान रखे जाते हैं। भोजन बनाते समय क्रोध, विवाद, अपशब्द और दिखावे से बचें।
भोजन से पहले पंचबलि
तैयार भोजन में से पांच छोटे भाग निकालें—
१. गाय के लिए
२. कुत्ते के लिए
३. कौए के लिए
४. देवताओं के लिए
५. चींटियों एवं अन्य छोटे जीवों के लिए
इसके बाद हाथ में जल, काले तिल, अक्षत, चंदन और पुष्प लेकर पूर्वजों के नाम से भोजन कराने का संकल्प करें।
भोजन कराने की मर्यादा
परंपरा के अनुसार ब्राह्मण को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठाया जाता है। भोजन प्रेम और सम्मान के साथ परोसें। अतिथि से पूछकर आवश्यकता के अनुसार सामग्री दें तथा उसे पूरी तृप्ति से भोजन करने दें।
भोजन के समय जल्दबाजी, कठोर व्यवहार या अपमान नहीं होना चाहिए। भोजन ग्रहण करने वाले व्यक्ति की सुविधा और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें।
तिलक, दान और आशीर्वाद
भोजन पूरा होने के बाद ब्राह्मण को हाथ-मुंह धोने के लिए स्वच्छ जल दें। उनके मस्तक पर चंदन या रोली का तिलक लगाएं। इसके बाद यथाशक्ति अन्न, फल, वस्त्र और दक्षिणा अर्पित करें।
दान अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार होना चाहिए। दिखावे अथवा कर्ज लेकर बड़ी दक्षिणा देना आवश्यक नहीं है।
द्वार तक करें विदा
ब्राह्मण अथवा अतिथि से पितरों और परिवार की सुख-शांति के लिए आशीर्वाद लें। उन्हें सम्मानपूर्वक घर के मुख्य द्वार तक छोड़कर आएं। धार्मिक मान्यता है कि भोजन ग्रहण करने वाले ब्राह्मणों के साथ उपस्थित पितर भी इसी समय संतुष्ट होकर विदा होते हैं।
उनके जाने के बाद परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और मित्र भोजन ग्रहण करें। श्राद्ध का वास्तविक उद्देश्य केवल विधि निभाना नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और जीवित समाज के प्रति सेवा का भाव प्रकट करना है।
