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प्रणवाक्षर :  राजनीति का टर्निंग पॉइंट?

प्रणव प्रियदर्शी

क्या हम आजाद भारत की राजनीति के एक अहम मोड़ का गवाह बनने जा रहे हैं? लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी कह चुके हैं कि जिस ढर्रे पर अब तक राजनीति की जाती रही है, वैसी ही की जाती रही तो सबकुछ खत्म मानिए। उनके मुताबिक, विपक्षी दलों के अस्तित्व की शर्त अब यही है कि राजनीति को रेजिस्टेंस मोड में लाया जाए यानी उसे प्रतिरोध का रूप दिया जाए। और अगर विपक्ष अपनी राजनीति के तेवर बदलता है तो जाहिर है, सत्ता पक्ष मुंह नहीं देखता रहेगा यानी देखते-देखते देश की समूची राजनीति बदल जाएगी।
विपक्ष की दिक्कत
राजनीति का रूप असल में कितना, वैâसा और कब तक बदलता है, यह तो देखनेवाली बात होगी, लेकिन अगर उसे बदलने की जरूरत इतनी शिद्दत से महसूस की जा रही है तो उसके पीछे क्या वजहें हैं? यह जरूरत विपक्षी खेमा बता रहा है, इससे इतना तो साफ है कि राजनीति के मौजूदा स्वरूप से दिक्कत उसी को है। चाहे बात लगातार सारे अहम चुनावी मुकाबले जीतने की हो या चुनाव से पहले और उसके बाद विधायक-सांसद जुटाने की, सत्तापक्ष को किसी तरह की दिक्कत नहीं हो रही। आफत विपक्षी दलों की है जो चुनावी दंगल में तो पिछड़ ही रहे हैं, जीत कर आए अपने विधायक-सांसद भी बचा नहीं पा रहे।
सत्तापक्ष की ओर झुकाव
सवाल उठता है कि दल-बदल तो पहले भी होते रहे हैं। अब के दल-बदल में ऐसा क्या है कि उसे राजनीति का स्वरूप बदलने के कारण के रूप में इस्तेमाल किया जाए? जो मूल तत्व अब के दल-बदल को ही नहीं, सत्तारूढ़ पक्ष के तमाम दांव-पेचों को अलग लेवल पर लेकर चला गया, वह है राज्य के तीनों अंगों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका समेत लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया का सत्तारूढ़ पक्ष की ओर झुकाव।
एकतरफा संचालन
विधायिका यानी संसद और विधानसभाओं में बहुमत तो सत्तापक्ष का हमेशा होता है, लेकिन इनका संचालन इतने एकतरफा ढंग से पहले कभी नहीं होता था। सदन में पीठासीन अधिकारी विपक्ष की राय का ही नहीं, उसकी भावनाओं का भी सम्मान करते थे। अपने लिए वह इस कसौटी को शिराधार्य करते थे कि सत्तापक्ष के साथ ही विपक्ष का भी भरोसा उन पर बना रहे। हाल के वर्षों में पीठासीन अधिकारियों की यह भावना लगातार कमजोर हुई है, जो समय-समय पर दिए उनके फैसलों में ही नहीं, उन पर विपक्षी दलों की आपत्तियों को संबोधित करने के उनके ढंग में भी झलकती रही है।
एजेंसियों का इस्तेमाल
कार्यपालिका हमेशा से सत्तारूढ़ दल के नेतृत्व में काम करती रही है। लेकिन सरकारी एजेंसियों का विपक्षी दलों और उनके चुनिंदा नेताओं के खिलाफ ऐसा बेधड़क इस्तेमाल कभी नहीं हुआ। विपक्षी दलों को परेशान करने, उनके नेताओं-कार्यकर्ताओं का मनोबल कम करने और विधायकों-सांसदों को अपनी ओर मिलाने के लिए सत्तापक्ष जिस बेशर्मी से इन एजेंसियों का इस्तेमाल कर रहा है, वह अभूतपूर्व है।
कहीं से संरक्षण नहीं
ऐसे हालात में विपक्ष को संरक्षण दो जगहों से मिल सकता था। एक तो न्यायपालिका और दूसरा मीडिया। मगर ये दोनों इस मामले में नाकाफी साबित हुए हैं। हाल के कई फैसलों ने विपक्षी दलों की इस उम्मीद को कमजोर किया है कि सत्तारूढ़ पक्ष की मनमानी पर रोक लगाने की उनकी कोशिशों को अदालत का समर्थन मिलेगा। जहां तक मुख्यधारा मीडिया की बात है तो वह तो पिछले डेढ़ दशक से जैसे सरकार का एजेंडा अपने कंधे पर लिए ही घूम रहा है। देश की राजनीति को सत्तारूढ़ पक्ष के चश्मे से देख रहा मीडिया संवैधानिक नैतिकता की चिंता छोड़ चुका लगता है।
करो या मरो
ऐसे में अगर राहुल गांधी राजनीति को प्रतिरोध के दौर में ले जाना चाहते हैं तो यह स्वाभाविक ही है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में येन-केन-प्रकारेण जीत सुनिश्चित करने के बाद जिस तरह से ममता बनर्जी की पार्टी को खत्म किया जा रहा है, शिवसेना के सांसद तोड़े जा रहे हैं, समाजवादी पार्टी के सांसदों पर भी निशाना लगाया जा रहा है, उससे बात शीशे की तरह साफ है कि अब विपक्षी राजनीति के लिए करो या मरो की स्थिति आन पड़ी है।
अंग्रेजों जैसी सरकार
राहुल गांधी ने इसका इलाज आजादी से पहले की महात्मा गांधी वाली कांग्रेस की प्रतिरोध राजनीति को बताया है, जिसमें ब्रिटिश सरकार से किसी तरह की अपेक्षा नहीं होती थी। वह कैसा भी, कोई भी कदम उठा सकती थी, उठाती थी। उससे निरपेक्ष कांग्रेस जनता को साथ में लेकर आगे बढ़ती रहती थी।
कोटा से शुरुआत
कोटा में स्टूडेंट्स के बीच राहुल गांधी ने दलीय राजनीति से ऊपर उठते हुए शिक्षा की समस्याओं को संबोधित करने का जो कदम उठाया, वह राजनीति को उसी प्रतिरोध शैली की ओर आगे ले जाने का प्रयास है। देखना होगा कि इस रास्ते पर उन्हें अन्य विपक्षी दलों का कितना साथ मिलता है, खुद कांग्रेस भी उस तरफ कितना आगे बढ़ पाती है। लेकिन अगर राहुल गांधी इस राह पर कुछ कदम भी मजबूती से बढ़ सके तो राजनीति को नया रूप मिलना तय है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

 

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