रिश्तों में अब प्रेम कहाँ है,
बातें झूठी , सत्य कहाँ है,
हम का सारा भाव कहाँ है,
मै मेरा ये संसार जहाँ है !!
रिश्ता होता लुप्त जहाँ है,
स्नेह, प्रेम वह प्यार कहाँ है,
दिल में दर्द, सत्कार कहाँ है,
आदर का दरकार कहाँ है ?
रिश्तों का वो मिठास कहाँ है,
मै, मेरे पर यह टिका जहाँ है,
माता पिता अब कौन कहाँ है,
सास ससुर तक जली शमां है !!
भाई मित्र इत्र सब बेवफा है,
धुँवा धुँवा सब प्यार वफा है,
रिश्तों से हर कोई खफा है,
भाई भाई मे लगा दफा है !!
संयुक्त परिवार अब हुआ हवा है,
चिंतन,मनन, संस्कार दिखावा है,
वृद्ध आश्रम माता पिता का दवा है,
बच्चे, बच्चियाँ खुद मे जवां हैं !!
वेदना,संवेदना मिटाता ये जहां है,
निष्ठुर परिकल्पना मे खड़ा जहां है,
मोबाइल ने किया शून्यता जहाँ है,
सद्विचार का लोप बढ़ रहा वहाँ है !!
अब कहाँ परिजन मे प्रेम बरसते हैं,
आज सारे रिश्ते स्नेह को तरसते हैं,
हर घरों के आपसी मिठास फिसलते हैं,
कुछ घरों के रिश्ते अजनबी फरिश्ते हैं !!
संजय सिंह ” चंदन “
धनबाद, झारखंड
