मुख्यपृष्ठटॉप समाचारउद्धव ठाकरे का तेज-तर्रार ‘ब्रांड ठाकरे' साक्षात्कार!..सिंदूर लेपित पत्थर है चुनाव आयोग!

उद्धव ठाकरे का तेज-तर्रार ‘ब्रांड ठाकरे’ साक्षात्कार!..सिंदूर लेपित पत्थर है चुनाव आयोग!

चुनाव आयोग एक ‘पत्थर’ है। उस पत्थर पर सिंदूर लगा देने मात्र से उसे ‘शिवसेना’ नाम और धनुष-बाण चिह्न किसी और को देने का अधिकार नहीं मिल जाता। यह नाम मेरे पिता और दादा ने दिया है। ठाकरे महाराष्ट्र के लिए संघर्ष करते रहेंगे!

पूर्वार्ध

संजय राऊत

शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने ‘सामना’ को एक तेज-तर्रार साक्षात्कार दिया। ‘ठाकरे ब्रांड’ को खत्म करने के लिए बाहर कुछ लोग बैंड बजा रहे हैं। उन ‘बैंड वालों’ का बैंड महाराष्ट्र की जनता अवश्य बजाएगी। इस तरह की जबरदस्त प्रतिक्रिया उद्धव ठाकरे ने व्यक्त की। उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र और देश के कई मुद्दों पर बेबाकी से सटीक जवाब दिए। चुनाव आयोग यानी ‘पत्थर’ है। उस पत्थर पर सिंदूर लगा देने मात्र से ‘शिवसेना’ नाम और धनुष-बाण चिह्न किसी और को देने का अधिकार उसे नहीं मिल जाता। उद्धव ठाकरे ने साफ शब्दों में कहा, ‘देश के लोगों को हमेशा अशांत, अस्थिर और चिंतित बनाए रखना ही भाजपा की नीति है, लेकिन लोगों को हमेशा मूर्ख बनाकर नहीं रखा जा सकता। खुद सरसंघचालक ने भी संकेत दिया है कि मोदी की ७५ साल की उम्र पूरी हो रही है!

उद्धव ठाकरे का यह साक्षात्कार जितना संयमी, उतना ही तूफानी हुआ।
महाराष्ट्र में कई हवाएं आईं और चली गईं, लेकिन ‘ठाकरी’ हवा अब भी कायम है। महाराष्ट्र में स्वार्थी राजनीतिक हवाओं को वो मात दे रही है। इन्हीं संदर्भों पर साक्षात्कार की शुरुआत हुई!

हमारी जड़ें कई पीढ़ियों से महाराष्ट्र की मिट्टी में जमी हुई हैं!

-उद्धवजी, महाराष्ट्र और देश में जबरदस्त घटनाक्रम चल रहे हैं। भले ही ये घटनाएं प्रत्यक्ष नजर न आ रही हों, लेकिन जैसे भूगर्भ में कुछ हलचलें चलती रहती हैं या परदे के पीछे कोई नई पटकथा लिखी जा रही होती है, उसी तरीके की गतिविधियां महाराष्ट्र में और बाहर भी चल रही हैं। इस पृष्ठभूमि में आप लगभग दो साल बाद इस इंटरव्यू के लिए मिल रहे हैं और आप अब ‘मन की बात’ व्यक्त करने जा रहे हैं। आपके मन में क्या भावनाएं हैं? आपके मन की बात क्या है?
शुरुआत में आपने जिन तरह-तरह की हवाओं का जिक्र किया, उन हवाओं में कुछ गैस के गुब्बारे भी हैं। जो कुछ समय के लिए तो ऊपर जाते हैं, पर जैसे ही गैस निकलती है, नीचे गिर जाते हैं…और जहां तक ठाकरी हवाओं की बात है, तो ठाकरे कोई हवा नहीं हैं। हमारी जड़ें तो पिछली कई पीढ़ियों से महाराष्ट्र की मिट्टी में जड़ तक जमी हुई हैं, गहराई तक पहुंची हुई हैं। मेरे दादाजी से लेकर शिवसेनाप्रमुख तक यह संबंध बहुत गहरा और मजबूत रहा है। अब मैं काम कर रहा हूं। आदित्य हैं। साथ में राज भी जुड़े हैं। ठाकरे का मतलब है सदा सर्वदा संघर्ष…और यह संघर्ष किसी मतलबी हवाओं के लिए नहीं है। समाज के हित के लिए हम हमेशा से यही करते आए हैं। हम सत्ता में कितने समय तक रहे, यह अलग बात है, लेकिन हम सत्ता के विरोध में, बल्कि जो अनिष्ट है, उसके विरोध में संघर्ष करते आए हैं। इसी वजह से ठाकरे ब्रांड को लोगों ने स्वीकार किया है, वह हमने नहीं बनाया। ठाकरे ईमानदार हैं। लोगों के लिए लड़ने वाले, जनता की व्यस्था-वेदनाओं को निडरता से उठाने वाले हैं इसलिए महाराष्ट्र की जनता इतने वर्षों से हमारे साथ बनी हुई है।
-यह जो ठाकरे ब्रांड आप कह रहे हैं, ‘ब्रांड’ यह शब्द बहुत इंट्रेस्टिंग है। दुनिया में कई बड़े-बड़े ब्रांड व्यवसाय में, उत्पादन में और व्यापार में आते हैं। फिर वो ब्रांड एक-दूसरे को खत्म करने के लिए संघर्ष करते हैं। फिर भी यह ठाकरे ब्रांड ५० साल से भी ज्यादा समय तक देश की राजनीति में टिककर खड़ा रहा है…
ठाकरे यह सिर्फ एक ब्रांड नहीं है। यह ब्रांड मतलब महाराष्ट्र की, मराठी माणुस की, हिंदू अस्मिता की पहचान है। इस पहचान को मिटाने की कोशिश कुछ लोगों ने की। मिटाने की इच्छा रखने वाले खुद ही मिट गए। कई लोग आए, कई लोग चले गए। जनता ने ही उन्हें मिटा दिया।
-ऐसा क्या है ठाकरे ब्रांड में कि आपकी तीसरी पीढ़ी इस ब्रांड के साथ समाजकार्य और राजनीति में सक्रिय है…
यह हम कैसे कह सकते हैं? यह तो जनता को बताना चाहिए। आज मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है। फिर भी जहां भी जाता हूं, लोग प्रेम से, आत्मीयता से स्वागत करते हैं। बात करने के लिए आते हैं। जो कुछ हो रहा है, उसके बारे में अपना गुस्सा, पीड़ा व्यक्त करते हैं। कुछ भी हुआ तो कहते हैं, हम आपके साथ हैं।
-इस ब्रांड को खत्म करने के लिए दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक कई लोग काम पर लग गए हैं कि अब हम इस ब्रांड को खत्म करके ही रहेंगे…
हां, यह सच है। ठाकरे ब्रांड को खत्म करने के लिए कई बैंड बज रहे हैं। क्योंकि उन्हें खुद के अलावा देश में कोई भी और नाम मंजूर नहीं है। अपनी तुलना वे भगवान से करने लगे हैं।
-देवा यानी देवाभाऊ या प्रत्यक्ष देव…
जो कोई भी होगा वह। ऐसे लोगों के बारे में क्या कहना? ये समय की धारा में आते हैं और समय की धारा में चले जाते हैं।
-बरसात में जैसे केंचुए निकल आते हैं, वैसे…
आप कुछ भी कहें। हमारी जो परंपरा है, अगर उसे कोई मानता नहीं है, तो वह परंपरा भी उसे स्वीकार नहीं करेगी।
-आपने कहा कि आज मेरे पास क्या है। हम सत्ता में नहीं हैं। राजनीतिक दृष्टि से आपको फंसाने की कोशिश हो रही है। ठाकरे का जो ‘शिवसेना’ ब्रांड है, वह फिलहाल आपके पास नहीं है। चिह्न आपके पास नहीं है…
मतलब जिनके पास कुछ भी नहीं है, जो अंदर से खोखले हैं, उन्हें ठाकरे ब्रांड की मदद लगती है, यही ठाकरे ब्रांड की खासियत है। जिन्होंने कुछ भी नहीं बनाया, कभी भी किसी भी क्षेत्र में कोई आदर्श खड़ा नहीं किया, फिर चाहे उन्हें सौ साल हो गए हों, अब उन्होंने ब्रांड की चोरी-चकारी शुरू की है। हम ही कैसे इस ब्रांड के भक्त हैं, यह बताकर अपना ही महत्व बढ़ाने की एक दयनीय कोशिश शुरू हुई है। जनता उन पर मोहित नहीं होगी।
-ठाकरे के भी भक्त हैं ही…
मैं हमेशा कहता हूं, मैं कोई नहीं हूं। मैं शून्य हूं। उद्धव ठाकरे का कोई अर्थ नहीं है। उद्धव बालासाहेब ठाकरे का अर्थ है। बालासाहेब हमेशा कहते थे, अपने पूर्वजों का आशीर्वाद कभी मत भूलना। हम जो कुछ भी हैं, वो उन्हीं के पुण्य कर्मों की वजह से हैं। हम शून्य हैं।
-पिछले कुछ दिनों से लगातार मेरे मन में सवाल उठ रहा है। पक्ष नहीं है, चिह्न नहीं है, केवल एक ‘ठाकरे’ नाम पर आपका संघर्ष जारी है…
ठाकरे मतलब ही संघर्ष, यह एक समीकरण है। आओ सब कुछ चुरा सकते हो, लेकिन ‘ठाकरे’ यह नाम कैसे चुराओगे? नाम तो कोई चुरा ही नहीं सकता न। चिह्न या और कुछ चुरा भी लोगे तब भी लोगों का प्रेम वैâसे चुराओगे? लोगों का जो विश्वास हम पर है, वह कैसे चुराओगे?
-कुछ लोगों ने ‘मातोश्री’ पर भी हक जताने की कोशिश की। अब हमें ‘मातोश्री’ भी दो, ‘ठाकरे’ नाम भी दो…
वह उनकी ही मातोश्री का अपमान है, जो खुद की मातोश्री को नहीं मानते।
-जिन्होंने ठाकरे ब्रांड पर ही सवाल खड़ा किया? चुनाव आयोग या दिल्ली में बैठे उनके मालिकों के जरिए यह भ्रम फैलाया कि मेरी ही शिवसेना और मेरा ही चिह्न असली है, वे अब अपनी डुप्लिकेट शिवसेना को मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा में विलीन करने निकले हैं। आप इसे किस नजर से देखते हैं?
उनके पास दूसरा विकल्प ही क्या है? गुरुपूर्णिमा के दिन उन्होंने जो किया, उसका वर्णन तो आपने हाल ही में मीडिया के सामने किया था। दिल्ली जाकर कितने पैर धोएंगे और चाटेंगे? उसी से पूरा दृश्य आंखों के सामने आ गया था। जो ऐसे लोग होते हैं, वो परावलंबी ही होते हैं।
-यह जो शिवसेना है…
कौन सी? हमारी है वह शिवसेना! शिवसेना एक ही है!
-अमित शाह और चुनाव आयोग ने जो शिवसेना दूसरों के हाथ में दी है, उसे इस तरह भाजपा में कैसे विलीन कर सकते हैं? शिवसेना का अस्तित्व समाप्त करने की कहीं यह कोशिश तो नहीं?
पर वो खत्म ही नहीं कर सकते। इतने साल हो गए, फिर भी वे जनता को मुझसे दूर नहीं कर सके इसलिए आत्मसमर्पण करना और मालिकों की पार्टी में विलीन हो जाना, यही उनके सामने आखिरी विकल्प बचा है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि चुनाव आयोग कदाचित हमारा चुनाव चिह्न किसी और को दे सकता है या प्रâीज कर सकता है, लेकिन ‘शिवसेना’ यह नाम वे किसी और को नहीं दे सकते। उन्हें उसका अधिकार ही नहीं है। क्योंकि यह नाम मेरे दादाजी और मेरे पिता ने दिया है। अगर मैं कल चुनाव आयुक्त का नाम बदलकर पत्थर रख दूं, तो चलेगा क्या? इस पत्थर को पक्ष का नाम बदलने का अधिकार नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अगर हमने कुछ उल्टा- पुल्टा व्यवहार किया होता तो बात अलग थी, लेकिन अगर हमने संविधान के अनुसार कोई गलती नहीं की हो, तो वे हमारा चिह्न भी नहीं छीन सकते। वोट प्रतिशत वगैरह जो भी है, वह सिर्फ चिह्न तक सीमित है। नाम किसी और को नहीं दे सकते।
-पर उस पत्थर ने यह किया ना!
उस पत्थर ने वो गैरकानूनी किया है। ‘शिवसेना’ यह नाम वह किसी और को दे ही नहीं सकता। वो उसके अधिकार के बाहर की बात है, लेकिन उस पत्थर को सिंदूर लगाने वाले दिल्ली में बैठे हैं। इसलिए फिलहाल यह सब चल जाता है।
-एक पत्थर चला गया और दूसरा कुर्सी पर बैठा है, लेकिन वह फैसला बदलने को तैयार नहीं है…
लेकिन लोग किसी भी पत्थर की नहीं सुनेंगे। आखिर में वो चोरी का माल है। एक तो चोरी से वोट लिया और उस पर सीनाजोरी, पर चोर तो चोर ही है।
-एक साल पहले नरेंद्र मोदी जैसे विष्णु के अवतार ने लोकसभा में बहुमत खो दिया। आप इसे किस नजर से देखते हैं?
हमारे यहां एक कहावत है। आप सभी को एक बार मूर्ख बना सकते हो, किसी एक को हमेशा मूर्ख बना सकते हो, लेकिन सभी को हमेशा के लिए मूर्ख नहीं बना सकते। इसी में सब कुछ आ गया। धीरे-धीरे लोग उस जादू से बाहर निकलने लगे हैं। आखिर जनता आपको कब तक मौका देगी? पांच साल…दस साल…ये देश के जीवन के कीमती साल हैं। वर्ष २०१४ में जो बच्चे दस साल के थे, वे अब २१ साल के हो गए हैं। उन्हें आपने जो कहा था कि हम नौकरी देंगे, उद्योग देंगे, तो वो सब अब कहां है? दस साल बहुत हो गए।

‘शिवसेना’ नाम किसी को नहीं दे सकते
‘शिवसेना’ यह नाम वे किसी और को नहीं दे सकते। उन्हें उसका अधिकार ही नहीं है। क्योंकि यह नाम मेरे दादाजी और मेरे पिता ने दिया है। अगर मैं कल चुनाव आयुक्त का नाम बदलकर पत्थर रख दूं, तो चलेगा क्या? इस पत्थर को पक्ष का नाम बदलने का अधिकार नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अगर हमने कुछ उल्टा- पुल्टा व्यवहार किया होता तो बात अलग थी, लेकिन अगर हमने संविधान के अनुसार कोई गलती नहीं की हो, तो वे हमारा चिह्न भी नहीं छीन सकते। वोट प्रतिशत वगैरह जो भी है, वह सिर्फ चिह्न तक सीमित है। नाम किसी और को नहीं दे सकते।
‘बंटेंगे तो कटेंगे’ कहना और बंटवारा खुद ही करना यही भाजपा की नीति है!

-मोदी ने बहुमत खो दिया, उसमें महाराष्ट्र की भूमिका महत्वपूर्ण थी। लोकसभा में महाविकास आघाड़ी ने ३१ सीटें जीतीं। यह कैसे संभव हुआ?
महाविकास आघाड़ी ने उस समय ताकत के साथ और एकजुट होकर चुनाव लड़ा। बूथ लेवल के कार्यकर्ता भी सतर्क थे। ‘अब की बार चार सौ पार’ यह संविधान बदलने के लिए था, यह जनता ने पहचान लिया और वोट किया। मोदी की सरकार झूठ बोलती है सिर्फ बातें करती है। यह जनता को समझ में आ गया। भाजपा की एक नीति है। आम लोगों को हमेशा चिंताग्रस्त, तनावग्रस्त रखना है। जाति-पांति में बांटना और आर्थिक स्तर पर उन्हें अस्थिर रखने के साथ ही पूरे देश में लगातार अस्थिरता बनाए रखना है। उसी अस्थिरता का फायदा उठाकर शासन करना भाजपा की नीति है। ‘तोड़ो, फोड़ो और राज करो’ यह अंग्रेजों की नीति अपनानी है। ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ कहना और बंटवारा खुद ही करना, यही नीति विधानसभा में उन्होंने अपनाई। लोकसभा के नतीजों के बाद भाजपा ने यह जहर चुनाव प्रचार में फैलाया।
-जो आपने लोकसभा में कमाया, वह विधानसभा में गवां दिया। सिर्फ छह महीनों में यह कैसे संभव हुआ?
हर बात में हाथ उठाने का कोई मतलब नहीं होता। कुछ बातों को जिम्मेदारी से स्वीकार करना चाहिए। ईवीएम घोटाला, मतदाता सूची, फर्जी मतदाता इन सब पर अब चर्चा शुरू हो गई है। मतदाता कैसे बढ़े, यह बात अब जनता के सामने आ चुकी है। ‘लाडली बहन’ जैसी फर्जी साबित हुई योजनाओं का भी असर पड़ा। चुनाव जब बड़ा होता है, तो विवाद थोड़े कम होते हैं। चुनाव क्षेत्र छोटा हो जाता है, तो प्रतिस्पर्धा बढ़ती जाती है। लोकसभा के समय महाविकास आघाड़ी में खींचतान हुई। सीट बंटवारे को लेकर हमने उस समय चार-चार, पांच-पांच बार जीती हुईं सीटें, ‘हमें जीतना है’ कहकर छोड़ दिए। विधानसभा के समय आखिरी दिन तक खींचतान चलती रही। ‘तू-तू, मैं-मैं’ हुई। इसका गलत संदेश जनता में गया। लोकसभा में प्रचार करते समय चिह्न नहीं था, लेकिन उम्मीदवार थे। विधानसभा में चिह्न तो था, लेकिन सीटें कौन सी और सीट मिलने के बाद यह तय नहीं था कि किसे उम्मीदवार बनाया जाए। यह एक गलती थी। इसे आगे सुधारना होगा। अगर यही गलती दोहरानी है, तो साथ आने का कोई मतलब नहीं है। सीट मिलने के बाद यह तय नहीं था कि किसे उम्मीदवार बनाया जाए। यह एक गलती थी। इसे आगे सुधारना होगा। अगर यही गलती दोहरानी है, तो साथ आने का कोई मतलब नहीं है।
-यानी समन्वय का अभाव था…
समन्वय के अभाव की अपेक्षा लोकसभा में मिला यश सभी के सिर चढ़ गया था। लोकसभा चुनाव के दौरान हमें जीतना है, यह अपनापन था, लेकिन विधानसभा में मुझे जीतना है, इस दौरान हम में जो ‘मैं’ आ गया, उसी के चलते पराजय हुई। इनमें किसान कर्जमाफी जैसे तकनीकी मुद्दे भी थे।
-भाजपा ने चुनाव से पहले कर्जमाफी का आश्वासन दिया था…
वह अभी भी नहीं हुआ। जब मैं मुख्यमंत्री था, तब मैंने बिना किसी के मांगे ही दो लाख रुपए तक का फसल ऋण माफ कर दिया था। मैं नियमित रूप से ऋण चुकाने वालों को ५०,००० रुपए की प्रोत्साहन राशि देने वाला था। दुर्भाग्य से, कोरोना के कारण मैं यह नहीं दे पाया। शुरू की और सरकार गिरा दी गई।
-आपने मुख्यमंत्री रहते हुए बहुत अच्छा काम किया। चाहे शिवभोजन थाली हो, कर्जमाफी हो, प्रॉपर्टी टैक्स खत्म किया गया हो। कोरोना काल में आपने दुनिया का सबसे बेहतरीन काम कर दिखाया। क्या आप ये सारे काम जनता तक पहुंचाने में नाकाम रहे? आज तो दूसरे नहीं किए गए कामों का भी ढोल पीट रहे हैं, लेकिन आपने अपने कामों का जिक्र तक नहीं किया…
बिल्कुल! बहुत अच्छा काम हुआ, पर उसे दबा दिया गया। लोकसभा में संविधान संशोधन का महत्वपूर्ण केंद्रीय मुद्दा था। विधानसभा के दौरान राज्य पर फोकस होना चाहिए था, लेकिन वह उतना नहीं हुआ। हमने कोरोना जैसे भीषण संकट में, अत्यंत विपरीत समय में, सफलतापूर्वक सरकार चलाई। उस समय योगी राज में गंगा में किस तरह लाशें बह रही थीं, गुजरात में किस तरह चिताएं जल रही थीं, ये सब तस्वीरें मीडिया में आ रही थीं। जनता और प्रशासन के सहयोग से, महाराष्ट्र में इतनी गंभीर स्थिति पैदा नहीं होने दी गई। सब कुछ सुचारु रूप से चला।
-आप इसके लिए किसे दोषी ठहराएंगे?
मैं किसी पर भी इसका ठीकरा नहीं फोड़ूंगा। महाविकास आघाड़ी बनने तक शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी एक-दूसरे के कट्टर विरोधी थे। हम सरकार बनाने के लिए एक साथ आए। पहले गठबंधन, चुनाव, फिर बहुमत मिलने पर सरकार, क्रम कुछ इस तरह होता है। हमारी यात्रा उल्टी रही। हमने पहले सरकार बनाई और फिर चुनावों का सामना किया। जब स्थिति सामान्य हो तब भी आदर्श तरीके से सरकार चलाना मुश्किल होता है, लेकिन उस वक्त, जब केंद्र सरकार से कोई समर्थन नहीं था और अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं थी, हमने यह कर दिखाया। उस दौरान हमारे किसानों ने अर्थव्यवस्था को संभाला। हम यह सब प्रचार में नहीं बोल पाए। महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव के दौरान घोषणाओं की लड़ाई थी। तुम २,१०० देते हो, हम २,५०० देते हैं, ३,००० देते हैं। अगर तुम यह करोगे, तो हम यह करेंगे, यही सब चल रहा था। उसमें हम लोगों को अपने अच्छे कामों के बारे में नहीं बता पाए।
-क्या आपको नहीं लगता कि लोग पैसों की बारिश में बह गए हैं? लोग उद्धव ठाकरे के काम की तारीफ आज भी करते हैं, तब भी करते थे…
ये तो अब भी माना जाता है कि पैसों की बाढ़ में कई लोग बह गए, लेकिन हमसे जो कमी रह गई, उसे हमें स्वीकार करना चाहिए। वह ये कि हमने जो काम किया, वो बता नहीं पाए। किसानों की कर्जमाफी, शिवभोजन और किसानों को कीमतों की गारंटी (एमएसपी) लॉ एंड ऑर्डर दुरुस्त रहा। हमने बहुत कुछ किया। कोरोना संकट के दौरान, मुख्यमंत्री के तौर पर मैंने सबके साथ समान व्यवहार किया। सभी को संभालने की कोशिश की। जरूरत पड़ी तो जिम्मेदारी के साथ ‘फेसबुक लाइव’ के जरिए लोगों के सामने पहुंचा। जनता ने मुझे अपने परिवार का ही माना। जिनसे मैं कभी मिला नहीं, वो मुझे अपने परिवार का मानते हैं इससे बड़ा सौभाग्य क्या है?
-क्या आपने सोचा था कि भाजपा को अकेले इतनी सीटें मिलेंगी?
मुझे छोड़िए, उन्होंने भी कभी सपने में नहीं सोचा होगा।
-भाजपा छोड़िए, शिंदे गुट को भी पचास से ज्यादा सीटें मिलीं। ये जादू-टोना है या कुछ और?
कदाचित उन्होंने डायनासोर काटा होगा।
-जब ऐसी काटा-काटी चल रही थी, अचानक पचास से ज्यादा सीटें ऐसी पार्टी को मिल गईं…
मैं जादू-टोने में विश्वास नहीं करता। अगर उन्होंने भैंसा काटा हो तो उस भैंसा की जान नाहक चली गई। मुझे बिल्कुल विश्वास नहीं है कि उसकी वजह से कुछ होता है, लेकिन उनके कर्मों से उनकी मानसिकता और मन का कालापन लोगों के सामने उजागर होता है। इस मानसिकता से पता चलता है कि दूसरों का बुरा चाहते हैं।
-राहुल गांधी को महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजे संदिग्ध लग रहे हैं। राहुल गांधी एक महत्वपूर्ण नेता हैं। वे लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। वे किसी भी विषय पर अच्छी तरह अध्ययन करने के बाद और सबूतों के साथ बोलते हैं। वे महाराष्ट्र के संदिग्ध नतीजों पर देश में और देश के बाहर, दोनों जगह बोलते हैं…
एक बात गौर करने वाली है कि इतना प्रचंड बहुमत मिला, लेकिन वो जल्लोष कहां हुआ? पूरे महाराष्ट्र को खुशी से झूमना चाहिए था, वो अवाक क्यों था? ग्रामीण इलाकों में कई लोग कहते हैं, हमने आपको मन बनाकर वोट दिया। फिर भी, हमें नहीं पता कि हमारे गांव में आपको इतने कम वोट वैâसे मिले? ऐसी स्थिति में क्या करेंगे? सबूत नष्ट कर दिए जा रहे हैं। ईवीएम हैकिंग का मुद्दा अलग है, लेकिन लोकतंत्र में अगर आरटीआई से आपको जानकारी मिल सकती है, तो मुझे भी जानकारी मिलनी चाहिए। बैलेट पेपर सिस्टम में मुझे आखिर तक पता होता था कि मेरा वोट कहां जा रहा है। सामने उम्मीदवार का नाम और एक निशान होता था। जब उस पर मुहर लगती थी, तो कागज इस तरह मोड़ा जाता था कि अगर स्याही गीली होती, तो वह उसी उम्मीदवार के नाम के ऊपर लगती थी। अब बटन दबाने पर मशाल पर लाइट जलती है, रसीद दिखाई देती है। लेकिन रसीद को लेकर संदेह है कि डाला गया वोट कहां जाता है? मेरा वोट कहां पर रजिस्टर होता है मुझे पता नहीं चलता। लाइट जलती है, आवाज आती है, रसीद दिखाई देती है, लेकिन गणना के वक्त वह नहीं गिनी जाती। और यदि उस पर ऑब्जेक्शन उठाया जाए तो प्रतीकात्मक गिनती की जाती है यानी वोट कहां दर्ज हुआ, ये जानने का हक छीन लिया गया है।
-क्या आप अब भी मानते हैं कि मतदान मत पत्रों के जरिए होना चाहिए?
बिल्कुल होना चाहिए। दरअसल, ईवीएम क्यों लाई गई थी? वोटों की गिनती का समय बचाने के लिए। फिर चुनाव प्रक्रिया तो एक-एक महीने चलती है, उस समय को क्यों नहीं जोड़ा जाता? अगर महाराष्ट्र में १ मई को और बिहार में ३० मई को वोटिंग हुई, तो बीच का समय तो निकल गया ना? अगर वोटों की गिनती में चार दिन और लग गए, तो कौन सा आकाश गिर पड़ेगा? अमेरिका और यूरोप में तो बैलेट पेपर से वोटिंग होती है। क्या वो देश हमसे पिछड़े हैं? मोदी खुद भी ईवीएम के खिलाफ बोल चुके हैं। भाजपा वालों को एक बार ये बात सुननी चाहिए।
-देश के मुख्य न्यायाधीश गवई की मां ने भी मांग की है कि मतदान बैलेट पेपर पर किया जाए…
बिलकुल सही। बैलेट पेपर पर वोट कराइए। फिर जो होगा होने दो। उसके बाद, अगर आप जीत गए और २८८ में से ५०० सीटें ले आए, तो कौन क्या कह सकता है!
-महाराष्ट्र में अचानक ६० लाख वोट बढ़ गए, राहुल गांधी बोले जानबूझकर की गई गड़बड़ी…
यह मुद्दा है ही। अचानक इतने सारे मतदाता आए कहां से? बिहार में वोटरों से अपनी पहचान साबित करने को कहा जा रहा है, ये कैसी बात है? और अगर आधार कार्ड वोटर की पहचान के तौर पर मान्य नहीं किया जाए तो फिर इसे पहचान के तौर पर क्यों दिया जाए? तो क्या आधार कार्ड फ्रॉड है? इसकी प्रिंटिंग वगैरह किसलिए होती है? वे ठेकेदार कौन हैं, सब कुछ बताइए? ये एक तरह का एनआरसी ही है। इसे हिंदुओं पर भी लागू किया गया है।
फर्जी मतदाताओं पर चर्चा शुरू
ईवीएम घोटाला, मतदाता सूची, फर्जी मतदाताओं पर अब चर्चा शुरू हो गई है। मतदाता कैसे बढ़े, यह बात अब जनता के सामने आ चुकी है। ‘लाडली बहन’ जैसी फर्जी साबित हुई योजनाओं का भी असर पड़ा। चुनाव जब बड़ा होता है, तो विवाद थोड़े कम होते हैं। चुनाव क्षेत्र छोटा हो जाता है, तो प्रतिस्पर्धा बढ़ती जाती है। लोकसभा के समय महाविकास आघाड़ी में खींचतान हुई। सीट बंटवारे को लेकर हमने उस समय चार-चार, पांच-पांच बार जीती हुईं सीटें, ‘हमें जीतना है’ कहकर छोड़ दिए। विधानसभा के समय आखिरी दिन तक खींचतान चलती रही।
शिवसेना को बड़ा बनाने वाले आज भी मेरे साथ हैं! 

-अब ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ थोपा जा रहा है…
उनका पूरा रास्ता अधिनायकवाद की ओर जा रहा है। शुरुआत में हमें भी यह प्यारा लग रहा था। धारा ३७० हटाने के मुद्दे पर हम भी उनके साथ थे। वह नारा था ‘एक निशान, एक विधान, एक प्रधान’। अब वे ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ करेंगे, फिर ‘वन नेशन, वन लैंग्वेज’ करेंगे। नड्डा ने कहा, देश में सिर्फ एक पार्टी होगी। इसका मतलब है कि भविष्य में यहां ‘वन पार्टी, वन इलेक्शन’ होगा।
-देश की राजनीति में, या यूं कहें कि महाराष्ट्र की राजनीति में, सत्ता और धन का बेतहाशा इस्तेमाल हो रहा है। जो चल रहा है, उसे आर्थिक टेररिजम कहा जा सकता है। जिन्हें आपने बनाया, जिताया, जो कल तक आपकी जय-जयकार कर रहे थे, वो प्रलोभन के शिकार हो गए हैं। क्या ये देखकर राजनीति से उकताहट होती है?
इसे राजनीति की उकताहट कहने की बजाय, ऐसे राजनेताओं से उकताहट होती है, कहना चाहिए। क्योंकि जो कुछ भी हो रहा है, वह राजनीति नहीं है। जैसा कि बालासाहेब कहते थे, यह चर्मरोग है, खाज है। ये सत्ता की खाज है। जितना खुजाओगे, उतना ही बढ़ेगा। केंद्र और राज्य में सत्ता मिल भी जाए तो भी समाज और दुग्ध संघ की सत्ता चाहिए। वहां भी मेरा ही आदमी चाहिए। उन्हें इस तरह से सत्ता की खाज हो गई है।
-पहले विधायकों और सांसदों को तोड़ने की कोशिश की गई, चाहे वो कांग्रेस के हों, आपकी पार्टी के हों, या देश की दूसरी पार्टियों के हों और अब महानगरपालिका चुनाव में भी यही खेल फिर से होगा…
तो मैं क्या कह रहा हूं, ये लोग चुनाव प्रचार क्यों कर रहे हैं? अगर यही करना है, तो सीधे तौर पर चुने हुए विधायकों और सांसदों को तोड़कर सरकार बना दो। प्रचार करो ही मत!
-हालिया राजनीति में लोग जंगली जानवरों से भी अधिक हिंसक हो गए दिख रहे हैं…
हिंसक और एक जंगली के बीच अंतर है। राजनेता हिंसक होते हैं। जंगली जानवर का मतलब हिंसक नहीं। जंगल में कोई भी बिना वजह किसी पर हमला नहीं करता। बाघ और शेर तब तक शिकार नहीं करते, जब तक उन्हें भूख न लगे। यही प्रकृति का नियम है। वे सिर्फ भूख के लिए शिकार करते हैं। ऐसा नहीं है कि आज एक को मारो, कल दूसरे को मार दो। जानवर को मारकर उसे प्रिâज में रखने जैसी कोई बात नहीं होती। राजनीतिक दल सत्ता पाने के बाद भी और ज्यादा विधायक-सांसद पाने की कोशिश में लगे रहते हैं, वैसा बाघ और शेर नहीं करते। ये लोग राजनेताओं को तोड़ते हैं और उसे ठंडा कर सत्ता के प्रिâज में रख देते हैं।
-हमारी पार्टी से जो आउटगोइंग जारी है, इसका उपाय क्या है?
कभी-कभी जमे हुए पानी को थोड़ी सी निकासी देनी पड़ती है और नई धारा के लिए रास्ता बनाना होता है। कभी-कभी भावनाओं में या प्रेम के मामले में कोई व्यक्ति अयोग्य होता है फिर भी हम उसे दूर नहीं करते, लेकिन जब वह खुद ही चला जाता है और उसकी जगह कोई दूसरा ले लेता है, तब हमें अच्छा लगता है कि चलो, एक मुसीबत चली गई! अब जो हमारे बीच से चले गए हैं, वे वहां जाकर कौन सा उजाला पैâला रहे हैं, यह आप देख ही रहे हैं इसलिए ऐसे लोग चले ही जाएं तो अच्छा।
-शिवसेना एक विचार था और है। शिवसेना एक चुंबक है, ऐसा बालासाहेब कहा करते थे। लोग उस विचार से जुड़कर रहते थे। क्या उस चुंबक का असर अब कम हुआ है?
सामान्य जनता और साधारण कार्यकर्ता, जो कभी कुछ मांगने के लिए मेरे पास या शिवसेनाप्रमुख के पास आए ही नहीं, उनकी पीढ़ियां आज भी शिवसेना के साथ हैं। जिनकी कोई पहचान नहीं थी और जिन्हें शिवसेना ने बड़ा बनाया, उनमें से कुछ चले गए, लेकिन उन्हें बड़ा बनाने वाले लोग आज भी मेरे साथ हैं। यही मेरी ताकत है और यही उनकी असली तकलीफ है कि इतना सब करने के बाद भी यह खत्म कैसे नहीं हो रही?
-शिवसेना को लेकर उनकी तकलीफ अक्सर बाहर आ ही जाती है। गिरीश महाजन जैसे मंत्री शिवसेना को जमींदोज करने की बातें करते हैं…
शिवसेना तो जमीन से जुड़ी है इसलिए ही ये लोग शिवसेना को खत्म नहीं कर पा रहे हैं। हमारे पैर जमीन पर हैं और जड़ें जमीन के भीतर तक गई हैं। ये लोग जमीन के दुश्मन हैं, इसलिए तो मुंबई समेत सारी जमीन अपने दोस्त की झोली में डाल रहे हैं। ये लोग जमीन के दुश्मन और हम जमीन से दोस्ती करने वाले दोस्त हैं।
-दाढ़ी वाले मिंधे कहते हैं, मैंने तो सिर्फ आधी दाढ़ी पर हाथ फेरा। अगर पूरी दाढ़ी पर हाथ फेर दिया तो क्या होगा? आधी दाढ़ी में इतनी ताकत किसने भर दी?
उनकी आधी दाढ़ी बची है, यह तो उनका नसीब है। उन्हें ज्यादा बोलना नहीं चाहिए, वरना लोग उनकी इज्जत उतार देंगे और बची हुई आधी दाढ़ी भी उखाड़ देंगे। महाराष्ट्र में कई समस्याएं हैं, वहां वे दाढ़ी का इस्तेमाल क्यों नहीं करते?
-आप पूर्व मुख्यमंत्री हैं। आपने इस राज्य को संभाला है। आज भी आप विधानमंडल में जाते हैं, लेकिन वहां आप क्यों नहीं बोलते? ऐसा सवाल कई लोग पूछते हैं।
बोलने का कोई उपयोग नहीं। कल ही जो ‘जन सुरक्षा’ नामक बिल लाया गया, उस पर जो चर्चा हुई, उसमें सरकार ने हमारा कुछ सुना क्या? बिल में कुछ बदलाव करने को तैयार हों तो मैं बोलूं। अगर आप सब कुछ जबरन बहुमत के आधार पर ही करने वाले हैं, तो बोलने का क्या फायदा? उससे अच्छा मैं बाहर बोलता हूं, वही ठीक है।
-जन सुरक्षा बिल में आपको क्या घातक लगता है? सरकार का कहना है कि यह बिल जनता की, राज्य की, देश की सुरक्षा के लिए लाया गया है?
मुझे बताओ, जन सुरक्षा बिल से महिलाओं पर अत्याचार रुकने वाले हैं क्या? चोरी, हत्या, डकैती रुकने वाली है क्या? समृद्धि आदि महामार्गों पर हो रही लूटमार रुकने वाली है क्या? मैंने जैसा पढ़ा, उस बिल में कट्टर वामपंथी (लेफ्टिस्ट) विचारधारा का जिक्र है। मूल रूप से कट्टर वामपंथी का मतलब क्या? मूल रूप से वामपंथी विचारधारा और दक्षिणपंथी (राइटिस्ट) विचारधारा का मतलब क्या? वामपंथी विचारधारा में सामाजिक न्याय, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता को माना जाता है। दक्षिणपंथी विचारधारा में धर्म आधारित विचार, पूंजीवाद वगैरह का महत्व है। इसका मतलब वामपंथी विचारधारा में कुछ बातें अच्छी हैं और दक्षिणपंथी में कुछ बातें बुरी हैं। हमें बुरी चीजें छोड़कर अच्छी चीजें अपनानी चाहिए। अगर कोई कट्टर वामपंथी हो सकता है, तो क्या कोई कट्टर दक्षिणपंथी नहीं हो सकता? दक्षिणपंथी विचारधारा अगर धर्म पर आधारित है, तो पहलगाम में आतंकियों ने धर्म पूछकर गोलियां चलार्इं। तो क्या उन्हें ‘कट्टर दक्षिणपंथी’ कहकर छोड़ देना चाहिए? इसलिए ऐसा करने की बजाय आतंकवादी, राष्ट्र विघातक, राष्ट्र विरोधी ताकतों का विरोध होना चाहिए। हम अब तक उन्हीं के खिलाफ लड़ते आए हैं। नक्सलवाद या आतंकवाद खत्म करने के लिए हमारा पूरा समर्थन है।
-पोटा, मीसा, टाडा जैसे कई कानून आए। उन कानूनों का भाजपा ने विरोध किया था। उसी तरह का कानून अब नाम बदलकर महाराष्ट्र में लाया जा रहा है। आपको लगता है कि पहले के कानूनों की तरह ‘जन सुरक्षा कानून’ का दुरुपयोग होगा?
आठ-दस दिन पहले ही भाजपा ने इमरजेंसी की ५०वीं बरसी को याद दिलाने के लिए पूरे देश में अजीब तरीके से कई कार्यक्रम किए। इन लोगों ने तब इमरजेंसी का विरोध किया था, अब यही लोग इमरजेंसी लाना चाहते हैं, बल्कि कहें तो अघोषित इमरजेंसी ही लागू कर दी गई है। कम से कम इंदिरा गांधी ने तो खुलेआम इमरजेंसी लागू की थी, लेकिन इनमें तो उतनी हिम्मत भी नहीं है। इनके भी कुछ लोगों को पीएमएलए कानून के तहत फंसा दिए गया, पर कोर्ट ने उन्हें रिहा कर दिया। लेकिन अब यहां हमारे दल में आओ, वरना तुम्हें टाडा, मीसा लगाएंगे, यह सब शुरू हो गया है। अगर वाकई में आतंकवाद और नक्सलवाद खत्म हो गया है, तो अब यह कानून किसलिए? आपके पास ६४ नाम हैं तो उन्हें सार्वजनिक करें, उनके पाप उजागर करें और उन पर पाबंदी लगाएं, हमें कोई आपत्ति नहीं। पहलगाम घटना के बाद कार्रवाई के लिए हम सभी विरोधियों ने मिलकर प्रधानमंत्री को ठोस समर्थन दिया था। नक्सलवाद से लड़ते हुए अब तक कई पुलिसकर्मी, सीमा सुरक्षा बल के जवानों और ग्रामीणों ने बलिदान दिया। इन्होंने पहले ही शौर्य दिखाया है और नक्सलवाद को खत्म किया है। नक्सलवाद को खत्म करने के दावे के बाद अब ये लोग कानून ला रहे हैं?
-महाराष्ट्र में पिछले तीन महीनों में ६७५ किसानों ने आत्महत्या की। कर्ज का बोझ, फसल न होना…
इन किसानों की सुरक्षा का कानून कहां है? दो साल पहले उत्तर प्रदेश में किसान सड़क पर उतरे थे, तो इन्हीं लोगों ने उन्हें नक्सलवादी ठहरा दिया था। जब किसान अपने न्यायोचित अधिकारों के लिए उतरते हैं तो वे आतंकी कहलाते हैं। पंढरपुर यात्रा में भी ‘अर्बन नक्सल’ घुस आए हैं, ऐसा शोर मचाया गया। दरअसल, यात्रा में मत जाओ। ये लोग यही कहना चाहते थे। इन्हें हिंदुओं के त्योहार को भी खत्म करना है। यह कौन सा हिंदुत्व है?
-राज्य सरकार की मानसिकता पर आप क्या कहेंगे?
इस राज्य सरकार की मानसिकता पूरी तरह से उलझी हुई है। असल में उन्हें सत्ता में करना क्या है, यही अब तक समझ में नहीं आया है।
-महाराष्ट्र में ६७५ किसानों ने आत्महत्या की, यह देशभर में चर्चा का विषय बना। दुनियाभर के मीडिया ने इसे दिखाया। महाराष्ट्र निवेश और रोजगार के मामले में नंबर एक नहीं है। अगर कानून-व्यवस्था बिगड़ी हुई है और किसानों की आत्महत्या में महाराष्ट्र नंबर वन है, तो विपक्ष इनके विरोध में आवाज क्यों नहीं उठा रहा है?
चुनाव से पहले हमने जोरदार आवाज उठाई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि लोकसभा में नतीजे अच्छे आए। उसके बाद जो हुआ, उसने सभी को अचंभित कर दिया। अच्छा माहौल होते हुए भी ऐसा परिणाम कैसे आया? यह जीतने वाले और हारने वाले दोनों के लिए एक झटका था। इससे उबरना जरूरी है। अब लोगों को भी एहसास हो गया है कि उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई थी। अब यह संघर्ष और तेज होगा। शक्तिपीठ राजमार्ग किसके लिए बनाया जा रहा है? राज्य के पास पैसे नहीं हैं, लाडली बहनों को देने के लिए पैसा नहीं है। आदिवासियों का पैसा यहां डायवर्ट किया जा रहा है। मुंबई मनपा की तिजोरी पर डाका डाला गया। ढाई लाख करोड़ रुपए के भुगतान बकाए हैं। आत्महत्या करने वाले किसानों को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं, लेकिन खेतों के बीच से सड़कें बनाने वाले ठेकेदारों के लिए इनके पास पैसे हैं। यह ठेकेदारों की सरकार है। सड़कों पर गड्ढे हो रहे हैं, पुल गिर रहे हैं। कुछ दिनों पहले गुजरात में एक पुल गिर गया। ये भ्रष्टाचार के महामेरू पर्वत हैं।
-महाराष्ट्र में जातिगत राजनीति कायम है। उसे वैसे ही रखा जा रहा है। महाराष्ट्र को जाति-पांति में बांटना, विभाजित करना, उसके बाद फूट डालकर अपनी सत्ता कायम रखना है। यह भूमिका सत्ताधारियों की है…
ये लोग और क्या कर ही सकते हैं? लोगों के घरों में आग लगाकर अपनी रोटियां सेंकते हैं। कभी हिंदू-मुस्लिम, मराठी-गैरमराठी, तो हिंदुओं के बीच मराठा और गैरमराठा अलग करना, यही चल रहा है। बालासाहेब कहते थे कि मराठा और गैर-मराठा, ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण, छूत-अछूत, घाटी और कोंकणी, ये सारे भेद मिटाकर लोगों को एक-साथ मजबूती से आना चाहिए। अब वही एकता इनके आड़े आ रही है इसलिए अब वे इनमें तोड़फोड़ कर रहे हैं।
-हाल ही में एक अच्छी खबर आई है। छत्रपति शिवाजी महाराज के १२ ऐतिहासिक किलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। आप इसे कैसे देखते हैं?
ये निश्चित रूप से गर्व की बात है। हमारी सरकार ने भी इसके लिए काम किया। सबने कोशिश की, लेकिन अब जब ये किले यूनेस्को की सूची में शामिल हो गए हैं, तो लोगों के सामने इनकी बदहाली न आए, इसके लिए वहां अच्छा काम होना चाहिए। महाराष्ट्र आकर लोग क्या देखें, यह भी हमें पर्यटकों को बताना चाहिए। उस समय शिवशाही वैâसी थी? हमारे राजा, हमारे भगवान कैसे थे, उन्होंने कैसे शासन किया, किन विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने संघर्ष किया और उन्होंने इन किलों का निर्माण कैसे किया, उनका उपयोग वैâसे किया, ये सब दिखना चाहिए। इन किलों में भूगोल और इतिहास का अद्भुत संगम है। आज भी इन किलों पर चढ़ना कठिन है। उस समय हमारे मावले, शिवाजी महाराज और स्वयं जीजामाता यहां वैâसे आते-जाते थे? आज तो मोबाइल है, लाइट जैसी सारी सुविधाएं हैं। तुरंत संदेश जाता है। उस समय दुर्गम क्षेत्रों में जब कुछ भी नहीं था, तब राज्य स्थापित करना और उसे चलाना एक समझ से परे की बात है। हम इसे कभी नहीं समझ पाए हैं और न ही कभी समझ पाएंगे।
-हम अपना इतिहास भूलते जा रहे हैं। इतिहास का राजनीतिकरण किया जा रहा है…
लोग इतिहास से वो चीजें मिटाने लगे हैं, जो उन्हें नहीं चाहिए। कहीं इतिहास फिर से न लिखा जाए, इसका डर लगने लगा है। कुछ लोगों को लगता है कि इस देश में उनके अलावा कोई पैदा ही नहीं हुआ, ऐसी तस्वीर बनाई जा रही है। और यह खतरनाक है।

वरना तुम्हारे ऊपर टाडा, मीसा लगाएंगे
अब यहां हमारे दल में आओ, वरना तुम्हें टाडा, मीसा लगाएंगे, यह सब शुरू हो गया है। अगर वाकई में आतंकवाद और नक्सलवाद खत्म हो गया है, तो अब यह कानून किसलिए? आपके पास ६४ नाम हैं तो उन्हें सार्वजनिक करें, उनके पाप उजागर करें और उन पर पाबंदी लगाएं, हमें कोई आपत्ति नहीं। पहलगाम घटना के बाद कार्रवाई के लिए हम सभी विरोधियों ने मिलकर प्रधानमंत्री को ठोस समर्थन दिया था। नक्सलवाद से लड़ते हुए अब तक कई पुलिसकर्मी, सीमा सुरक्षा बल के जवानों और ग्रामीणों ने बलिदान दिया।
(क्रमश:)

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