सूरज सिंह
साधारण पृष्ठभूमि से शुरुआत
अमर नाईक का प्रारंभिक जीवन बेहद सामान्य बताया जाता है। आर्थिक तंगी के कारण उसने किशोरावस्था में ही कामकाज शुरू कर दिया। कहा जाता है कि वह सब्जी बेचने जैसे छोटे-मोटे काम करता था। दरअसल, सब्जी की वह दुकान दादर में उसके घरवाले चलाते थे। उनके सहयोग हेतु वह भी जाया करता था और स्थानीय बाजारों में मजदूरी भी करता था। परिवार की जिम्मेदारियों ने उसे कम उम्र में ही संघर्ष करना सिखा दिया। महानगरपालिका के करप्ट कर्मचारियों और पुलिस की हप्ताखोरी उसे रास नहीं आती। वह उन चीजों का हमेशा विरोध करता था।
अपराध की ओर झुकाव
मुंबई में उस दौर में बेरोजगारी, गिरोहबाजी और स्थानीय दबदबे की राजनीति चरम पर थी। छोटे-मोटे झगड़ों और वसूली के मामलों से उसका संपर्क अपराध जगत से हुआ। धीरे-धीरे वह स्थानीय गिरोहों से जुड़ गया। पहले वह छोटे स्तर पर उगाही और मारपीट जैसी वारदातों में शामिल हुआ, लेकिन समय के साथ उसका दायरा बढ़ता गया।
गैंग का गठन और वर्चस्व
कुछ वर्षों में अमर नाईक ने अपना अलग गिरोह खड़ा कर लिया। बिल्डरों, व्यापारियों और फिल्म जगत से जुड़े लोगों से रंगदारी वसूली, उसके नेटवर्क का प्रमुख हिस्सा बन गई। मुंबई के उपनगरीय इलाकों में उसका प्रभाव बढ़ता गया। कहा जाता है कि उसने संगठित ढंग से अपने गिरोह का विस्तार किया और प्रतिद्वंद्वी गैंगों से सीधे टकराव भी किए।
पुलिस की निगरानी और मुठभेड़
अपराधों की बढ़ती सूची के कारण वह पुलिस के रडार पर आ गया। मुंबई पुलिस की विशेष टीमों ने उस पर शिकंजा कसना शुरू किया। वर्ष १९९७ में पुलिस मुठभेड़ में उसकी मृत्यु हो गई। इस कार्रवाई में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी विजय सालस्कर का नाम प्रमुख रूप से सामने आया। पुलिस का दावा था कि यह आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई थी, जबकि कुछ लोगों ने इसे संदिग्ध मुठभेड़ बताया।
अनकही कहानी और बहस
अमर नाईक की कहानी सिर्फ अपराध की दास्तान नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवेश का भी प्रतिबिंब है, जहां अवसरों की कमी और गलत संगति युवाओं को भटका देती है। एक सब्जी बेचने वाला युवक वैâसे अपराध की दुनिया में उतरकर डॉन बना और अंतत: मुठभेड़ में मारा गया। यह कहानी आज भी कई सवाल खड़े करती है। मुंबई के अपराध इतिहास में अमर नाईक का अध्याय यह बताता है कि तेजी से मिली ताकत और भय का साम्राज्य अंतत: स्थाई नहीं होता। कानून के शिकंजे से बच पाना संभव नहीं, चाहे व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।
