मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : सीटें बढ़ाने से लोकतंत्र नहीं बढ़ता!

विजय-विमर्श : सीटें बढ़ाने से लोकतंत्र नहीं बढ़ता!

विजयशंकर चतुर्वेदी

संसद में सांसदों की संख्या बढ़ाने की बहस से अक्सर यह भ्रम पैदा होता है कि ५४३ सीटों को ८१६ या ८५० कर देने मात्र से लोकतंत्र अपने आप मजबूत हो जाएगा। लेकिन सीटें बढ़ाना और लोकतंत्र बढ़ाना दो अलग-अलग बातें हैं।
चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस में लगभग ३,००० प्रतिनिधि हैं और हम जानते हैं कि वहां लोकतंत्र गायब है। दूसरी तरफ अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में १९२९ से मात्र ४३५ सदस्य हैं और वैसा मजबूत लोकतंत्र दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता। स्पष्ट है कि संसद का आकार नहीं, उसकी स्वतंत्रता, जवाबदेही और गंभीर मुद्दों पर बहस की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण है।
संसद में जगह नहीं, इच्छाशक्ति कम है
भारत में १७वीं लोकसभा के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। केवल १६ प्रतिशत विधेयक ही समितियों के विचारार्थ भेजे गए। ३५ प्रतिशत विधेयक एक घंटे से भी कम चर्चा में और ५८ प्रतिशत विधेयक पेश होने के दो सप्ताह के भीतर पारित हो गए! ७२९ निजी सदस्य विधेयक पेश हुए, लेकिन उनमें से केवल दो पर चर्चा हुई। ऐसे में ३०० सांसद और जोड़ने से क्या बदलेगा? अगर ५४३ सदस्यों वाली संसद में पर्याप्त जांच-पड़ताल और बहस नहीं होती, तो ८१६ सदस्यों वाली संसद में वह अपने आप वैâसे बढ़ जाएगी? प्रतिनिधियों की संख्या तभी मायने रखती है जब उनकी आवाज का वजन भी बढ़े। परंतु सांसद आज महज एक आंकड़ा बनकर रह गए हैं।
आरएसएस की पुरानी मंशा
परिसीमन केवल प्रतिनिधित्व का नहीं, संघवाद का भी प्रश्न है। १९७६ में राज्यों की सीटें १९७१ की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दी गई थीं, ताकि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को राजनीतिक नुकसान न हो। यदि नई परिसीमन व्यवस्था में केवल जनसंख्या को ही प्राथमिकता दी गई तो राज्यों का राजनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। लोकतंत्र केवल व्यक्ति-आधारित प्रतिनिधित्व नहीं है; यह राज्यों की राजनीतिक आवाज का संतुलन भी बनाए रखता है। यहीं पर आरएसएस का वैचारिक रवैया साफ नजर आता है। एम.एस. गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में भारतीय संघीय व्यवस्था को खुलेआम ‘विघटन के बीज’ बताया था। उन्होंने लिखा था कि संविधान निर्माता ‘एक समरूप राष्ट्र’ की धारणा में दृढ़ नहीं थे, इसलिए उन्होंने संघीय ढांचा अपना लिया। गोलवलकर का स्पष्ट आह्वान था कि ‘संघीय संरचना की सारी बातों को हमेशा के लिए गहराई में गाड़ दो… सभी ‘स्वायत्त’ या अर्ध-स्वायत्त राज्यों के अस्तित्व को मिटा दो और घोषणा करो- ‘एक देश, एक राज्य, एक विधायिका, एक कार्यपालिका।’
उनके अनुसार भाषाई, क्षेत्रीय या सांस्कृतिक गर्व ‘हमारी एकता को तहस-नहस’ कर सकते हैं। यह कोई गुप्त दस्तावेज नहीं, आरएसएस की वैचारिक बाइबिल मानी जाने वाली किताब का हिस्सा है। मोदी सरकार आरएसएस की वैचारिक छाया में काम करती है। जब सीटें बढ़ाने और परिसीमन का प्रस्ताव आता है, तो सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह गोलवलकर के ‘एक देश, एक राज्य’ के सपने को धीरे-धीरे साकार करने की दिशा में उठा एक व्यावहारिक कदम है? इससे क्षेत्रीय शक्तियां बिखर जाएंगी और राष्ट्रीय स्तर पर एक ही शक्ति-केंद्र का दबदबा बढ़ेगा। आज सवाल यह है कि मोदी सरकार भारत को किस दिशा में ले जाना चाहती है? क्योंकि लोकतंत्र सीटों की गिनती से नहीं, असहमति की गुंजाइश और राज्यों की स्वतंत्र आवाज से मजबूत होता है। इसलिए आशंका यह भी है कि कहीं सत्ता पक्ष के सांसदों की तरह विपक्ष के सांसद और उनके राज्य भी केंद्र की गुलामी के लिए मजबूर तो नहीं कर दिए जाएंगे।
बढ़ी हुई सीटों का भ्रम
जब सांसदों को विधेयकों पर चर्चा का पर्याप्त समय नहीं दिया जाता, समितियां निष्प्रभावी कर दी जाती हैं और सरकार सवालों का जवाब देने को बाध्य नहीं होती, तो असंख्य छोटे निर्वाचन क्षेत्र भी लोकतंत्र को कितना मजबूत कर पाएंगे? एक और व्यावहारिक समस्या यह है कि यदि आठ सौ से अधिक सदस्यों वाली संसद को अधिक समितियों, शोध-सहायता, स्टाफ और विधायी तैयारी का सहारा नहीं मिलेगा, तो बहस बेहतर होने के बजाय समय-संकट में फंस सकती है। तब बड़ी संसद केवल भीड़ वाली जगह बनकर रह जाएगी। छोटे निर्वाचन क्षेत्र सांसदों को मतदाताओं के करीब ला सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता इस बात से भी तय होती है कि सांसद सत्ता से कितने स्वतंत्र होकर सवाल पूछ सकते हैं। प्रतिनिधित्व की निकटता और सत्ता की जवाबदेही दो अलग चीजें हैं।

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