मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श : अलोकतांत्रिक भाजपा का लोकतंत्र बचाओ अभियान

विजय-विमर्श : अलोकतांत्रिक भाजपा का लोकतंत्र बचाओ अभियान

विजयशंकर चतुर्वेदी

दिल्ली के रामलीला मैदान में १ नवंबर को विपक्षी दलों की विराट रैली हुई। इसके जवाब में भाजपा ने ३ नवंबर को देशभर में ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान के तहत विरोध मार्च शुरू कर दिए। यानी जिस सत्ता से विपक्ष चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल पूछ रहा है, वही सत्ता अब विपक्ष को लोकतंत्र का दुश्मन बताकर लोकतंत्र बचाने निकल पड़ी है! यह विडंबना नहीं तो और क्या है? यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई भेड़िया शांति और अहिंसा का उपदेश देने लगे।
असहमति से इतना डर क्यों?
भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछना अराजकता नहीं, बल्कि नागरिक चेतना का प्रमाण है। लेकिन मोदी के शासनकाल में असहमति को संदेह, विरोध को षड्यंत्र और आंदोलन को देशविरोधी गतिविधि बताने की प्रवृत्ति लगातार दिखती रही है।
मई २०२३ में जंतर-मंतर पर न्याय की मांग कर रहे साक्षी मलिक, विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पहलवानों को जिस तरह दिल्ली पुलिस ने घसीटकर हिरासत में लिया और उनके धरनास्थल को उजाड़ दिया, वह लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का कौन-सा उदाहरण था? नीट और यूजीसी-नेट परीक्षाओं में अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों पर क्रूर पुलिसिया कार्रवाई हुई। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलनरत किसानों के रास्ते में कीलें ठोकी गर्इं और उन्हें कभी खालिस्तानी तो कभी विदेशी ताकतों का मोहरा बताया गया। सीएए के खिलाफ शाहीन बाग से लेकर विश्वविद्यालयों तक उठी शांतिपूर्ण आवाजों को भी देशविरोधी और अराजकतावादी बताने में सरकार के समर्थकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। सवाल है कि जब नागरिक अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरते हैं, तब मोदी सरकार को उनमें अराजकता क्यों दिखाई देती है?
संसद से संस्थाओं तक लोकतंत्र का संकुचन
लोकतंत्र की बुनियाद संवैधानिक संस्थाओं, जवाबदेह सरकार, मजबूत विपक्ष और नागरिक अधिकारों पर टिकी होती हैं। लेकिन मोदी सरकार ने अपने अब तक के कार्यकाल में हर लोकतांत्रिक मूल्य को कुचला है। भाजपा के घटिया तर्कों ने १६वीं और १७वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद लंबे समय तक खाली रखा। १७वीं लोकसभा में तो पूरे पांच साल उपाध्यक्ष का अनिवार्य चुनाव तक नहीं कराया गया। दिसंबर २०२३ में संसद की सुरक्षा में हुई चूक पर जवाबदेही मांग रहे १४६ विपक्षी सांसदों को निलंबित करके तीन नए आपराधिक कानूनों सहित अनेक महत्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा के पारित करा लिए गए। भाजपा की यह वैâसी संसदीय लोकतांत्रिक परंपरा है?
सूचनाधिकार कानून में २०१९ के संशोधन से सूचना आयुक्तों की सेवा-शर्तों पर केंद्र सरकार ने नियंत्रण बढ़ाया। २०२३ के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून ने आरटीआई के तहत सूचना पाने के अधिकार को संकुचित किया। दूसरी ओर, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून में उच्चतम न्यायालय द्वारा सुझाई गई चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद ३७० हटाने से पहले संचार सेवाएं बंद करना, राजनीतिक नेताओं को नजरबंद करना और नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाना भी इसी अलोकतांत्रिक शैली का उदाहरण था।
मोदी सरकार की मंशा?
भाजपा के लोकतंत्र प्रेम की एक और दिलचस्प तस्वीर पार्टी के अपने आंतरिक कामकाज में दिखाई देती है। नोटबंदी जैसे ऐतिहासिक पैâसले की जानकारी तत्कालीन मंत्रिमंडल तक को नहीं थी। २०२४ के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा संसदीय दल की औपचारिक बैठक के बजाय सीधे एनडीए संसदीय दल की बैठक में नरेंद्र मोदी को नेता चुना गया। प्रधानमंत्री का मीडिया के तीखे सवालों से लगातार बचना भी लोकतंत्र के प्रति उनके रवैये को उजागर करता है। अभी इंदौर की रैली में एक व्यक्ति द्वारा सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ बैनर दिखाने पर भाजपाई वैâलाश विजयवर्गीय का उसे सार्वजनिक रूप से धमकाना भी इसी तानाशाही का उदाहरण है।
दरअसल, इस पूरे राजनीतिक प्रहसन में मोदी सरकार की मंशा साफ है। वह सरकार चलाने के साथ-साथ विपक्ष की भूमिका भी हथियाना चाहती है। इरादा यह है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने की अनुमति भी उसी से मिले और विरोध करने की सीमा भी वही निर्धारित करे। इसीलिए भाजपा का मौजूदा अभियान एक राजनीतिक विरोधाभास बन गया है। उसकी तिरंगा यात्राओं और राष्ट्रवाद के प्रमाणपत्रों की कलई भी खुल गई है। लोकतंत्र मोदी का मुखौटा नहीं है, जिसे अपनी सुविधानुसार पहना और उतारा जा सके।
(वरिष्ठ पत्रकार, कवि-लेखक विजयशंकर चतुर्वेदी राष्ट्रीय नीति एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं।)

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