मुख्यपृष्ठस्तंभविक्रम-बेताल: राजा बिक्रम और बेताल की महंगाई पर महापंचायत!

विक्रम-बेताल: राजा बिक्रम और बेताल की महंगाई पर महापंचायत!

एम एम एस
-बेताल का कड़कता प्रश्न

कहानी पूरी करके बेताल ने हवा में एक कलाबाजी खाई, राजा के कान के पास आकर चटकारा लेते हुए बोला, `तो हे बुद्धिमान राजा बिक्रम! अब मेरे प्रश्न का जवाब दे। जिस देस में बड़े-बड़े सेठ ५६ से बढ़कर ३०८ हो जाएं, पर उसी देस की ८१ करोड़ से ज्यादा परजा `फिरी के अनाज’ पर टिकी हो और आम आदमी का भुरकुस निकल गया हो… क्या उसे `देस की तरक्की’ कहेंगे या `आंकड़ों का झुनझुना’ दिखाकर जनता को मामू बनाना?’
`सोच-समझ के बोलियो राजा! अगर सच छुपाया, तो तेरे इस मुकुट वाले सिर के छर्रे उड़ जाएंगे!’
रात का घुप्प अंधेरा, सन्नाटा ऐसा कि पत्ता भी खड़के तो कलेजा मुंह को आ जाए। राजा बिक्रम ने लपक कर लाश को पेड़ से उतारा, अपने मजबूत कंधे पर लादा और लंबे-लंबे डग भरते हुए श्मशान की तरफ चल पड़े।
तभी कंधे पर लेटा बेताल खिसियाकर हंसा और बोला, `अरे ओ बिक्रम राजा! पांव उठा रहे हो जैसे बिना तेल की गाड़ी और चेहरा बना रखा है जैसे बारह बज गए हों! रास्ता लंबा है भाई, तो सुन एक ऐसी `माया नगरी’ की रामकहानी, जहां का गणित देखकर बड़े-बड़े पढ़े-लिखों की मति मारी जाए। पर हां, मेरी शर्त मत भूलियो अगर बीच में तुने घोंघा-बसंत की तरह मुंह खोला, तो मैं फुर्र से पेड़ पर जा बैठूंगा!’
कथा: `माया नगरी’ का गजबै तमासा
`तो सुन बिक्रम! एक देस है, जहां के हाकिम और मंत्री ढोल पीटते हैं कि देस `तरक्की के घोड़े’ पर सवार है। पर वहां की भोली जनता का हाल ऐसा है मानो ऊपर की हंडिया सुंदर-सुंदर, भीतर देखो तो मूसर चंदर!
पिछले १२ साल में इस देस में ऐसी `महंगाई डायन’ पैठी है कि जीवन जीने का खरचा ६० प्रतिशत से ७० प्रतिशत तक ऊपर भकभका गया है। जो चीज पहले १०० रुपय्या की नोट दिखाने पर हंसते-हंसते मिल जाती थी, अब उसके लिए बटुए से १७० रुपय्या ढीले करने पड़ते हैं। जनता की जेब में ऐसा डाका पड़ा है कि लंगोटी तक की नौबत आ गई है!’
`चल, तुझे वहां के चूल्हे-चौके और रोने-धोने का देसी हाल सुनाता हूं,’ `अरे भाई, वहां एक `लोहे का लाल-पीला सिलिंडर’ आता है, जिसके भीतर कड़कड़ाती गैस भरी होती है। साल २०१३ में वो सिलिंडर मात्र ३९५ रुपए की `ढिबरी’ में मिल जाता था। अब २०२६ में उस `लोहे के मोटू’ को घर लाने के लिए ९३९ रुपय्ये की गड्डियां गिननी पड़ती हैं! औरतें चूल्हे के आगे बैठ के रो रही हैं और कह रही हैं ई तो छाती पर मूंग दलने वाली बात हो गई!’ `पेट्रोल-डीजल की कीमतें तो ऐसे भाग रही हैं जैसे खूंटा तोड़ के भैंस भागी हो। आम आदमी सोचता है कि गाड़ी में तेल डलवाए या बाल-बच्चन को सत्तू घोले।’ `२०१३ में जो सोना २७,००० रुपय्ये तोला था, वो अब २०२६ में १,४०,००० रुपय्ये पर जाकर ता-ता थैया कर रहा है! चांदी भी ३४,००० रुपय्ये किलो से कूदकर २,७४,००० रुपय्ये हो गई है। अब आम आदमी के लिए सोना-चांदी देखना मतलब पानी में चांद की परछाई देखना हो गया बस दूर से हाथ जोड़ लो!’ `सुन विक्रम, इस देस का सबसे चोखा तमाशा तो अमीर-गरीब की खाई है। यहां एक के घर हाथी झूमे, दूजे के घर चूहा भी न घूमे!’ `साल २०१४ में इस देस में केवल ५६ `बड़े वाले धनपन्ना’ थे। पर १२ साल बाद, यानी आज २०२६ में, उनकी गिनती बढ़कर ३०८ हो गई है! इनके घर में तो लक्समी जी ऐसे बैठ गई हैं जैसे गुड़ पर मक्खी।’ `देस के ऊपर के १० प्रतिशत मलाईदार लोग कुल मलाई का ५८ प्रतिशत हिस्सा अकेले ही गटक जाते हैं। और नीचे की ५० प्रतिशत बेचारी आधी-अधूरी परजा के हिस्से में आती है सिर्फ १५ प्रतिशत की खुरचन! इसे कहते हैं अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को देय।’ `हे राजा! पिछले १० साल में एक आम आदमी का महीने का घरेलू खरचा ढाई गुना बढ़ गया है कि घर के खरचे का `भट्ठा बैठ गया।’ अगर १० साल पहले किसी का घर-परिवार २०,००० रुपय्ये में ठाठ-बात से चल जाता था, तो आज वैसी ही सुक्खी रोटी चबाने के लिए भी ५०,००० रुपय्ये फूंकने भी कम पड़ रहे हैं। बड़े-बड़े बाबू डंके की चोट पर कहते हैं कि `कंगाली’ कम हो गई है, पर भीतर की बात यह है कि आज भी देस की १५.५ प्रतिशत जनता कंगाली की दलदल में गोते खा रही है।
बिक्रम ने अपनी मूंछों पर ताव दिया, गंभीर हुए और बोले, `देख बेताल! ई तो साफ-साफ ऊपर से लीपा-पोती, भीतर से ढहती कोठी वाला मामला है। इसे तरक्की कहना तो ऐसा है जैसे आंख के अंधे, नाम नयनसुख! जब देस की आधी से ज्यादा जनता फिरी के राशन के भरोसे `सांसें’ गिन रही हो और बीच का आदमी महंगाई के कोल्हू में तेली का बैल बनकर पिस रहा हो, तो चार-छह बड़े सेठों की तिजोरी भारी होने से पूरा देस अमीर नहीं हो जाता। आंकड़ों की बाजीगरी से पेट की आग नहीं बुझती, बेताल! ई तरक्की नहीं, बल्कि अमीर और गरीब के बीच का वो गहरा गड्ढा है, जिसे अगर समय रहते नहीं पाटा गया, तो पूरा खेल गुड़-गोबर हो जाएगा।’ `अरे वाह राजा! तुम तो बड़े घाघ निकले, सब सच उगल दिया! पर बाबू, तुमने मुंह खोल दिया, सो मैं तो चला फुर्रर…`यह कहते ही बेताल ने जोरदार ठहाका लगाया और राजा के कंधे से उड़कर वापस पेड़ की डाल पर जा लटका। बिक्रम ने अपनी धोती संभाली, तलवार कसी और लंबी सांस खींचकर फिर से पेड़ की तरफ लपक पड़े।

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