महेश राजपूत
नरेंद्र मोदी द्वारा जनता को पेट्रोल, डीजल और गैस का उपयोग ‘संयम’ से करने की सलाह ने एक नई बहस छेड़ दी है। जहां सरकार इसे राष्ट्रहित और बचत का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और आलोचक इसे गुजरात के पुराने GSPC प्रोजेक्ट की विफलताओं और सरकारी खर्चों से जोड़कर देख रहे हैं।
इसी बीच गुजरात से एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है। जो पीएम मोदी की सलाह और विरोधाभास को स्टैब्लिश्ड करने की एक कोशिश है।
हालिया बयानों में प्रधानमंत्री ने जोर दिया है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर है, इसलिए नागरिकों को ईंधन बचाने की आदत डालनी चाहिए। हालांकि, वीडियो रिपोर्ट में इस पर कटाक्ष करते हुए कहा गया है कि जहां आम जनता से बचत की उम्मीद की जा रही है, वहीं राजनीतिक रैलियों, रोड-शो और वीवीआईपी दौरों (जैसे सोमनाथ यात्रा) में सरकारी तंत्र और ईंधन का भारी उपयोग होता है। आरोप है कि एक-एक रैली के आयोजन में करोड़ों रुपये का पेट्रोल-डीजल खर्च हो जाता है।
GSPC और २१ हजार करोड़ का विवाद
वीडियो का मुख्य टार्गेट गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन GSPC है। गुजरात सरकार की इस कंपनी ने कृष्णा-गोदावरी बेसिन में गैस और तेल की खोज के लिए भारी निवेश किया था।
उस समय दावा किया गया था कि यहां इतना तेल मिलेगा कि देश की ऊर्जा स्थिति बदल जाएगी।
विपक्ष के नेता शक्तिसिंह गोहिल ने आरोप लगाया था कि खोज के नाम पर गुजरात की जनता के २१,००० करोड़ रुपए बर्बाद कर दिए गए, लेकिन परिणाम शून्य रहा। आज भी वहां से व्यावसायिक रूप से तेल का उत्पादन न के बराबर है।
अधूरी गैस पाइपलाइन और भ्रष्टाचार के आरोप
साल २०१२ में एक महत्वाकांक्षी ‘कन्टी-लाइन प्रोजेक्ट’ शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य गुजरात से लेकर कश्मीर (श्रीनगर) तक गैस पाइपलाइन बिछाना था। इसमें मेहसाणा से भटिंडा (१७०० किमी) और भटिंडा से श्रीनगर (७५० किमी) तक पाइपलाइन बिछाई जानी थी।
रिपोर्ट के अनुसार, २०१४ में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बावजूद, २०२६ तक भी यह प्रोजेक्ट पूर्ण रूप से सफल नहीं हो पाया है। भटिंडा-श्रीनगर लाइन अभी भी विलंब और निर्माण की प्रक्रियाओं में फंसी हुई है।
विपक्ष ने आरोप लगाया था कि पाइपलाइन बनानेवाली कंपनियों (विशेषकर कच्छ की एक कंपनी) को कॉन्ट्रैक्ट देने के बदले भाजपा को ५०० रुपए करोड़ का चुनावी चंदा मिला।
विकास के वादे और हकीकत
एक समय नारा दिया गया था कि किसानों के खेतों और घरों में नल के जरिए ईंधन पहुंचेगा। लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि सरकारी कंपनियां कर्ज के बोझ तले दबी रहीं और अंतत: उएझ्ण् के गैस ब्लॉक को ध्र्उण् को बेचना पड़ा। आलोचकों का तर्क है कि जनता को ‘संयम’ सिखाने से पहले सरकार को उन हजारों करोड़ रुपए का जवाब देना चाहिए जो बिना किसी ठोस परिणाम के बड़ी परियोजनाओं में ‘फूंक’ दिए गए।
ऊर्जा की बचत निश्चित रूप से एक सराहनीय लक्ष्य है, लेकिन जब यह सलाह करोड़ों के कथित घोटालों और अधूरे प्रोजेक्ट्स की पृष्ठभूमि में आती है तो सवाल उठना लाजिमी है। क्या यह वास्तव में वैश्विक संकट का समाधान है या पिछली गलतियों और प्रशासनिक खर्चों पर पर्दा डालने की एक कोशिश? साझा किए गए वीडियो के दावों और विपक्ष के आरोपों पर आधारित है। सरकार ने पूर्व में इन आरोपों को निराधार बताया है।
