मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाव्यर्थ की बातों को हमने रातदिन सोचा बहुत है

व्यर्थ की बातों को हमने रातदिन सोचा बहुत है

-नवीन सी. चतुर्वेदी

गजल
व्यर्थ की बातों को हमने रातदिन सोचा बहुत है
क्या कहेंगे सब, हमें इस बात की चिन्ता बहुत है

यह चटोरी जीभ ही भरमा रही है हर किसी को
पेट भरने के लिए तो पाव भर आटा बहुत है

आप फूलों और फलों की बात ही क्यों कर रहे हैं
वृक्ष हैं माता पिता और वृक्ष की छाया बहुत है

जानकी की वंशजाओ धर्म ध्वज गिरने न देना
दुष्ट रावण के लिए तो एक ही तिनका बहुत है

आज भी सर्वत्र कुछ ऐसे पुरुष भी हैं जगत में
जिनका कहना है कि राघव के लिए सीता बहुत है

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