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यात्रा करें या न करें, रेलवे की कमाई तय…एक सीट, दो बार वसूली… ठगे जा रहे यात्री!

– ‘नो रिफंड’ पॉलिसी के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका

– तत्काल टिकट से रेलवे ने बटोरे १,०४२ करोड़ रुपए

जेदवी / मुंबई

कन्फर्म टिकट न मिल पाने की दशा में कई बार यात्री मजबूरी में तत्काल टिकट निकालते हैं, परंतु यात्री निकाले गए तत्काल टिकट पर यात्रा करें या न करें, भारतीय रेल की तिजोरी भरना तय है। मजबूरी में लिया गया यह तत्काल टिकट ‘नो रिफंड’ पॉलिसी के चलते यात्रियों के लिए आर्थिक शोषण का हथियार बन चुका है। महंगा टिकट, बेरहम नियम के चलते फायदा सिर्फ और सिर्फ रेलवे को हो रहा है।
तत्काल टिकट की नो-रिफंड नीति ने यात्रियों को पूरी तरह असहाय बना दिया है। किसी आपात स्थिति या मजबूरी में अगर यात्री कन्फर्म तत्काल टिकट रद्द करता है, तो उसे एक रुपए भी बतौर रिफंड नहीं मिलता। हैरानी की बात यह कि टिकट रद्द करने के बाद उस सीट को रेलवे दोबारा दूसरे यात्री को बेच देती है। यानी एक सीट, दो कमाई। इसी खुली लूट के खिलाफ मुंबई हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता व अधिवक्ता सचिन तिवारी ने रेलवे की इस नीति को मनमानी, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक करार दिया है। याचिका में कहा गया है कि यह नीति संविधान के अनुच्छेद-१४ (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद-२१ (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का सीधा उल्लंघन है। यात्रियों की मजबूरी को भुनाकर रेलवे खुलेआम आर्थिक अन्याय कर रही है।
आरटीआई से सामने आए आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। रेलवे ने टिकट रद्दीकरण शुल्क के नाम पर २०२२ में ८८७ करोड़ रुपए, २०२३ में १,०४२ करोड़ रुपए से अधिक की मोटी कमाई की है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह पूरा तंत्र यात्रियों की विवशता पर टिका हुआ है। याचिका में मांग की गई है कि कन्फर्म तत्काल टिकट रद्द होने पर उचित रिफंड दिया जाए। आपात परिस्थितियों में पूर्ण रिफंड की व्यवस्था हो, टिकट रद्दीकरण से होनेवाली आय का पूरा और पारदर्शी ब्योरा सार्वजनिक किया जाए।
फिलहाल, मामला मुंबई हाई कोर्ट में विचाराधीन है। अब अदालत तय करेगी कि रेलवे की ‘नो-रिफंड’ नीति यात्रियों के अधिकारों के अनुरूप है या फिर कमाई के नाम पर जनता के साथ अन्याय हो रहा है।

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