मुख्यपृष्ठधर्म विशेषराजा दशरथ ने किसे किया था प्रसन्न ?

राजा दशरथ ने किसे किया था प्रसन्न ?

शीतल अवस्थी

धर्म शास्त्रों के अनुसार, अयोध्या के राजा महाराज दशरथ ने शनिदेव की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया था। इस संबंध में एक कथा भी है। महाराज दशरथ जब अयोध्या के राजा थे, उस समय रोहिणी शकटभेदन का योग बना। यह बात ज्योतिषियों ने महाराजा दशरथ को बताई, साथ ही यह भी बताया कि इसके कारण १२ सालों तक भीषण अकाल पड़ेगा। इसे रोकने के लिए शनिदेव को प्रसन्न करना आवश्यक है, तब महाराजा दशरथ शनिदेव को रोकने के लिए नक्षत्र लोक जा पहुंचे और शनिदेव से रोहिणी शकटभेदन न करने की प्रार्थना की। लेकिन जब शनिदेव नहीं माने तो महाराज दशरथ शनिदेव से युद्ध करने के लिए तैयार हो गए। महाराज दशरथ का पराक्रम देखकर शनिदेव अति प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। तब महाराज दशरथ ने वर मांगा कि जब तक नदी, समुद्र, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी आदि रहें, तब तक आप रोहिणी शकटभेदन न करें। शनिदेव के वरदान देने पर महाराज दशरथ ने शनिदेव की स्तुति की। इसे श्रीदशरथ कृत स्तोत्र कहते हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार, इस स्तोत्र के जाप से शनिदेव बहुत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों का कल्याण करते हैं।
रामायण कवि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया संस्कृत का एक अनुपम महाकाव्य है। इसके २४,००० श्लोक हिंदू स्मृति का वह अंग हैं, जिसके माध्यम से रघुवंश के राजा राम की गाथा कही गई। रामायण के सात अध्याय हैं, जो कांड के नाम से जाने जाते हैं। बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किन्धाकांड, सुंदरकांड, युद्धकांड (लंकाकांड) और उत्तरकांड। इस प्रकार सात कांडों में वाल्मीकि ने रामायण को निबद्ध किया है। उपर्युक्त कांडों में कथित सर्गों की गणना करने पर सम्पूर्ण रामायण में ६४५ सर्ग मिलते हैं। सर्गानुसार श्लोकों की संख्या २३,४४० आती है, जो २४,००० से ५६० श्लोक कम है।

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