पंकज तिवारी
‘आखिर का बात अहै हो बूढ़ा? काहें सब के गोलियाइ लियाइ हऊ? काउ चलतबा तोहरे मना मा आज। कुछु बतउबउ करबू कि बस तमाशइ करबूऽ।’- ददा बोले।
रुपाली और उसकी मां, जो अइया के साथ-साथ भगी आई थीं, के भी समझ में कुछ नहीं आया था। रुपाली जिज्ञासावश अइया के आगे-पीछे घूमती रही थी और उनके बैठते ही पीछे खड़ी हो गई थी, जबकि बहुरिया, रुपाली की मां यहां भी ओट में ही खड़ी थी।
‘हां… हां… बतावथई… रचि के धीर धरऽ।’- अइया बोली।
बाकी दोनों बच्चे कब के खेलने निकल गए थे। बाहर भैंस खूंटे के चारों ओर दहंज कर माड़ बना दी थी। ददा चाहकर भी अब तब तक बाहर नहीं जा सकते थे जब तक कि अइया कह ना दे और अइया तब तक नहीं कहनेवाली जब तक कि उनकी बात पूरी न हो जाए। भैंस के चोकरने की गति भी बढ़ती ही जा रही थी। भगदड़ सी स्थिति बन गई थी जानवरों में। बाहर हवाओं का रुख भी स्पष्ट नहीं हो सका था अभी फिर अइया को इतनी जल्दी कौन जान पाये?
‘अइसन बा नातिन तूं तऽ कुलि सुनिन लिहे हऊ त तोहंसी कुछ चोराये से कवनउ फायदा त बा नाइ यंह से अब माई बिटिया दूनहउ जने सुनि लऽ।’
‘हां… हां… सुनाउ माई…’ खुशी में खनकती आवाज रुपाली की थी।
‘बुढ़ऊ आज कइ बरिस से देखुआरी करथयेन जनतइ अहत गऊ। लड़िका हेरत-हेरत ओनकर जूता खियाइ गऽ मुला लड़िका-लड़िका नाइ बलुक गुलरी क फूल होइ गऽ रहा। अउर येहर हम रहे कि अपने फूले जइसन नतिनी के रोज डहतै रहे, डाहत का रहे उ तऽ हमार आत्मइ जानथऽ। आत्मा का अब त हमार नतिनियउ जानि गइ बाऽ। खैर, इ तऽ बहुत निक भऽ कि बिटिया हमार जानि गइ नाहिं त ओकरे दुख क बोझा ओकरे गये के बादउ हमरे सीना पे धरा रहत। नातिन हमार, हमार करेजा हउ अउर अपने करेजा के केतना जतन से रखा जाथऽ सभै जानथऽ। हमहूं अपने करेजा के बड़े जतन से रखे रहे। हां, बीच-बीच में कभंउ-कभंउ चेल्लाइ के पड़त रहा त बस यंह बदे कि हमार करेजा जवने घरे जाइ जहिया वंह कभंउ कवनउ दुख न पांवइ यंह से कुली गुने ओका हम आगर कइ देइ चाहत रहे अउर भगवान के दया से उहउ पूरा होइगऽ। अब हमार नातिन जवने घरे में जाए लक्षमी बनि के जाए। संस्कार, संस्कृति, पूजा-पाठ, काम-काज कुलि गुने आगर बिटिया अपने घरे के स्वर्ग बनइ देये। बाकि रूप-रंग में त केउ बगले न लागे।’- अइया लगातार कहे जा रही थीं, जबकि कुछ ही देर बाद रुपाली अइया के गोद में सिर रखकर झुक गई थी और आंखों के नाव में आंसुओं के साथ कहीं दूर बहुत दूर बही जा रही थी। रुपाली की मां की आंखों में भी आंसुओं का सैलाब था। उधर ददा एक बार फिर से भावुक हो उठे थे। सभी के भीतर भावों का विकराल तूफान होने के बावजूद बाहर चारों तरफ सन्नाटा था। आवाज थी तो बस अइया की। अइया अब भी कुछ कहे जा रही थीं, जबकि सुनने वाले लोग बिल्कुल शून्य हो डूब चुके थे भावों के अतल गहराइयों में जहां कानों को सूंऽऽऽ… के अलावा और कुछ भी सुनाई नहीं दे सकता था।
‘अरे बूढ़ा बसि करऽ होऽ… मानि गये कि हां तुं बहुत मानथू अपने नतिनी के…। अब रचिके ओका चुपउ कराइ दऽ…।’
‘का…?’
‘हां देखत नाइ हऊ… कब से रोवत बाऽ तोहरे गोदी में मोह डारे…।’
अइया झट से रुपाली को उठाकर अपने गले से लगा लेती हैं और शांत कराने लगती हैं, जबकि बीच-बीच में खुद भी रोये जा रही थीं। आगे मामले को संभालने का प्रयास करते हुए वो फिर बोल उठीं-
‘देख पतोहु बहुत संकटे-संकटे अब जाइके भगवान हमार सब क गोहार सुनेनि हऽ अउर अच्छा दिन लउटाये हयेन। बियाहे जोगा लड़िका मिलि गवाऽ बाऽ…।’
क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
