पंकज तिवारी
गाना बजता रहा, दादी गाने के साथ झूमती रहीं। जामुन के नीचे पक्षियों की सुरीली आवाज के साथ ददा भी मस्त मगन हुए बैठे रहे, पत्तियों के लयात्मक गीतों ने अलमस्त माहौल पैदा कर दिया था। एक अलग ही सफर पर रहे दोनों कि गाना बंद हो गया। दादी अभी भी झूमती रहीं पर गीत बंद होते ही ददा की चिंता जाग उठी। ददा आंख बंद किए ही सोचने लगे- ‘कहां से लियाई एतना पइसा कि टीबी खरीदाइ जाइ, नोखइया के पइसा दिहे अबइ महीनउ नाइ बिता बा, पता नाइ वापिस कइ पाए कि नाइ उप्पर से ब्याज जाए जना जाबइ करेऽ। उधारउ लेई त केसी? एक साथेन एतना रुपिया के देएऽ? बूढ़ाऽ से पूछीऽ का कवनउ गहना-गुरिया देइ देऽइ का पताऽ…?’ मन के भीतर चल रहे अजीब जद्दोजहद के बीच ददा खुद से जूझते रहे कि बड़ी तेज खड़बड़ाहट हुई, ददा झट से पीछे की तरफ मुड़े। दादी भी उठ बैठी- ‘का भऽ हो बुढ़ऊ… सांस तेज गति से चढ़ने लगी थी पर उससे भी तेज भागी थी गिलहरी जो झट्ट से पेड़ पर चढ़ गई थी, जबकि उस पर झपट्टा मार दिया था उजरका कुकुर, पर पेड़ पर बड़ी-बड़ी आंख कर देखने के सिवा उसे और कुछ नहीं मिला था। गिलहरी को सुरक्षित देख ददा खुश हो गये थे और बड़ा सा ढेला लिए दौड़ा लिए थे कुकुर को। ‘मारऽ… मारऽ… मारऽ… दहिजरा के नातीऽ के… अबहां त लिहे रहा ओका… बेचारे क नान्ह क जीयइ नाइ बाऽ अउर ई ओकरे पीछे पड़ि गऽ रहाऽ।’
बड़े जोर से हंसने लगे ददा- ‘हमरेउ त नान्ह क जीये के पीछे तूं पड़ी हऊ… टीबी खरीदऽ… टीबी खरीदऽ…’
फिर भड़क गई दादी- ‘हे देख हम बताइ देथईऽ, हमइ न ढेर कऽ परेशान जिनि किहऽ, हम कहि दिहे त कहि दिहे। आज घरे में टीबी चाहे त चाहे…’ एकदम लाल तवे सा तमतमा उठी थीं दादी। ददा दादी के इस रूप से एकदम अनभिज्ञ थे, घबरा उठे- ‘बाप रे बाप! हे बूढ़ा तूं परेशान जिनि हो भइया, टीबी आज आये त आये चाहे कुछ होइ जाये।’ पीछे वैâलाश भी आ खड़ा हुआ था और टीबी आये, सुनते ही झूम उठा था और दौड़कर ददा के गले से लिपट गया। ददा नाती को पास पा खुश हो गये थे। ‘अब कुछु होइ जाए मुला टीबी त आइनि के रहे’ ददा भावनाओं में बहते हुए तुरंत उठ बैठे। ‘जे भैया… जे… तंइ माई के लगे बइठ त हम करिथऽ कुछु जुगाड़ तोरे टीबी कऽ। वैâलाश जाकर अइया के गोद में बैठ गया। ददा लफार मारे चल दिये गांव में पता नहीं किसके यहां।
‘देखे भइया कइसन भागेन हऽ तोर ददा… हमइ डेराथेन लागताऽ’- कहते हुए दादी जोर से हंसने लगीऽ थीं।
ददा बनिया बहोरी राम के घर पहुंच गये थे। ‘बहोरी हयऽ होऽ… हेऽ बहोरी…। अंदर से कोई भी आहट न पाकर ददा फिर बोल उठेऽ- ‘कवनउ हयेऽ रेऽ घराऽ में…’ बहोरी बहु हये रेऽ…।’ फिर से कोई आवाज बाहर नहीं आई। ‘घरा में कवनउ नाइ हयेन काऽ सोचते हुए ददा वापस लौटने लगे कि वहीं उपड़ौर सरियाते बहोरी बहु दिख गई। ‘के हयेऽ… बहोरिया बहु हयेऽ काऽ रेऽ?’ ‘हां ददा… कहां गऽ रह्यऽ…?’
‘तोरेन हिंया त गऽ रहेऽ…, कहां बाटेन बहोरी रेऽ…?’
‘ददा ओ तो कब्बइ कऽ निकला हयेन मुला अब खाइ क बेला भइऽ बाऽ अउतइ होइहंइ, जहां भी होइहंइ। चलंइ दुअरवां आप बइठंइ।’
‘नाहीं पतोहु जाइदे, हम जाथऽइ घरेऽ। बहोरी के हमरे घरे भेजि दिहे कि ददा आइ रहेन।’ ददा कुछ ही कदम आगे बढ़े थे कि साइकिल लिए बहोरी दिख गये। ‘का ददा केहर…? पाऽलागी। आवंइ दुवरवां बइठंइ।’
‘अरे बेटवा बहोरीऽ तोहरेन लगे हम आइ रहे यार, बड़े अच्छे सइते से तूं भेंटाइ गयऽ बेटवा।’
‘का भऽ ददा?’ ददा खड़े-खड़े ही बहोरी से धीरे से बतिया लिए थे, बात तय हो गई थी। कुछ ही देर बाद कई बोरी गेहूं ददा, बहोरी को तौल दिए थे और पैसा टेंट में गठिया लिए थे। अब बाकी पैसों के लिए सीधे नोखई के घर की तरफ मुड़ चले थे ददा। उधर अंगना में वैâलाश की मां इन सभी बातों से अनभिज्ञ पड़ोस से आइ इमरती बुआ से बतियाने में मस्त थी और खड़ी अरहर को भूज रही थीं। (क्रमश:)
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
