मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : ददा की बीमारी और दादी

काहें बिसरा गांव : ददा की बीमारी और दादी

पंकज तिवारी

‘पुअरा.., सरसौटा कुछ बाऽ का..?’
‘हां बाऽ न.., आवऽ हम देथई’ कहते हुए ददा गजहरी के पास पहुंच गए।
‘जा हो गदेलउ कुलि पुअरा लिहे आवत जाऽ त… जात जा जल्दी।’ देखते ही देखते सभी बच्चे बड़े सब पुअरा लाने पर टूट पड़े और इकट्ठा हो गया बहुत सारा पुअरा।
यहां शुकुल, नरेश को अंदर भेज कर हउदा के उस पार नीचे खूब सारा पुअरा समकिया के रखने के लिए बोल दिए, जबकि बाहर हउदा के इस तरफ भी अच्छे से पुअरा रखवाने लगे थे। कुछ ही देर में सीढ़ी की तरह का जगह बन गया। रात अब भी भारी ही थी, डरावनी तो थी ही। गोरुआर गिरने के बाद से तो सभी जैसे पगला से गए थे। जानवरों के दब जानें का डर सताने लगा था ये तो भला हो शुकुल का कि बच्चों को लगा कर दरवाजा बंद होने के बाद भी सभी को बाहर निकालने के लिए जुगत लगा दिए थे। हउदा के अंदर और बाहर दोनों तरफ ही पुअरा रख कर ऊंचा कर देने के बाद बारी-बारी सभी को हउदा के ऊपर से ही बाहर निकाल लिया गया। अब जाकर ददा के जान में जान आई थी। बारिश अब तक बंद हो गई थी।
‘हे ददा जब तक तोहार गोरुआर बन नाइ जात तब तक हमरे हिंया बान्हि दिहा करऽ कुलिन के’- जियावन के इतना कहते ही ददा का मन हरियरा उठा। मगन हो गए ददा। जियावन का गोरुआर बहुत बड़ा था उसमें अभी बहुत गोरू बांधे जा सकते थे।
सुबह हुई चारों ओर चहल-पहल का माहौल था। बंसवारी में पैर रखने पर खड़खड़ाहट को सुनकर किसी के होने का अंदाजा लगाया जा सकता था। वहां भोर से ही खड़खड़ाने की आवाज सुनाई पड़ने लगती थी। मोर, पपीहा, कोयल, कउआ जैसे सभी पक्षियों का शोरगुल चालू हो जाता था। वहीं बगल ही बहुत बड़ा बगीचा था। तालाब तो पूरे गांव भर के जानवरों के लिए पानी का गढ़ था। जामुन, नीम, आम, पीपल, बरगद तमाम तरीके के वृक्षों से पूरा गांव संपन्न था। सुबह धूप तेज थी, चारों तरफ चहल-पहल को देखकर सभी के खुशी का अंदाजा लगाया जा सकता था। बस एक घर ददा का था जहां दुख था। ददा सुबह से ही बिस्तर पर पड़े थे। दादी को कुछ शंका हुई सो ददा को उठाने पहुंच गर्इं, देखीं तो ददा का चेहरा एकदम से उतरा हुआ था। ददा खोखली आंखों से दादी को देखते रहे। ददा का ऐसा हाल देखकर दादी का तो करेजा ही बैठ गया। दादी चिल्ला पड़ी- ‘का भऽ हो बुढ़ऊ, काहें येस मोह बनए हयऽ। कुछ दिक्कत बा काऽ’- कहते हुए दादी ददा का माथा छू लीं। ददा की देह तवे सी तप रही थी।
‘अरे बुढ़ऊ.. तोहैं त बोखार बा होऽ।’
दादी माथे पर रखने हेतु ठंठी पट्टी के लिए घर की तरफ झटके में मुड़ी कि ददा ने हाथ पकड़ लिया।
‘हे बूढ़ा गेहुंआ त गवइ रहा गोरुअरवउ चला ग होऽ…, अब का होए..?’- ददा कराह उठे। आंखों में पानी उतर आया।
‘दादी जो ‘दऽ बुढ़ऊ तूं अबइ उहीं पड़ा हयऽ कह कर ददा को सांत्वना ही देने वाली थीं कि ददा के कहे शब्दों पर पसीज उठीं। आंसू दादी के नयनों में भी उतर आए।
‘सब ठीक होइ जाए हो बुढ़ऊ.., भगवान हयेन.. दुनिया में देर बा पर अंधेर नाइ बाऽ’- कहते हुए दादी गीली पट्टी लाने चल दीं कि उन्हें ध्यान आया। पट्टी से काम नहीं चलेगा। क्यों न बैद भइया को बुला लाऊं।
दादी सीधे वैद्य बिहारी के यहां पहुंच गई और सबेरे-सबेरे उनको लेकर घर आ गई। वैद्य चचा जो अपना डब्बा अपने साथ रखते थे, में से कुछ काढ़े और दवाइयां निकाल कर दादी को दिए और जल्दी ही बुखार के उतर जाने का आश्वासन भी देते गए।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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