मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव: नाती का दुख और दादी

काहें बिसरा गांव: नाती का दुख और दादी

पंकज तिवारी

पूरे गांव में सिर्फ दो ही घर ऐसे थे, जहां टी.वी. थी। राम सनेही चचा, जिनके यहां रामायण प्रसारण के दिन तो भीड़ ही टूट पड़ती थी। पूरा का पूरा दालान रामायण देखने वालों से भरा होता था। रोक-टोक नाम की चीज नहीं थी यहां। घर के सभी सदस्यों के चेहरे हमेशा खिले-खिले कमल लगते थे। टी.वी. देखने वालों का स्वागत मेहमानों की तरह होता था, जबकि ईश्वर ददा जिनका लड़का अभी-अभी वो भी पुरानी शटर वाली टी.वी. लेकर आया था। दोनों में फर्क साफ था। एक के यहां भीड़ तो दूसरे के यहां ‘लोग भाड़ में जाएं’ वाली स्थिति थी। ईश्वर ददा दरवाजे पर ही बैठे होते थे। मजाल कि कोई अंदर घुस जाए। जबसे टी.वी. आई थी बेचारे ददा नाहक ही दर्द मोल ले लिए थे और हमेशा गिद्ध की निगाह रखने लगे थे। एक काम फालतू बढ़ गया था उनके लिए। महिलाओं का भी आना मुश्किल हो गया था, भले ही वो अंदर बहू से हाल-चाल जानने के लिए ही आयी हों पर ददा को लगता था कि जरूर ये टी.वी. देखने ही आई है। ददा खुलकर तो नहीं भगा पाते थे, परंतु किसी न किसी बहाने घर के भीतर इतनी बार चक्कर लगा देते थे कि सामने वाली खुद-ब-खुद उठ कर चली जाए। जाते-जाते गरिया भी जाती थीं महिलाएं। बच्चे तो खूब चिढ़ाते थे। इधर झूलन ददा का नाती वैâलाश कब से चिल्लाए जा रहा था कि ददा टी.वी मंगा दीजिए… टी.वी. मंगा दीजिए… पर ददा को तो जैसे फर्क ही नहीं पड़ता था।
दादी भी लाख चिल्लाती थीं, पर नतीजा सिफर ही साबित होता। एक दिन तो हद ही हो गई। ईश्वर ददा खेतों के निरीक्षण हेतु ताल में गये हुए थे। बालक वैâलाश ईश्वर ददा के घर किसी बहाने से चला गया, मकसद तो वही, टी.वी. देखना ही था। आराम से भूंई बैठ गया था। संकोच में भी था कि कोई कुछ बोल ना दे। टी.वी. चलती रही, वैâलाश सहित ईश्वर ददा का पूरा परिवार किसी विशेष कार्यक्रम, जिसका प्रसारण सिर्फ रविवार को ही होता था, पर रामायण नहीं था, पूरे मनोयोग से देखने में लगा हुआ था। आनंद सभी के चेहरे पर साफ चमक रहा था कि हाय दइया… ददा के खखारने की आवाज…
सकपका गया वैâलाश, वैâलाश भागने की जुगत देखने लगा कि उधर टीबी में हीरो किसी को दौड़ा रखा था। वैâलाश को लगा कि पकड़ लेने के बाद क्या करेगा हीरो?, दृश्य वैâसा होगा? सोचकर ही रोमांचित हुए जा रहा था वैâलाश, जबकि उधर ददा के कदमों की आवाज कानों के और नजदीक सुनाई देने लगी थी।
वैâलाश निकलने के लिए झट्ट से खड़ा हो गया था, पर तब तक ददा आ ही गये। सभी सकपका उठे। बेचारे वैâलाश को कहीं छिपने का मौका भी नहीं मिल सका। वैâलाश को देखते ही ददा आगबबूला हो उठे। पहले तो अपने बेटवा पर खूब बरसे, उसके बाद वहीं कोने में दुबक गए वैâलाश को भी भला-बुरा कहने लगे थे-
‘एतनइ टी.वी. कऽ शउखीन रहा होते त अपने बाबू से कहिके मंगवाइ लिहे होते। इ दरे-दरे ठोकर न खात रहाऽ होतेऽ। चोरे की नाइ घरे में घुसि के बइठि गए, डेराबउ नाइ किहे कि ददा अइहीं त का होए?… नाहि तऽ’। धीरे-धीरे ददा की जुबान गंदी होती जा रही थी, जबकि बेचारा वैâलाश डर के मारे एकदम कांपने लगा था। घर के बाकी सभी लोग ईश्वर ददा को कोसने लगे थे, लेकिन उनकी भी अपनी सीमा थी जिसे लांघ पाना किसी के बस में भी नहीं था। किसी तरीके से जान छुड़ा कर वैâलाश रोते हुए, भागते हुए घर पहुंचा। दादी के गोंद में गिर कर धार-धार रोने लगा। दादी परेशान..। का भऽ रे भइया? केऽ मारेस्हऽ? ह्हां..? बताउ त, केउ कुछ कहेस हऽ का…?
क्रमश:

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