सैयद सलमान मुंबई
ईद-अल-अजहा, जिसे बकरीद के नाम से भी जाना जाता है, इस्लाम धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व हजरत इब्राहीम की उस महान आस्था और त्याग की याद में मनाया जाता है, जब उन्होंने अल्लाह के आदेश पर अपने प्रिय पुत्र की कुर्बानी देने का निश्चय किया था। यह घटना धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं है, बल्कि मानवीय मूल्यों, त्याग, करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी का भी संदेश देती है। भारतीय उपमहाद्वीप में बकरीद के नाम से प्रचलित यह पर्व आज के समय में सामाजिक एकता, भाईचारे और इंसानियत को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।
नेक नीयत
बकरीद का असली मकसद ‘तकवा’ यानी ईश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा और आत्मसंयम है। कुरआन की सूरह अल-हज में कहा गया है कि ‘अल्लाह तक न तो कुर्बानी का मांस पहुंचता है और न ही उसका खून, बल्कि केवल तुम्हारा तकवा, अर्थात नीयत की शुद्धता पहुंचती है।’ बकरीद हमें यह सिखाती है कि असली इबादत बाहरी कर्मकांडों में नहीं, बल्कि दिल की पवित्रता और दूसरों की भलाई में है। यह पर्व अपने अहंकार, स्वार्थ और कमजोरियों की कुर्बानी देने की प्रेरणा देता है, जिससे इंसान अपने भीतर झांककर आत्ममंथन कर सके।
इस पर्व की एक प्रमुख परंपरा है कुर्बानी के गोश्त का तीन हिस्सों में बंटवारा। एक हिस्सा अपने परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और मित्रों के लिए और तीसरा गरीबों व जरूरतमंदों के लिए। यह परंपरा समाज में बराबरी, करुणा और सहानुभूति का प्रतीक है। कोई व्यक्ति जब अपनी खुशी और संसाधनों को दूसरों के साथ बांटता है, तब समाज में आपसी विश्वास और सहयोग की भावना प्रबल होती है। यह पर्व उन लोगों को भी सम्मान देता है, जो अक्सर समाज के हाशिए पर रह जाते हैं और बताता है कि खुशियां तभी सार्थक हैं, जब वे सबके साथ साझा की जाएं।
बकरीद की एक और अहम सीख है सादगी और विनम्रता का महत्व। आज के डिजिटल युग में, जब सोशल मीडिया पर दिखावा आम हो गया है, यह पर्व याद दिलाता है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति का प्रदर्शन चुपचाप, बिना किसी होड़ या नुमाइश के किया जाना चाहिए। कुर्बानी की तस्वीरें या वीडियो साझा करना या महंगे जानवर खरीदकर उनकी नुमाइश करना, इस पर्व की भावना के विपरीत है। असली कुर्बानी वही है, जो केवल ईश्वर की खातिर, गोपनीयता और सादगी के साथ की जाए। धार्मिक कार्यों में दिखावे से बचना और नीयत की पवित्रता को प्राथमिकता देना ही इस पर्व की आत्मा है।
भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक देश में, जहां विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग साथ रहते हैं, बकरीद मनाते समय सभी की भावनाओं का सम्मान करना जरूरी है। विशेषकर शाकाहारी समुदायों, जैसे हिंदू और जैन समाज की संवेदनाओं का ध्यान रखते हुए कुर्बानी का आयोजन संयम और गोपनीयता के साथ किया जाना चाहिए। इससे सामाजिक सौहार्द और भाईचारा बढ़ता है और विविधता में एकता की भारतीय परंपरा मजबूत होती है। जब हर समुदाय एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करता है, तभी समाज में सच्ची एकता और शांति कायम होती है।
बकरीद का आर्थिक पक्ष भी उल्लेखनीय है। इस अवसर पर पशुओं की खरीद-फरोख्त से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। लाखों पशुपालक, किसान और छोटे व्यापारी इस पर्व के दौरान अपनी आजीविका कमाते हैं। अनुमान है कि भारत में बकरीद के मौके पर बीस हजार करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार होता है। यह ग्रामीण भारत की आर्थिक गतिविधियों में नई ऊर्जा प्रदान करता है। साथ ही, कुर्बानी का गोश्त जरूरतमंदों तक पहुंचकर सामाजिक समावेश को भी बढ़ाता है, जिसमें किसी धर्म या जाति की दीवार नहीं होती। इसी के साथ-साथ कुर्बानी के दौरान स्वच्छता के नियमों का पालन करना और प्रशासन के निर्देशों का ध्यान रखना जरूरी है। पशु कल्याण के लिए जिम्मेदार तरीके से पशुओं की खरीद और देखभाल करनी चाहिए। यह पर्व यह भी सिखाता है कि धार्मिक कर्तव्यों का निर्वहन करते समय पर्यावरण और सामाजिक संतुलन का भी ध्यान रखा जाए।
सीमाओं से परे संदेश
कुर्बानी एक स्वैच्छिक और व्यक्तिगत कार्य है, जिसमें किसी प्रकार की जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी आस्था और परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार है। बकरीद समाज में आपसी विश्वास, सम्मान और सहयोग को बढ़ाने का अवसर देती है। मस्जिदों, घरों और महफिलों में इकट्ठा होकर लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, रिश्ते मजबूत करते हैं और सामाजिक ताने-बाने को सशक्त बनाते हैं। बकरीद का संदेश सीमाओं से परे है। यह पर्व दुनियाभर में मनाया जाता है और विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ता है। भारत में यह पर्व विविधता के बीच एकता का प्रतीक है, जो समाज को प्रेरित करता है कि धार्मिक विश्वासों को निजी रखते हुए सामाजिक सद्भाव और सहयोग को प्राथमिकता दी जाए।
ईद-अल-अजहा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि त्याग, करुणा और सामाजिक एकता का उत्सव है। यह पर्व सिखाता है कि सच्ची खुशी दूसरों के साथ बांटने, सभी समुदायों की भावन्ााओं का सम्मान करने और पर्यावरण व पशु कल्याण का ध्यान रखने में है। बकरीद का संदेश स्पष्ट है; त्याग, इंसानियत और भाईचारे को अपनाकर समाज को बेहतर बनाएं। यही इसकी असली आत्मा है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
