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राज्य में १.१० करोड़ महिलाएं और ५६ लाख पुरुष निरक्षर…बेरोजगारी के कारण स्कूल छोड़ने की मजबूरी!

-महायुति की घोषणाओं की खुली पोल

सामना संवाददाता / मुंबई

लाडली बहनों की साक्षरता को लेकर सरकार के खोखले दावे अब बेनकाब हो रहे हैं। महाराष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था पर काला धब्बा लग चुका है, क्योंकि १.१० करोड़ महिलाएं और ५६ लाख पुरुष आज भी निरक्षर हैं। बेरोजगारी और बदहाल जीवन ने हालात ऐसे बनाए कि स्कूल छोड़नेवालों की संख्या लगातार बढ़ती गई। महायुति सरकार की घोषणाओं की पोल खुल चुकी है, तभी अब शिक्षकों को घर-घर सर्वे पर उतारा जा रहा है। निरक्षरता की असल तस्वीर उजागर करने के लिए उल्लास के माध्यम से परीक्षा लेने की तैयारी शुरू की गई है।
उल्लेखनीय है कि देश में वर्ष २०११ की जनगणना के अनुसार, २४.८२ करोड़ निरक्षर थे। उसके बाद साक्षर भारत और पढ़ना-लिखना जैसी योजनाओं से निरक्षरों की संख्या घटी, लेकिन आज भी देश में लगभग १८ करोड़ निरक्षर हैं। महाराष्ट्र में वर्ष २०११ की जनगणना के अनुसार, १५ वर्ष और उससे अधिक आयु के पुरुष निरक्षर लगभग ५३ लाख थे, जबकि महिलाओं की संख्या १.१० करोड़ थी। साक्षर भारत योजना राज्य के उन दस जिलों में लागू की गई, जहां महिला निरक्षरता ५० प्रतिशत से अधिक थी। मार्च २०२४ में हुई उल्लास परीक्षा के माध्यम से १.३० लाख पुरुष और २.९५ लाख महिलाएं साक्षरता की ओर अग्रसर हुर्इं। उसके बाद मार्च २०२५ की परीक्षा में यह संख्या बढ़कर किसी तरह ६.६७ लाख तक पहुंच सकी। राज्य से निरक्षरता खत्म करने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग ने उल्लास अभियान शुरू किया है। इसके तहत २१ सितंबर को पूरे राज्य में निरक्षरों की परीक्षा आयोजित की गई है। इसमें ३० से ८० वर्ष तक के विद्यार्थी होंगे। इसके बाद निरक्षरों की खोज के लिए शिक्षकों के माध्यम से फिर से सर्वे किया जाएगा।
जनगणना न होने से नहीं मिल पा रहा आंकड़ा
वर्ष २०११ के बाद देश में जनगणना नहीं हुई इसलिए पिछले १५ वर्षों में राज्य में कितने निरक्षर हैं, इसका आंकड़ा सामने नहीं आया है। वर्तमान में आर्थिक परिस्थितियों के कारण पढ़कर भी नौकरी न मिलने से बढ़ी बेरोजगारी और बीच में स्कूल छोड़नेवालों की संख्या बढ़ी है। जनगणना के बाद ही यह स्थिति स्पष्ट होगी। उससे पहले ही स्कूल शिक्षा विभाग ने सभी निरक्षरों को साक्षर बनाने का अभियान शुरू किया है।
शिक्षा से बनता है स्वास्थ्यप्रद परिवार
यूनेस्को ने १९६६ में ८ सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस घोषित किया। इसका उद्देश्य निरक्षरता दूर करना और शिक्षा का सार्वत्रिकीकरण करना है। महिला साक्षर होती है तो वह केवल अपना जीवन ही नहीं संवारती, बल्कि स्वास्थ्यप्रद परिवार भी तैयार करती है। वह बच्चों को उचित संस्कार देकर आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह खोलती है, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती है और समाज को नई दिशा देती है।
-राजेश क्षीरसागर, शिक्षा सह संचालक

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