मुख्यपृष्ठधर्म विशेषकाशी के कोतवाल काल भैरव

काशी के कोतवाल काल भैरव

शीतल अवस्थी

भगवान शिव के दो रूप माने गए हैं। एक भक्तों को अभय देने वाला विश्वेश्वर स्वरूप और दूसरा दुष्टों को दंड देने वाला कालभैरव स्वरूप। कालभैरव जयंती या कालाष्टमी शिव के दूसरे स्वरूप की आराधना का पर्व है। मान्यता है कि इसी दिन दोपहर को शिव के प्रिय गण भैरवनाथ का जन्म हुआ था। भैरव से काल भी भयभीत रहता है, इसलिए उन्हें कालभैरव भी कहते हैं। काल भैरव भगवान शिव का अत्यंत ही उग्र तथा तेजस्वी स्वरूप है। सभी प्रकार के पूजन, हवन, प्रयोग में रक्षार्थ इनका पूजन होता है। इन्हें काशी का कोतवाल माना जाता है।
भगवान शिव की नगरी काशी के व्यवस्था संचालन की जिम्मेदारी उनके गण संभाले हुए हैं। उनके गण भैरव हैं, जिनकी संख्या चौसठ है एवं इनके मुखिया काल भैरव हैं। उन्होंने काशी की सुरक्षा के लिए ८ चौकियां भी स्थापित कीं। एक पैर पर खड़े बाबा कालभैरव काशी के दंडाधिकारी हैं। माना गया है कि बिना कालभैरव के दर्शन के बाबा विश्वनाथ के दर्शन-पूजन का फल प्राप्त नहीं होता है। काशी के अष्ट भैरव मंदिरों में भीषण भैरव, संहार भैरव, उन्मत्त भैरव, क्रोधन भैरव, कपाली भैरव, असितांग भैरव, चण्ड भैरव और रूरू भैरव का समावेश है। काल भैरव को भगवान शिव का ही अंश माना गया है। भगवान भोलेनाथ के भैरव रूप की पूजा या स्मरण मात्र से सभी प्रकार के पाप, दोष, ताप तथा कष्ट दूर होते हैं। विशेष कर जिनकी कुंडली बुध-राहु से पीड़ित हो उसे कालाष्टमी का व्रत तथा पूजन अवश्य करना चाहिए। इससे जीवन में सफलता प्राप्ति का रास्ता खुलता है। भगवान भैरवनाथ तंत्र-मंत्र की विद्याओं के ज्ञाता हैं, साक्षात रूद्र हैं। बिना इनकी अनुमति के कोई काशी में नहीं रह सकता। मान्यता के अनुसार, शिव के सातवें घेरे में बाबा काल भैरव हैं। इनका वाहन कुत्ता है। इसलिए काशी के बारे में कहा भी जाता है कि यहां विचरण करने वाले तमाम कुत्ते काशी की पहरेदारी करते हैं। अत: इस दिन प्रभु की प्रसन्नता हेतु कुत्ते को भोजन कराना चाहिए, अगर कुत्ता काले रंग का हो तो पूजा का माहात्म्य और बढ़ जाता है। कालाष्टमी के दिन काल भैरव के साथ-साथ देवी कालिका की पूजा-अर्चना एवं व्रत का भी विधान है।
शिवपुराण में भगवान शिव के भैरव रूप का वर्णन है कि सृष्टि की रचना, पालन और संहार इनके द्वारा किया गया है। इस व्रत का उल्लेख आदित्य पुराण में विस्तार से आया है। भैरवजी की पूजा व उपासना से मनोवांछित फल मिलता है। अत: भैरवजी की पूजा-अर्चना करने तथा कालाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना गया है।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन कालभैरव का दर्शन एवं पूजन मनोवांछित फल प्रदान करता है। रात्रि के समय जागरण करके शिवशंकर एवं पार्वती की कथा एवं भजन-कीर्तन करना चाहिए। मध्य रात्रि होने पर शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरवजी की आरती करनी चाहिए। कालभैरव स्त्रोत का पाठ तथा उपासना कर दान आदि देने से जीवन में सफलता प्राप्त होती है तथा कालसर्प दोष से दूषित बुध तथा शिक्षा में बाधा दूर होती है। भगवान भैरवनाथ का वाहन ‘श्वान’ (कुत्ता) है। काल भैरव मंत्र ॐ भ्रं कालभैरवाय फट से उनकी साधना की जानी चाहिए। काले रंग का वस्त्र पहनकर तथा काले रंग का ही आसन बिछाकर, दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठें तथा उपरोक्त मंत्र की १०८ माला रात्रि को करें। इस साधना से भय का विनाश होता है।

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