मुख्यपृष्ठस्तंभलोक विमर्श : लाइफस्टाइल मंच से सियासी अखाड़े में बदला सोशल मीडिया

लोक विमर्श : लाइफस्टाइल मंच से सियासी अखाड़े में बदला सोशल मीडिया

लोकमित्र गौतम

गुजरे पखवाड़े पूरी दुनिया ने जलते हुए नेपाल के जो लोमहर्षक दृश्य देखे, हाल के दशकों में ऐसे भयावह दृश्य नहीं देखे गए थे। सबसे बड़ी बात यह है कि ये दृश्य सोशल मीडिया के अखाड़े से निकलकर पूरी दुनिया को दहला दिया है। जिस सोशल मीडिया को शुरू में लाइफस्टाइल मंच समझा गया था- सेल्फी पोस्ट करने, दोस्तों से जुड़ने, खाने-पीने की मुंह में पानी लाती तस्वीरों को प्रस्तुत करने और अपनी जिंदगी के रोमांचित करनेवाले पलों को साझा करने के लिए मंच समझा गया था, उस धारणा को यूं तो सोशल मीडिया ने २०१०-११ में ही तोड़ दिया था, जब ‘अरब स्प्रिंग’ के तहत ट्यूनीशिया से शुरू हुआ जन आंदोलन देखते ही देखते मिस्र, लीबिया, यमन और सीरिया तक पैâल गया था। याद करिए, काहिरा का वह युवा आंदोलन जब एक लड़की ने सोशल मीडिया में यह पोस्ट करके अपने घर से निकली थी कि जो चाहे उसके साथ आंदोलन में जुड़ सकता है और उसके बाद देखते ही देखते मिस्र में युवाओं ने सोशल मीडिया के जरिए सरकार के विरुद्ध एक जबर्दस्त आंदोलन खड़ा कर दिया था। उस जमाने के ट्विटर और फेसबुक पर डाले गए वीडियो और लाइव पोस्ट ने पूरे अरब जगत के युवाओं को संगठित कर दिया था। मिस्र का तहरीर चौक देखते ही देखते राष्ट्रपति होश्नी मुबारक की राजसत्ता की कब्र खोद दी थी।
महज ३६ घंटे!
हालांकि, नेपाल में गुजरे ८ सितंबर २०२५ को शुरू हुआ जेन जी आंदोलन इतने वेग के साथ शुरू हुआ था कि अरब स्प्रिंग की याद दिला रहा था। मगर महज २४ घंटे गुजरते-गुजरते यह आंदोलन भयावह दु:स्वप्न बन जाएगा, इसकी कल्पना किसी ने सपने में भी नहीं की थी। सोमवार को जो आंदोलन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की वजह से नेपाल की सड़कों, खास करके काठमांडू की सड़कों पर फूट पड़ा था, वह आंदोलन अगले ही दिन यानी २४ घंटे गुजरते-गुजरते नेपाल के ही नहीं, बल्कि समूची दक्षिण एशिया के इतिहास का सबसे खूनी और सबसे विध्वसंक आंदोलन बनकर सामने आएगा, भला यह बात कौन जानता था? आठ नेपाली युवकों की नेपाल पुलिस की गोली से हत्या के बाद यह जेन जी आंदोलन इस कदर भड़का कि देखते ही देखते नेपाल की संसद, नेपाल का सुप्रीम कोर्ट और नेपाल का सेक्रेटियट यानी समूची कार्यपालिका और न्यायपालिका जलकर राख हो गई। सिर्फ इतना ही नहीं, किसी भी मिनिस्ट्री में कोई भी रिकॉर्ड साबुत नहीं बचा, सब जल गए। सिर्फ काठमांडू तक ही यह आगजनी सीमित नहीं रही, बल्कि देखते ही देखते यह पूरे नेपाल का भयावह दुर्भाग्य बन गई और पूरे देश में २३ अदालतों सहित हजारों औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी पंâूक डाला गया। नेपाल में जितने भी महत्वपूर्ण शहर हैं, सबकी नगरपालिकाएं जला दी गईं। सबके प्रशासनिक दफ्तर जलकर राख हो गए। दुनिया के किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसा भयावह आंदोलन अब तक नहीं देखा था। महज २४ घंटों के अंदर सोशल मीडिया के मंच से स्वत:स्फूर्त ढंग से परवान चढ़ा यह राजनीतिक आंदोलन महज ३६ घंटे की अपनी उन्मादी विनाशलीला से जितना नुकसान किया है, शायद आजतक की प्राकृतिक आपदाओं ने भी नेपाल का उतना ज्यादा नुकसान कभी किया हो।
जेन जी ‘टूल’ तो नहीं!
नेपाल में पहले से ही उद्योग-धंधों, कारोबार और उद्योगपतियों की भारी कमी है, उस पर नेपाल के एकमात्र अरबपति इंडस्ट्रिलिस्ट विनोद चौधरी के सारे साम्राज्य को आग के हवाले कर दिया गया, जबकि विनोद चौधरी के विभिन्न उद्योगों संस्थानों में ५४ हजार नेपालियों को सीधे नौकरी मिली हुई थी और लाखों दूसरों को अप्रत्यक्ष तरीके से रोजगार का साधन प्राप्त था। नेपाल में करीब ३० फीसदी से ज्यादा बड़े और मझोले होटलों को भी जला दिया गया। नेपाल का सेक्रेटियट ‘सिंह दरबार’ जो कि हैरिटेज संस्थान में आता है, वह भी जलकर राख हो गया। अब जबकि आग शांत हुई है, अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की ने बागडोर संभाली है तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि आखिर क्यों सारे दस्तावेजों को आग के हवाले किया गया? शुरुआती आकलन के मुताबिक, करीब ३० अरब डॉलर की संपत्ति को स्वाहा करके किसको फायदा हुआ?
यह आंदोलन जिस करप्शन के खिलाफ पूरे देश के युवाओं का स्वत: फूटा विस्फोटक गुस्सा है, आखिर उन युवाओं के इस आंदोलन को करप्शन के सारे दस्तावेज जलाकर राख कर देने से क्या मिलेगा? कहीं ये उन्हीं पारंपरिक पार्टियों की ही साजिश तो नहीं है, जेन जी जिनके विरुद्ध सड़कों पर उतरे थे और जिन्हें दौड़ा-दौड़ाकर सार्वजनिक जगहों, उनके घरों में और गली-मुहल्लों तक में पीटा गया है? कहीं मौके की नजाकत देखकर पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों ने ही तो अपने करप्शन को छुपाने के लिए जेन जी लोगों के कंधे पर बंदूक रखकर यह तबाही का मंजर नहीं खड़ा किया? ऐसा इसलिए भी लगता है, क्योंकि इस भयावह आगजनी के २४ घंटे बाद से ही लगातार जेन जी युवा बार-बार मना कर रहे हैं कि उन्होंने नेपाल की महत्वपूर्ण संपत्तियों को आग के हवाले किया। मीडिया ने ऐसे दर्जनों जेन जी युवाओं और जो आंदोलन में अगुवाई कर रहे थे, उनसे बार-बार पूछा है और उन्होंने बार-बार यही कहा है कि उन्हें इससे क्या फायदा मिलना था और वाकई उन्हें इससे क्या फायदा होना था? इसलिए सोशल मीडिया के मंच का इस्तेमाल करके जो यह भयावह आंदोलन सामने आया है, उसकी इस नजरिए से भी जांच होनी चाहिए।
चिंगारी बना सोशल मीडिया
बहरहाल, सोशल मीडिया जो कि कभी लाइफस्टाइल मंच हुआ करता था, किस तरह धीरे-धीरे पिछले डेढ़ दशकों में राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हुआ है।
अरब स्प्रिंग से लेकर नेपाल के इस भयावह अग्निस्फूर्त आंदोलन तक इतना डरावना हो चुका है कि सोशल मीडिया की पिछली भयावह राजनीतिक उबालें भी गिनाई जाने लगी हैं। लोग आपस में डिस्कस करने लगे हैं कि आपसी हालचाल जानने वाला यह मंच किस तरीके से राजनीतिक दुर्दशा का हाल बयान करने लगा है और वैâसे बीच-बीच में इसकी झलक देता रहा है। याद कीजिए फेसबुक पर संगठित रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ म्यांमार में की गई खून-खराबे की वह घटना जिसे नस्ली संहार कहा गया था। साल २०१६-१७ में हजारों रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार छोड़ने को तब मजबूर हुए, जब बाकायदा फेसबुक का इस्तेमाल करते हुए उनके विरुद्ध नफरती आंदोलन शुरू किया गया, जबकि इसी तरह साल २०२२ में श्रीलंका के आर्थिक संकट के दौरान सोशल मीडिया के जरिए लोगों की भावनाएं भड़काकर शोलों में तब्दील हो गई और देखते ही देखते राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को अपना महल छोड़कर भागने को मजबूर होना पड़ा। हालांकि, सोशल मीडिया का इस्तेमाल शांतिपूर्ण जनउभार के लिए भी हुआ है। याद करें ‘मी टू’ आंदोलन जब ‘हैश टैग मी टू’ के अभियान से पूरा हॉलीवुड नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का मनोरंजन उद्योग हिल गया था और हां, सोशल मीडिया का मंच किस तरह से चुनाव में जीत या जीतने की संभावना तैयार करने की गारंटी बन गया है, इससे भी दुनिया में हड़कंप मचते देखा गया है।
इसलिए अगर गहराई से देखें तो जो सोशल मीडिया का मंच लोगों के सुख-दुख को साझा करने और इसी में उलझे रहने की मंशा से बना था, उसने बहुत सफाई से या कहें बड़ी चालाकी से अपने लिए सियासी मंच भी झटक लिया है इसलिए अब सोशल मीडिया को हल्के में नहीं लेना चाहिए। भविष्य की सारी झकझोर देनेवाली इबारतें शायद अब इसी मंच से लिखी जाएंगी। अत: दुनियाभर की सरकारों को, विशेषकर लोकतांत्रिक देशों की सरकारों को सावधान हो जाना चाहिए और सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों को झांसे में डालने के लिए नहीं करना चाहिए।

(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)

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