एड. राजीव मिश्र
मुंबई
आज जगतू पूरे जोश के साथ सुबहिये से अपने माई-बाबू के पिंडदान करय में लगे हैं। सबसे पहिले उठिके बगइचा से महुआ के पाती तोरिके के लेइ आये। आंगन से दुआर तक साफ-सफाई कइ के लगभग तीन बार चमकाय चुके हैं। जगतू बो सुबहिये से रसोई में भिड़ान हईं। सुबह से पूरी-कचौरी दुइ तरह के सब्जी, खीर, रिकवछ अउर फुलौरी बनाई के एक-एक बर्तन में रखे जात हैं। पट्टी भर के जगतू के लड़िका कलय नेवतियाय आवा है कि हमरे आजी अउर आजा के शराध है तो सब लोग खाना खाएं आइ जाओ। धीरे-धीरे समय बीता जात है, लेकिन अबहीं तक पंडित जी घर मा नही पधारे। पिछले एक हफ्ता से जगतू बिना नागा किये पंडित जी के याद करावत रहें पर आज पूजा के दिनय पंडित जी के बोकड़ियय हेराय गयी। काफी अगोरय के बाद जब पंडित जी के झलक तक नही देखाइ परी तो जगतू सैकिल उठाये अउर चलि परे पंडित जी के घर की ओर। जगतू जब पंडित जी के घरे पहुँचे तो पता चला उ तो गोबर्धन के इहाँ पिंडा परवाय रहें हैं। बात के बात में जगतू गोबर्धन के घरे जाय धमके। उहाँ जायके देखत हैं तो गोबर्धन पूरे श्रद्धा से अपने पुरखन के चावल के पिंडा पारि रहें हैं अउर पंडित जी शांत मन से मंतर पढ़ि-पढ़ि के कर्मकांड कराय रहें हैं। ई देखतै जगतू के तन-बदन में आग लागि गय। एक ओर हम सुबह से उपवास किये अगोरत बइठे हैं अउर दुसरी ओर पंडित जी कहे के बाद भी गोबरधन के इहाँ धूनी रमाये बइठे हैं। आखिर खाली पेट जगतू के सबर जबाब देइ गवा। का हो पंडित जी, हम दस दिन से रोज आइके तुम्हरी परिकरमा कइके घर में छप्पन भोग बनवाये बइठे हैं अउर तुम इहाँ चाउर के पिंडा पारय में लागि अहा। हम का गोबर्धन से कम दक्षिणा देइत जवन सुबह होतय इहाँ अड्डा जमाय लिहे हौ। इतना सुनतय पंडित जी आग बबूला होइ गए, अइसा है जगतू हमार मुँह न खोलवाओ, जीयत जिनिगी तो माई-बाप के पानी बिना मारि नायो, अब छप्पन भोग बनाये बइठे हो। अरे तोहार रखी दोनिया चिरई चुनमुन न खइहैं अउर हमें दक्षिणा देवय आये हौ। चलो निकरो अब जेतनी जल्दी होय इहाँ से फटाक से निकरि जाओ।
