रेडी रेकनर दर की वृद्धि से परेशान, बिल्डरों पर सरकार मेहरबान
रामदिनेश यादव / मुंबई
राज्य की महायुति सरकार बिल्डरों पर मेहरबान हैं। उनके लिए भूखंड से लेकर तमाम योजनाओं को महत्व दिया जा रहा है। एक तरफ इस सरकार में आम जनता का जीना दूभर हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ गलत सरकारी नीतियों का खामियाजा भी आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। सरकार ने रेडी रेकनर की दर को इस कदर बढ़ाया है कि सामान्य लोगों के लिए यह भरना मुश्किल हो रहा है और सरकारी जमीनों पर बनी मुंबई की लगभग ३ हजार हाउसिंग सोसायटियों के लोगों को अपने अधिकार से वंचित होना पड़ रहा है। ऐसे में यहां ३ हजार हाउसिंग सोसायटियों में से मात्र ६८ सोसायटियों को ही उनका मालिकाना हक मिल सका है। मतलब अब भी ९९.७८ प्रतिशत सोसायटियां अपने अधिकार से वंचित हैं।
आश्चर्य तो इस बात का है कि ३१ अक्टूबर के बाद रेडी रेकनर की दर १० प्रतिशत से बढ़कर ६० प्रतिशत तक कर दी जाएगी, ऐसी खबर है। ऐसे में इन लोगों के लिए तो सरकारी जमीनों पर अपनी हाउसिंग सोसायटी का मालिकाना हक पाने के लिए ५ गुना अधिक रकम चुकाना होगा। मुंबई की ३,००० सहकारी संस्थाओं में से केवल ६८ संस्थाओं ने ही अब तक मालिकी हक में रूपांतरण किया है। राज्य में सरकारी भूखंडों पर कुल २२ हजार सहकारी गृहनिर्माण सोसायटियां हैं, जिनमें सबसे अधिक मुंबई में हैं। इसके बाद पुणे, ठाणे, नवी मुंबई और अन्य शहरों का नंबर आता है। मुंबई में रेडी रेकनर की दर अधिक होने के कारण दस प्रतिशत शुल्क भी करोड़ों में पहुंच रहा है। कुछ संस्थाएं इस लाभ को लेने के लिए तैयार हैं, लेकिन भूखंड का मालिकी हक रूपांतर करने के लिए जितना शुल्क भरना पड़ता है, उतनी ही राशि नकद रूप में जिलाधिकारी कार्यालय से भी मांगी जा रही है। इसका मतलब यह हुआ कि वास्तव में संस्थाओं को दस प्रतिशत नहीं बल्कि २० प्रतिशत शुल्क भरना पड़ रहा है।
विकासक इस राशि को आसानी से भर रहे हैं। एक रहिवासी ने इस पर कहा कि कुछ सोसायटियां नकद राशि देने के लिए तैयार हैं, लेकिन आगामी राशि की मांग के कारण उन्हें डर है कि अगर रूपांतरण नहीं हुआ या कोई समस्या हुई तो यह नकद राशि कौन लेगा? इन सवालों का भी उठना स्वाभाविक है।
