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सम-सामयिक : ट्रंप से सावधान रहे भारत …वह गुड़ दिखाकर ईंट मार सकते हैं..!!

डॉ. अनिता राठौर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भारत को अत्यंत सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि एक तरफ वह जहां शंघाई कॉपरेशन बैठक में मोदी के जाने के बाद से उनके लल्लो-चप्पो करने में लगे हैं, उनको अपना सबसे अच्छा दोस्त बता रहे हैं और भारत तथा अमेरिका के मजबूत रिश्तों की दुहाई दे रहे हैं, साथ ही यह भी कह रहे हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार डील बस होने ही वाली है। वहीं दूसरी तरफ चुपके-चुपके जी-६ देशों यानी प्रâांस, इटली, कनाडा, जापान और यूरोपीय यूनियन को अपने ढंग से उकसा भी रहे हैं कि वो भारत पर भारी से भारी टैक्स लगाएं, जिसमें उनका सुझाव सौ फीसदी तक टैक्स लगाए जाने का है। बताइए भला यह कौन-सी दोस्ती और कौन से मजबूत रिश्तों का फर्ज है कि एक दोस्त अपने दूसरे दोस्त पर कुछ देशों को भारी टैक्स लगाने के लिए उकसा रहा है? डोनाल्ड ट्रंप बहुत अस्थिर मन:स्थिति के राजनेता हैं। अगर यह उनके व्यवहार का हिस्सा है, विश्वासघात का नहीं तो भी भारत को अत्यंत सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि वह ऐसे शख्स हैं कि बिना किसी शर्म-लिहाज के आपको गुड़ दिखाकर ईंट मार सकते हैं।
दोगलापन!
दरअसल, ट्रंप हमेशा से खुद को एक बिजनेस मैन और डील मास्टर के रूप में पेश करते रहे हैं, इस पर उन्हें गर्व महसूस होता है। उनको लगता है कि दुनिया सिर्फ कारोबार से चलती है इसलिए उनकी यह कोशिश रहती है कि हर संबंध में वह जिस सौदे पर हाथ डालें, वह पूरी तरह से खरा सौदा साबित हो, लेकिन भारत को लेकर उनका आकलन गड़बड़ा गया है। अब ठंडे दिमाग से इसे नई रणनीति के जरिए सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि वह भारत से दोस्ती की गलबहियां डालकर हमें विश्वास दिलाए कि दुनिया में एकमात्र भरोसेमंद भारत का कोई दोस्त है तो वह ट्रंप है और इसी बीच वे अपने जी-७ के शेष सहयोगी पर यह दबाव डाल रहे हैं कि वे भारत पर इतना टैरिफ लगा दें कि उसे झख मारकर अमेरिका की शरण में आना पड़े।
हालांकि, वो दिन गए जब दोस्त का दोस्त, दोस्त और दोस्त का दुश्मन, दुश्मन हुआ करता था। आज छोटा से छोटा देश भी अपने संबंधों के लिए अपने हितों को ही प्राथमिकता देता है इसलिए वे जिस प्रâांस, इटली, जापान और यूरोपीय यूनियन से उम्मीद कर रहे हैं कि वे भारत पर भारी भरकम टैक्स लगाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दे, वे देश भला ट्रंप को खुश करने के लिए ऐसा क्यों चाहेंगे? आखिरकार, भारत १ अरब ४६ करोड़ लोगों का देश है, ट्रंप के वित्त मंत्री को भले यह मलाल हो कि भारत इतना बड़ा देश होकर उनसे एक बोरी मक्का तक क्यों नहीं खरीदता? लेकिन यह बात तो है नहीं कि भारत कोई छोटा-मोटा बाजार है। आज वास्तव में एकीकृत यूरोप से डेढ़ गुना और संख्याबल में चीन से भी बड़ा अगर कोई संगठित उपभोक्ता बाजार है तो वह भारत का बाजार है। यहां अकेले कई ऐसी त्योहारी खरीदारी आती है, जब दुनिया के कई देशों के सालाना बजट के बराबर अकेले एक दिन में भारत में उपभोक्ता खरीदारी करते हैं। माना कि भारत और अमेरिका के बीच ८५ अरब डॉलर का सालाना कारोबार है और इसमें भारत अच्छी-खासी लाभ की स्थिति में है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत सिर्फ इसी कारोबार की बदौलत जिंदा नहीं है।
प्राथमिकता अपनी जनता
सारे विशेषज्ञ खराब से खराब स्थिति में आकलन करके देख चुके हैं कि ट्रंप और अमेरिका की सारी उठापटक के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में .५ से .६ प्रतिशत के बीच ही कोई कमी आ सकती है। अगर अमेरिका की इस टैरिफ कड़ाई ने सबसे ज्यादा हमें प्रभावित किया, तब। …और हां, इसके साथ ही यह बात भी अब खुलकर सामने आ गई है कि भारत पर ५० फीसदी टैरिफ लगाए जाने के हमसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को होने शुरु हो चुके हैं। अमेरिका में करीब .५ फीसदी तक की मुद्रास्फीति नजर आने लगी है और यही कारण है कि अमेरिका कारोबारियों का ट्रंप पर लगातार दबाव बढ़ रहा है कि वो भारत के साथ टैरिफ नीति पर किसी सकारात्मक निर्णय तक पहुंच जाएं। यही कारण है कि ट्रंप अब अपनी डीलमेकर छवि को और तेजी से सक्रिय करके रातों-रात डील मास्टर के पासे पर पासे फेंके जा रहे हैं, जिसका एक पासा भारत को प्यार से सहलाना और यह यकीन दिलाना भी है कि अमेरिका, भारत का करीबी और शुभचिंतक दोस्त है और उससे भी ज्यादा यह कि यह शुभचिंता और दोस्ती डील मास्टर ट्रंप की बदौलत है।
दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप जानते हैं कि इंडो-पेसिफिक रीजन में चीन को संतुलित करने के लिए भारत की अहमियत है। रक्षा सौदे, तकनीकी सहयोग, ऊर्जा साझेदारी, ट्रंप जानते हैं कि ये सब भारत के साथ ग्रेट डील का हिस्सा तभी हो सकते हैं, जब भारत और अमेरिका दोस्त हों। ऐसा नहीं हो सकता कि अमेरिका और ट्रंप भारत की एैसी-तैसी भी करते रहें और भारत उनसे झुककर या उनके दबाव में उनको एक बेहतर सौदे का मौका भी दे दे। यह गलतफहमी पहले ट्रंप को थी, लेकिन अब वह जान गए हैं कि भारत बिना रीढ़ का देश नहीं है इसलिए अब वो भारत के गुणगान गाने लगे हैं। मोदी से दोस्ती का दम भरने लगे हैं, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि ट्रंप चाहे ऊपर से कितनी यह सब बातें करें, उनकी राजनीति का असली मकसद अपने घरेलू मोर्चे को साधना है, जिसके लिए वह अमेरिका फर्स्ट का हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके तहत उन्हें अमेरिकी जनता को दिखाना है कि वैâसे ट्रंप दूसरे देशों पर कड़े टैरिफ प्रतिबंध लगाकर अमेरिकी नौकरियां बचाई और अमेरिकी उद्योगों को फायदा पहुंचाया है। वह भारत पर जी-६ देशों को भारी टैरिफ लगाने के लिए इसलिए उकसा रहे हैं, ताकि अपने मतदाताओं से यह दावा कर सकें, ‘देखो, मैंने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को भी अपने बल पर झुका दिया है।’
बेचारे ट्रंप!
वास्तव में ट्रंप भारत को पुचकारकर और जी-६ देशों को हमारे खिलाफ बड़े टैरिफ लगाने के लिए उकसाकर डबल गेम खेल रहे हैं। ट्रंप चाहते हैं कि भारत, अमेरिका का रक्षा व सुरक्षा में साझेदार बने, ताकि चीन पर अंकुश लग सके और इसके लिए अमेरिका के हिस्से की बड़ी लड़ाई भारत अपने भूगोल में रहने के दौरान ही चीन से लड़ ले। ट्रंप चाहते हैं कि भारत अपना बाजार खोल दे, ताकि अमेरिका की कंपनियों को सीधा-सीधा फायदा हो। लेकिन इस सबके लिए वह भारत के किसी भी किस्म के हित की नहीं सोच रहे। यहां तक कि अमेरिका यह भी चाहता है कि विदेश नीति के मामले में भारत, अमेरिका के पाले में रहे। जिसे रूस और चीन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दुश्मन या गैर भरोसेमंद दोस्त समझें। वास्तव में ट्रंप की यह होशियारी इतनी एकतरफा और सरेआम है कि कोई भी देश उनकी इस तरह की हरकतों से पलटकर जवाब दे सकता है बशर्ते उसमें रीढ़ की हड्डी हो और संयोग से भारत वह देश है, जो भले गैरजरूरी जवाबदारी से कतराता हो, लेकिन अपने व्यवहार से जता देता है कि वह किसी और के इशारे पर नाचनेवाला नहीं है।
ट्रंप अभी तक यही करते रहे हैं। वह जिस भी देश को झुकाने की कोशिश करते हैं, उसे पहले गाजर दिखाते हैं, फिर उस पर डंडा चलाते हैं। भारत से मीठी बातें करना, उनकी रणनीति है, ताकि भारत का उन पर भरोसा बना रहे और कठोर दबाव डालना उनकी शैली है, ताकि भारत झुकने के लिए मजबूर हो जाए। लेकिन उनकी यह रणनीति कम से कम भारत के संदर्भ में तो नहीं चलनेवाली। आज दुनिया में कोई भी देश इस सोच के साथ की भारत को साथ भी रखो और हर सौदे में उसे जमकर निचोड़ो, इस मंशा से भारत के साथ न भरोसा कायम कर सकता है, न दोस्ती और न किसी तरह की साझेदारी। इसलिए ट्रंप को भी ऐसा कोई फायदा नहीं होनेवाला। लेकिन ट्रंप को यह समझ में आए, इसके लिए भारत को रणनीतिक तौर पर सावधान रहने की जरूरत है।

(लेखिका शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं)

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