मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स : धार्मिक नारा बना नया सियासी हथियार

पूर्वांचल पॉलिटिक्स : धार्मिक नारा बना नया सियासी हथियार

हिमांशु राज

बरेली से उठा ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान अब केवल धार्मिक विवाद भर नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक अखाड़े में बदल चुका है। इसकी शुरुआत कानपुर के बारावफात जुलूस में लगे बैनर से हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे इसने देशभर में माहौल गरमा दिया। अनेक जगहों पर पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियां और तनाव की स्थितियां बनीं। नतीजा यह हुआ कि एक धार्मिक नारा सियासी ताकतों के लिए नया हथियार बन गया, जिस पर अब हर दल अपनी रणनीति गढ़ रहा है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद इस विवाद को लेकर सबसे मुखर नेताओं में उभरे हैं। उन्होंने कहा कि मस्जिदें इबादत का स्थान हैं, न कि प्रदर्शन या हिंसा का। पहली नजर में यह बयान संतुलित और शांति की अपील जैसा लगता है, लेकिन इसके भीतर राजनीति की गहरी परतें छिपी हैं। मसूद एक तरफ मुसलमानों के खिलाफ सरकार को तानाशाही कार्रवाई का दोषी ठहराते हैं, तो दूसरी ओर इस आरोप का सहारा लेकर अपनी कट्टर समर्थक छवि गढ़ने का प्रयास करते हैं। यह उनका दोहरा दांव है, अनुशासन की बात भी और वोट बैंक की राजनीति भी। दरअसल, यह पूरी बहस राजनीतिक दलों की उस चलन को उजागर करती है जिसमें धार्मिक भावनाओं को चुनावी फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मसूद की रणनीति भी इसी पैटर्न का हिस्सा है। वे चाहते हैं कि मुसलमान मतदाता सरकार की कार्रवाई से आहत महसूस करें और उन्हें स्वाभाविक नेता मानें। यही कारण है कि वे उपद्रवियों को चेतावनी देने के बावजूद विवाद को हवा देने का मौका भी नहीं चूकते। पुलिस की सख्ती, गिरफ्तारियों और सरकार के आरोपों के बीच विपक्ष की बयानबाजी माहौल को और तीखा बना रही है। नतीजन यह विवाद महज धार्मिक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक लाभ-हानि का सवाल बन गया है। इमरान मसूद का बयान इसी द्विध्रुवीय राजनीति का उदाहरण है, जहां शांति की अपील और सियासी लाभ की चाह एक साथ चलती है। मुद्दे की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि धार्मिक आस्थाएं राजनीतिक हथकंड़ों में बदल गई हैं। विवाद जितना लंबा खिंचता है, समाज में तनाव उतना ही गहराता है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान अब आस्था से कहीं ज्यादा चुनावी जमीन पर बोए गए बीज जैसा है, जिसे हर पार्टी अपने लाभ के हिसाब से सींचने में जुटी है।

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