मुख्यपृष्ठसमाचारडिजिटल भुगतान का भविष्य और डीपीडीपी एक्ट : विशाल मारू

डिजिटल भुगतान का भविष्य और डीपीडीपी एक्ट : विशाल मारू

सामना संवाददाता / मुंबई

एफएसएस फाइनेंशियल सॉफ्टवेयर एंड सिस्टम्स के ग्लोबल प्रोसेसिंग हेड, विशाल मारु के अनुसार भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रणाली बन चुकी है। हर महीने अरबों लेनदेन को संभालते हुए यह देश को कम-नकदी वाली अर्थव्यवस्था की ओर ले जा रही है। लेकिन इसके साथ ही व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा की बड़ी चुनौती भी सामने आई है।

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपी) 2023 इस दिशा में एक अहम पहल है। इस अधिनियम के तहत नियमों की घोषणा 28 सितंबर 2025 तक होने वाली है, जिससे डिजिटल भुगतान उद्योग के लिए यह समय बेहद अहम साबित होगा।

विशाल मारू ने कहा कि अधिनियम “सूचित सहमति” पर आधारित है, जो उपभोक्ता विश्वास को मजबूत कर सकता है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि “सहमति थकान” उपभोक्ताओं के लिए चुनौती बन सकती है, खासकर आवर्ती और सदस्यता भुगतान जैसे मामलों में।

उनका मानना है कि बैंकों और फिनटेक कंपनियों को सरल और सहज सहमति संरचनाओं में निवेश करना होगा, ताकि उपभोक्ता अनुभव सहज और पारदर्शी बने।

डीपीडीपी अधिनियम के प्रावधान कंपनियों को डेटा संग्रह, उपयोग और भंडारण में पारदर्शिता बरतने के लिए बाध्य करेंगे। इसमें अनामीकरण, टोकेनाइजेशन और सुरक्षित एआई तकनीक जैसी गोपनीयता-संरक्षण विधियों की अहम भूमिका होगी।

विशाल मारू ने कहा कि बड़ी कंपनियां इस बदलाव को संभाल सकती हैं, लेकिन छोटी फिनटेक को चरणबद्ध अनुपालन और नियामकों से मदद की ज़रूरत होगी।

सीमा-पार डेटा प्रवाह को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई। लोकलाइजेशन-हैवी दृष्टिकोण से लागत बढ़ सकती है और वैश्विक फ्रॉड मॉनिटरिंग नेटवर्क प्रभावित हो सकता है। लेकिन संतुलित और जोखिम-आधारित दृष्टिकोण भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत बनाए रख सकता है।

उनके अनुसार, डीपीडीपी को केवल अनुपालन तक सीमित न मानकर इसे रणनीतिक अवसर के रूप में देखना चाहिए। डिजिटल भुगतान में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है और डेटा सुरक्षा उसका सबसे अहम स्तंभ। उन्होंने कहा कि जो कंपनियाँ सहमति को निष्ठा और पारदर्शिता को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त में बदल पाएंगी, वही आने वाले समय में सबसे आगे होंगी।

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