हमारा मानना है कि प्राकृतिक आपदाओं पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। बेशक, ऐसे मामलों में राजनीतिक धूल सत्ताधारी दल की ओर से ही उड़ाई जाती है। अगले ही दिन मुख्यमंत्री फडणवीस बाढ़ की स्थिति देखने मराठवाड़ा पहुंच गए। जब एक परेशान किसान ने उनसे पूछा, ‘‘आप प्रति हेक्टेयर कितना मुआवजा देंगे या तुरंत क्या देंगे, यह बताओ?’’, तो मुख्यमंत्री अपना आपा खो बैठे और किसान पर भड़ककर बोले, ‘‘अरे बाबा, चुप रहो। राजनीति मत करो।’’ अब अपना सर्वस्व गवां चुके बाढ़ पीड़ित किसान द्वारा नुकसान भरपाई की मांग करना क्या राजनीति है? यहां तो अपना दु:ख और अन्याय व्यक्त करना भी दुश्वार हो गया है। मराठवाड़ा और अन्य जिलों में बाढ़ की स्थिति अभूतपूर्व ही है। इस बाढ़ की राजनीति सिर्फ खलिहर या ठेकेदारों के पैसों से तर-बतर राजनेता ही कर सकते हैं। इस जलप्रकोप में एक करोड़ से ज्यादा किसान फंसे हुए हैं। खेत, घर, मवेशी बह गए हैं। जनहानि भी हुई है। ऐसे मौके पर राजनीतिक कीचड़ उछालने की बजाय खेतों में जाकर किसानों की मदद करना जरूरी है। मुख्यमंत्री फडणवीस ने छत्रपति संभाजीनगर, बीड, हिंगोली, जालना, लातूर, नांदेड़, धाराशिव, परभणी, सोलापुर के जिला अधिकारियों को मदद के काम में झोंक दिया है। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि प्रत्यक्ष रूप से मौके पर जाकर निरीक्षण करें और मदद करें। अगर इसका ठीक से पालन हुआ तो बाढ़ प्रभावित किसानों को मदद मिलेगी। बाढ़ पीड़ितों के लिए क्या कर रहे हो? ऐसा बेतुका सवाल सरकार में बैठे कुछ बददिमाग लोगों ने विपक्ष से पूछा है। अगर विपक्षी दल बाढ़ पीड़ितों की मदद करेगा तो सत्ता में बैठे लोग क्या अपनी कुर्सी के खटमल मारेंगे? विपक्षी दलों के कार्यकर्ता बाढ़ प्रभावित इलाकों में घूम ही रहे हैं, अपनी-अपनी
क्षमतानुसार
वे मदद कर रहे हैं। हालांकि, सरकार अब बाढ़ प्रभावित इलाकों में पहुंच गई है। यह अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री फडणवीस ने बाढ़ राहत कार्यों की योजना बनाने की कमान संभाल ली है। मुख्यमंत्री जब तक खुद इस कार्य में शामिल नहीं होते, तब तक व्यवस्था तेजी से नहीं हिलती। आज किसानों के पास खाने को अनाज नहीं बचा है। छत नहीं बची है। इसलिए मुख्यमंत्री ने राहत शिविरों में भोजन, पानी और स्वास्थ्य की उचित व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। अब इन निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी जांच कौन करेगा? इस संबंध में हमारा सरकार को निर्देश है। सरकारी सहायता के वितरण में कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। यह देखने के लिए कि प्रत्येक शिविर में यह सहायता प्रदान की जा रही है या नहीं, जिला और तालुका स्तर पर सर्वदलीय समितियां बनाई जानी चाहिए। राज्य में जो प्रमुख दल हैं, उनके जिलों के प्रमुख लोगों की एक समिति बनाना और उन्हें जिलाधिकारी, विभागीय आयुक्त के साथ सहयोग करने के लिए काम पर लगाना उचित होगा। संकट, बाढ़ महाराष्ट्र पर है। महाराष्ट्र सभी का है। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों द्वारा सरकारी राहत कार्यों का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करना अनैतिक है। बाढ़ से प्रभावित कुछ जिलों में चारे की किल्लत है। मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारी को सूचना देकर चारा उपलब्ध कराने का आदेश दिया। बारिश के कारण बांध से पानी छोड़ा जाता है। ऐसे में बारिश और बांध के पानी के कारण गांव में जलप्रलय बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में गांव के लोगों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किए जाने की मुख्यमंत्री ने घोषणा की। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को कुछ निर्देश दिए। इससे पहले राज्य के विपक्षी दलों ने भी सरकार और प्रशासन को कुछ महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। नुकसान का पूरा सर्वेक्षण किया जाए, जहां भी कानून और
नियमों की अत्यधिक सख्ती
हो, जिससे लोगों को परेशानी हो, ऐसा व्यवहार न करें। मुख्यमंत्री ने अब प्रशासन को नुकसान के आंकड़े और जानकारी जुटाने को कहा है। मुख्यमंत्री का दावा है कि मराठवाड़ा में बाढ़ पीड़ितों के लिए दो हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जिनके घर पानी में डूब गए, उन्हें दस हजार रुपए मिलने शुरू हो गए हैं। (अर्थात उन दस हजार रुपए के नोटों पर कमल का निशान लगाकर बांटा न जाए।) लोगों को राशन किट दिए जा रहे हैं। निचली मशीनरी ठीक से काम कर रही है या नहीं, इस पर जिलाधिकारी नजर रखें, ऐसा मुख्यमंत्री ने आदेश दिया है। यह सब तो ठीक है, बशर्ते मुख्यमंत्री के आदेशों और निर्देशों का पालन अंतिम स्तर तक और अंतिम बाढ़ पीड़ित तक हो, किसान भाइयों की बस यही अपेक्षा है। बारिश का ‘रेड अलर्ट’ आज भी लागू है। मराठवाड़ा में एक ही दिन में ११३ प्रतिशत बारिश हुई। नासिक में गोदावरी ने खतरे के निशान को पार कर रौद्र रूप धारण कर लिया है। कुल मिलाकर, महाराष्ट्र पर आसमान फट गया है। इसलिए सरकार को मदद के लिए खजाने की खिड़की खोलनी पड़ेगी। विपक्ष क्या कर रहा है? सत्ताधारी दल का यह सवाल मूर्खतापूर्ण है। ‘क्या सरकार बाढ़ में बह गई?’ यह सवाल कल तक बाढ़ प्रभावित किसान पूछ रहे थे। ‘उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसानों के लिए क्या किया?’ ऐसा गुजरात पैटर्न वाला सवाल प्रफुल्ल पटेल ने पूछा है। ठाकरे जब मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कैबिनेट की पहली ही बैठक में महाराष्ट्र के किसानों का कर्ज माफ कर दिया था, लगता है धनी प्रफुल्ल पटेल यह भूल गए हैं। मौजूदा गंभीर हालात में भी, आपको सरकार के तौर पर किसानों का कर्ज माफ करना चाहिए। ऐसी घोषणा तुरंत करें। आप भी कर सकते हैं। हम राजनीति नहीं करते। आपको भी नहीं करनी चाहिए। किसान बचेंगे, तो महाराष्ट्र बचेगा। मुख्यमंत्री, जोर लगाओ!
