मुख्यपृष्ठस्तंभरौबीलो राजस्थान :  साहित्यिक आभै में कटियोड़ी पतंग

रौबीलो राजस्थान :  साहित्यिक आभै में कटियोड़ी पतंग

बुलाकी शर्मा, राजस्थान

मोबाइल री घंटी बाजी। कवि धाकड़‌‌ जी हा। बिचारियो, कोई नवी कविता लिखी हुवैला। बां सूं रामरमी कर’र पूछ्यो, ‘नूंवो कांई लिख रैया हो?’
‘बरसां सूं आपां पाना काळा ई तो कर रैया हां भईजी, इणमें नवादी बात‌ कांई।’ बां रो सुर गंभीर हो, ‘थांरी तबीयत कियां है?’
‘चकाचक।’
‘भाभी जी रो सुगर कंट्रोल में है नीं?’
‘ठीक ई है। चिंत्या री बात कोनी।’
‘बेटा-बेटी, पोता-पोती, दौहिता-दौहिती सगळा सौरा-सुखी है नीं?’
म्हे साहित्यकार आपस में कदैई पारिवारिक बातचीत कोनी करां। साहित्यिक चर्चावां रै औळावै साहित्यिक गुटबाजी, मठाधीशां री दीदागिरी, पुरस्कारां री तिकड़मबाजी, लेखक-कवियां री इश्क बाजी रा किस्सा में इत्ता बिजी रैवां वैâ घर-परिवार री बातां ‌चेतै ई कोनी आवै। बियां आं निजू बातां नै निजता माथै अतिक्रमण मानता थकां दूरी बणायोड़ी राखां।
बे तो म्हारै घर-परिवार री पूरी जलम-पतरी जांचण सारू फोन करियो है! म्हैं आकरै सुर में बोल्यो, ‘थे तो म्हारै घर-परिवार री सोनोग्राफी करण लाग रैया… लफड़ो वैâ है धाकड़ जी?’
‘स्रिस्टी ‌रै जड़-जीव रै सुख-दुख नै मैसूस करता थकां सिरजण करण री खैचळ करण रो आपां दंभ करां पण खुद रै, घर-परिवार रै सुख-दुख नै आपस में साझा करणो सहन कोनी करां।’ धाकड़ जी म्हारी रीस सूं अप्रभावित, ‘घर-परिवार सूं बेसी साहित्यिक‌ परिवार री चिंत्या करण रो ढोंग करां। मठाधीशां री नूरा-कुश्ती, दिल्ली-पटना ‌जिसी गरमागरम ‌घटनावां सूं गरमास‌ लेंवता सोशल मीडिया ऊपरां फुलझड़ियां छोड़’र बातां रा बघार लगावता‌ आपां सजग अर सक्रिय लेखक बता’र इतरांवां। पण आपां ना घर-परिवार रै ‌सुख-दुख रा साथी हां, ना सिरजण पेटै ‌सीरियस।’
‘आपरी तबीयत कीं गड़बड़ लाग रैई है धाकड़ जी।’ म्हैं व्यंग्य करियो, ‘दूजां री कसर निकाळण में आपां साहित्यिक आनंदानुभूति मैसूस करता आयां हां पण आज‌ थांरी रेळगाडी चीलां सूं उतर्‌योड़ी है। साथियां री कमियां गिणावण लाग रैया हो।‌ चोखै डॉक्टर सूं इलाज करावो कविराज।’
‘इलाज री जरूत तो है भईजी।’ बै गंभीर, ‘आपां साठा पाठा हुयग्या। घणी गई, थोड़ी रैई। सांस कित्ताक बच्योड़ा है, हंसो कणै उड जासी, घड़ी-पुळ रो ई ठा कोनी। दंद-फंद, तिकड़मबाजी, टांग खैंचाई में टैम बिरथा गमावणो छोड’र अबै ई घर-परिवार रो ध्यान राखता समर्पित भाव सूं सरोकारी सिरजण नीं करसां जणै आ साहित्यिक जूण बिरथा ई जावणी है भईजी।’
बां फोन काट दियो। आभै में‌‌ असहाय डगमग‌ करती कटियोड़ी‌ पतंग उनमान खुद नै मैसूस करतो, भविस नै लेय’र म्हारै धूजणी सरू हुयगी है।

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