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राजपूत समाज में नई सोच: वीरों के वीर महावीर से प्रेरित महावीर सेना का उदय

सामना संवाददाता / मुंबई

राजपूत, जिसका अर्थ है ‘राजा का पुत्र’, भारतीय इतिहास में सदैव साहस, शौर्य और नेतृत्व का प्रतीक रहा हैं। इन्हीं राजपुत्रों में से एक महावीर हुए, जिन्हें वीरों का भी वीर कहा गया। आज उनका प्रभाव सिर्फ़ जैन समाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कई अन्य जाति-समुदाय भी उनके दर्शन से गहराई से प्रभावित हो रहे हैं।

इसी प्रभाव का परिणाम हैं उत्तर प्रदेश में महावीर सेना का गठन, जिसमें ठाकुर समाज के युवा आगे आए हैं। यह सेना न तो मंदिर पूजा करती हैं, न दीक्षा लेकर भिक्षा मांगती हैं और न ही किसी प्रकार का प्रचार-प्रसार करती है। इन युवाओं का कहना है कि वे किसी बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि महावीर के बताए मूल मार्ग पर चलकर, जीवन को सहज, सरल और शुद्ध बनाने की ओर अग्रसर हैं।

महावीर सेना के कुछ युवाओं ने संवाददाता से बातचीत में स्पष्ट कहा— “हमारे समाज में झोली, डंडा या तलवार लेकर समाज सुधार की परंपरा रही है। लेकिन हम मानते हैं कि असली सुधार भीतर से शुरू होता है। इसलिए न हमें झोली चाहिए, न डंडा, न ही तीर और तलवार। हम अपने स्वभाव से ही संसार में रहते हुए समस्त प्राणी जगत के साथ तालमेल बनाकर, आत्मकल्याण और लोककल्याण दोनों की ओर बढ़ रहे हैं।”

इन युवाओं की सोच का मूल यह हैं कि सृष्टि ही परम सत्य हैं और उसी के साथ सामंजस्य स्थापित करना ही धर्म का सार है। महावीर ने भी यही मार्ग दिखाया था कि बाहर की लड़ी-झगड़ी से मुक्त होकर भीतर की यात्रा की जाए। राजपूत समाज के इन युवाओं ने उसी संदेश को अपनाते हुए अपने जीवन को आडंबर-मुक्त और सरल बनाने का प्रण लिया है।

आज जब समाज विभाजनों और प्रदर्शनों की ओर झुकता जा रहा हैं, तब महावीर सेना के ये युवा बिना किसी शोर-शराबे, बिना किसी राजनीतिक झंडे या धार्मिक मतभेद के, केवल अपने आचरण से एक नई राह दिखा रहे हैं। यह प्रयास न केवल राजपूत समाज की गौरवशाली परंपरा को नई दिशा देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सच्चा वीर वही है जो स्वयं को जीतकर संसार को जीतने का मार्ग दिखाए।

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