सामना संवाददाता / मुंबई
भारत में हृदय स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है। लोग अब हृदय से जुड़ी बीमारियों का समय रहते पता लगवाने और उनके इलाज के लिए मौजूद आधुनिक उपचार विकल्पों का महत्व समझने लगे हैं। स्ट्रक्चरल हार्ट डिज़ीज़, खासकर वे जो हृदय की वाल्व प्रणाली को प्रभावित करती हैं, देश में हृदय संबंधी बीमारियों के बड़े हिस्से के रूप में सामने आती हैं।
स्ट्रक्चरल हार्ट डिज़ीज़ उन समस्याओं को कहते हैं जो हृदय की वाल्व प्रणाली, दीवारों या मांसपेशियों से जुड़ी होती हैं। ये बीमारियाँ दुनियाभर में करोड़ों लोगों को प्रभावित करती हैं और जीवन प्रत्याशा बढ़ने से जनसंख्या में उम्रदराज़ लोगों की संख्या बढ़ते जाने से इनके मामलों में और बढ़ोतरी होने की संभावना है। इन्हीं बीमारियों में से एक है माइट्रल रिगर्जिटेशन (MR), जो हृदय के माइट्रल वाल्व से जुड़ी समस्या है। माइट्रल वाल्व का काम हृदय के दो कक्षों के बीच रक्त प्रवाह को नियंत्रित करना होता है। जब यह वाल्व पूरी तरह बंद नहीं होता, तो रक्त उल्टी दिशा में बहने लगता है, जिससे हृदय को सामान्य से ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यद्यपि भारत में लोगों के बीच माइट्रल रिगर्जिटेशन (MR) की समस्या पैदा होने की सटीक राष्ट्रीय दर उपलब्ध नहीं है क्योंकि अभी तक कोई औपचारिक रोग रजिस्ट्री मौजूद नहीं है, फिर भी, अस्पतालों के आँकड़े और महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययनों से पता चलता है कि यह रोग यहां काफी बोझ डाल रहा है। इसका कारण पारंपरिक रयूमैटिक हार्ट डिज़ीज़ के साथ-साथ आधुनिक हृदय संबंधी जोखिम कारक भी हैं।
आमतौर पर माइट्रल वाल्व रिगर्जिटेशन दो प्रकार का होता है — डिजेनेरेटिव और फंक्शनल। डिजेनेरेटिव माइट्रल रिगर्जिटेशन (DMR) में स्वयं वाल्व को नुकसान पहुँच जाता है। इसका कारण अक्सर उम्र बढ़ना, संक्रमण या अन्य बीमारियाँ होती हैं। इस रोग के इलाज के लिए सामान्यत: वाल्व की सर्जिकल मरम्मत की जाती है या फिर उसका प्रतिस्थापन किया जाता है। वहीं, फंक्शनल माइट्रल रिगर्जिटेशन (FMR) में हृदय का आकार बढ़ जाता है, जिससे वाल्व के पत्ते खिंच कर अलग हो जाते हैं जिससे वह ठीक से बंद नहीं हो पाता। इसका मुख्य कारण हृदय की विफलता (heart failure) या हार्ट अटैक माना जाता है।
माइट्रल रिगर्जिटेशन के दोनों प्रकारों में सांस फूलना, थकान और दिल की धड़कन का तेज़ होना जैसे लक्षण पैदा होते हैं जिनसे रोगी के जीवन की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ता है। हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन क्षेत्रीय और वैश्विक अनुमानों से पता चलता है कि एशिया में लगभग 11.6 मिलियन लोग मध्यम से गंभीर स्तर तक के माइट्रल रिगर्जिटेशन से प्रभावित हैं, और आजकल उम्र बढ़ने के साथ यह रोग बढ़ने की संभावना ज्यादा होती जा रही है। भारत में, जहाँ जनसंख्या में वृद्ध लोंगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है और हृदय संबंधी जोखिम कारक बढ़ रहे हैं, माइट्रल रिगर्जिटेशन का बोझ काफी अधिक है और इसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है। बुज़ुर्गों में यह बीमारी खास तौर पर आम है और 75 वर्ष से अधिक आयु के लगभग हर दस में से एक व्यक्ति को प्रभावित करती है।
ज्यादा जोखिम वाले मरीज़ों के लिए नया रास्ता
पारंपरिक तौर पर माइट्रल रिगर्जिटेशन के इलाज में माइट्रल वाल्व की ओपन-हार्ट सर्जरी ही मानक उपचार मानी जाती रही है जिसमें या तो माइट्रल वाल्व की मरम्मत की जाती है या नया वाल्व प्रतिस्थापित किया जाता है। लेकिन हर मरीज़ इतनी बड़ी और जटिल सर्जरी सहन नहीं कर पाता, खासकर बुज़ुर्ग लोग या ऐसे लोग जिनको पहले से ही गंभीर हार्ट फेल्योर या अन्य जटिल स्वास्थ्य समस्याएँ हों। विशेषकर फंक्शनल माइट्रल रिगर्जिटेशन के मामलों में, केवल दवाओं से इलाज भी कई बार पर्याप्त नहीं होता।
जो मरीज़ ओपन-हार्ट सर्जरी नहीं करा सकते या जिनको दवाओं के अतिरिक्त अन्य इलाज की भी ज़रूरत होती है, उनके लिए ट्रांसकैथेटर एज-टू-एज रिपेयर (TEER) अब एक मान्यता-प्राप्त और न्यूनतम इनवेसिव विकल्प बन गया है। इस पद्धति में न तो सीना खोला जाता है और न ही हृदय को रोका जाता है। इसके बजाय डॉक्टर एक विशेष MitraClip प्रक्रिया अपनाते हैं, जिसे हेल्थकेयर कंपनी Abbott ने विकसित किया है। इसमें पैर की नस के ज़रिए एक छोटा क्लिप हृदय तक पहुँचाया जाता है और माइट्रल वाल्व को ठीक किया जाता है। इस ट्रांसकैथेटर विधि का उपयोग करके माइट्रल वाल्व, क्लिप के दोनों ओर सामान्य रूप से खुल और बंद हो सकता है, जिससे हृदय की पंपिंग क्षमता बेहतर होती है और पूरे शरीर में रक्त प्रवाह सुचारु हो जाता है। यह तकनीक माइट्रल रिगर्जिटेशन को कम करने और मरीज़ों के स्वास्थ्य परिणामों को सुधारने में मददगार सिद्ध हुई है।
एबॉट (Abbott) की स्ट्रक्चरल हार्ट डिवीज़न के भारत में कंट्री मैनेजर, नीरज सिंह ने इस तकनीक पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा: “भारत में ट्रांसकैथेटर माइट्रल वाल्व रिपेयर का इस्तेमाल बढ़ना इस बात का संकेत है कि स्ट्रक्चरल हार्ट केयर को लेकर हमारी सोच में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। जिन मरीज़ों के लिए ओपन-हार्ट सर्जरी बेहद जोखिम भरी है, उनके लिए यह न्यूनतम इनवेसिव थेरेपी नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है और हृदय की कार्यक्षमता को बहाल करने, रोग के लक्षणों को कम करने और सबसे अहम, जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद कर रही है। भारत में मित्राक्लिप (MitraClip) थेरेपी की शुरुआत के बाद से हम सैकड़ों मरीज़ों का हृदय स्वास्थ्य बेहतर कर पाए हैं। विश्व स्तर पर पिछले 20 से अधिक वर्षों में इस तकनीक के ज़रिए 2.5 लाख से ज़्यादा आपरेशन किए जा चुके हैं। ये आंकड़े केवल सांख्यिकीय जानकारी नहीं हैं बल्कि ये दर्शाते हैं कि उन्नत हृदय-चिकित्सा किस तरह लगातार और व्यापक रूप से लोगों तक पहुँच रही है, और साथ ही हमारे उस संकल्प को भी मजबूत करते हैं कि हम उन मरीज़ों तक ऐसे नवीन, प्रमाण-आधारित उपचार पहुँचा सकें जिन्हें इनकी सबसे अधिक ज़रूरत है।”
बेहतर परिणाम और व्यापक पहुँच
भारत में, खासकर बुज़ुर्ग आबादी में स्ट्रक्चरल हार्ट डिज़ीज़ का बोझ बढ़ते जाने को देखते हुए इस तरह की नई तकनीकें उम्मीद की किरण लेकर आती हैं। ये नवाचार, रोग की जाँच और सुलभ उपचार उपलब्ध कराने में मौजूदी कमियों को दूर करते हुए न केवल चिकित्सीय परिणामों को बेहतर कर रहे हैं, बल्कि ऐसे मरीज़ों के जीवन में गरिमा और गुणवत्ता भी वापस ला रहे हैं, जिनके पास इलाज कराने के लिए पहले सीमित विकल्प ही हुआ करते थे। अब जरूरत इस बात की है कि इसके बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए और रोग का समय रहते पता लगाने की प्रक्रिया को मज़बूत किया जाए ताकि अधिक से अधिक लोग स्वस्थ हृदय और पूर्ण जीवन चुनने में सक्षम हो सकें।
अस्वीकरण: इस दस्तावेज़ में दी गई जानकारी केवल रोगियों की जागरूकता और शिक्षा के उद्देश्य से है। इसे डॉक्टर की सलाह के विकल्प या एबॉट (Abbott) की अनुशंसाओं के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए कृपया अपने डॉक्टर से परामर्श करें।
