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इस्लाम की बात : नफरत और भय के विभाजन को पाटना भी है ‘जिहाद’

सैयद सलमान मुंबई

इन दिनों मौलाना महमूद मदनी के जिहाद को लेकर दिए गए बयान ने देश की सियासत में उबाल ला दिया है। मदनी ने वर्तमान केंद्र सरकार पर जुबानी हमला करते हुए जिहाद की जरूरत को अपनी समझ के अनुसार समझाने की कोशिश की है। जिहाद वैसे भी हमेशा ही विवादित मुद्दा रहा है। इसके अर्थ का अनर्थ करने में किसी ने कोई कमी नहीं की है। महमूद मदनी का कहना है कि इस्लाम की पवित्र अवधारणा ‘जिहाद’ को बदनाम कर दिया गया है। ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘तालीम जिहाद’, ‘थूक जिहाद’ जैसे विवादास्पद शब्दों का इस्तेमाल मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है और उनके धर्म का अपमान है।
पूर्वाग्रह!
यह सवाल उठता है कि आखिर क्यों सत्ता और मीडिया के बड़े पदों पर बैठे लोग ऐसी भाषा से बच नहीं पाते, जो एक पूरे समुदाय को निशाना बनाती है। मीडिया का अधिकांश तबका भी जिहाद की गलत व्याख्या करता नजर आता है।
मुस्लिम समुदाय के बारे में अक्सर जब भी कहीं कोई हिंसक घटना होती है, उसे जिहाद से जोड़ दिया जाता है। यह पूर्वाग्रह न सिर्फ गलत है, बल्कि समाज में पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ गलत धारणा भी बनाता है। असल में जिहाद का मतलब संघर्ष ही नहीं है, बल्कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का नाम भी जिहाद है। समाज में जारी शोषण और उत्पीड़न की मुखालिफत जरूरी है, यही जिहाद की मूल भावना है। इसी बात पर बिहार के राज्यपाल और भाजपा के बुद्धिजीवियों में शुमार आरिफ मोहम्मद खान ने मदनी के बयान का अपरोक्ष समर्थन करते हुए कहा है कि उत्पीड़न और अत्याचार जब तक रहेगा, जिहाद भी जारी रहेगा। उनका कहना है कि कुरआन की सीख यही है कि जब भी कोई कमजोर या गरीब उत्पीड़ित हो रहा हो, फिर चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से क्यों न हो, उसके लिए आवाज उठाना हमारा कर्तव्य है। यह जिहाद की सच्ची परिभाषा है। हालांकि, खान ने मदनी को कटघरे में भी खड़ा किया है।
गलतफहमियां
वहीं दूसरी तरफ इन दिनों राष्ट्रीय परिदृश्य में हाशिए पर चल रहे भाजपा का मुस्लिम चेहरा कहे जानेवाले शाहनवाज हुसैन ने मदनी के बयान को देश में समुदायों के बीच खाई बढ़ानेवाला और मुसलमानों को उकसाने वाला बताया है। उनका आरोप है कि मदनी ऐसे बयान देकर भारतीय मुसलमानों की छवि खराब कर रहे हैं और सियासी माहौल को बिगाड़ रहे हैं। मुस्लिम समाज की राजनीति में मदनी का दिया हुआ जिहाद का मुद्दा गरमाया ही हुआ था कि वक्फ संपत्ति से जुड़े मामले पर बोलते हुए सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी ने भी जिहाद का मुद्दा उठा दिया। नदवी ने लोकसभा में वक्फ संपत्ति से जुड़े विवाद पर कहा कि मुसलमानों के अधिकार लगातार कमजोर हो रहे हैं और परिस्थितियां ऐसी बन रही हैं कि शायद उन्हें ‘जिहाद’ करना पड़े। यह बयान भी सामाजिक और राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया।
देश की वर्तमान सियासत के नजरिए से मुस्लिम समाज में असुरक्षा और भय का माहौल है। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसे समय में फोकस सही इस्लामिक अवधारणाओं को समझाने पर होना चाहिए, लेकिन जिहाद जैसे शब्द को विवादित अर्थों में बार-बार दोहराया जाना न यह कि सिर्फ मुसलमानों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए घातक हो सकता है। जब तक समाज को जिहाद के मूल अर्थ का पता नहीं होगा, तब तक इस शब्द का प्रयोग विवाद और गलतफहमियों को जन्म देगा।
प्राथमिकता
मदनी ने जुल्म और मजलूमों के बहाने जिहाद की वास्तविक परिभाषा सामने रखने की भले ही कोशिश की हो, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या उन्होंने अपने समाज के भीतर इस विषय पर व्यापक संवाद स्थापित कर सही मायने समझाने की कोशिश की है? बिना व्यापक समझ के, इस शब्द को सार्वजनिक मंचों पर बिना फिल्टर के बार-बार दोहराना मुसलमानों को गलत समझे जाने के जोखिम को और बढ़ाता है। कुछ राजनीतिक दल और उनके सहयोगी संगठन इस तरह की बयानबाजी से लाभ उठाते हैं, क्योंकि इससे सामाजिक ध्रुवीकरण होता है। वे चाहते हैं कि मुसलमानों के प्रति देश का जनमत नकारात्मक बने, ताकि वे अपने राजनीतिक एजेंडे को सुदृढ़ कर सकें।
दरअसल, सही जिहाद तो अपने अंदर की कमियों, नकारात्मकता और पूर्वाग्रहों से लड़ने में है। किसी भी प्रकार की बहसों को हिंसक रंग देने को जिहाद नहीं कहा जा सकता। इसलिए जरूरी है कि मुसलमानों के नेता और बुद्धिजीवी अपनी बात सावधानी और समझदारी से रखें, ताकि बयानबाजी से सामाजिक तनाव न बढ़े। देश की प्राथमिकता बड़ी समस्याओं जैसे शिक्षा, रोजगार, सामाजिक समरसता और बराबरी के मुद्दों पर ध्यान होना चाहिए। जिहाद की सही समझ ही समाज में शांति और सह-अस्तित्व की राह खोल सकती है। नफरत और भय के विभाजन को पाटना भी एक प्रकार का जिहाद है। शायद यह बात मदनी जैसे लोग भूल जाते हैं।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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