मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : कलुआइन अइया के दुख

काहें बिसरा गांव : कलुआइन अइया के दुख

पंकज तिवारी

कलुआइन अइया कका से लगिन बतावइ कि ‘बतास क प्रकोप एस घेरि लिहे बाऽ कि उठबउ-बइठब अपाढ़ होइ गवा बाऽ। मूड़ जना हर हमेशइ सनसनात रहथऽ, आंखी क त जनतै हयऽ बस कइसउ-कइसउ आपन काम कइ लेथऽई बस, कभंउ भी बइठि सकथऽ। ओहर एक्खे तोहार ददा हयेन ओन्हइ त जना हमरे सुखे-दुखे से कवनउ मतलबइ नाइ बाऽ। पुछबउ नाइ करतेन कि जीयथऊ कि मरथऊ। बस दिना भरि रंगाइ के टहरत रहथेन यंह दुआरे से वंह दुआरे, यंह दुकानें से वंह दुकानें। यह धान काटि के कुल दुआरे आइ गवा बाऽ, पिटातउ बा मुला ओनके लेखे जइसे लोक धंधा, जना कवनउ मतलबइ नाइ बाऽ ओनसे। बस अबहा खाइ के बेला अइहीं, कोंटल भरि खींचि लेइहीं अउर फेरि निकलि जइहीं दिन भरे के। हमार त जियरइ उबियाइ गऽ बा यंह घरे से मुला का करी नान्ह-नान्ह गदेलन क मोह देखइ के पड़थऽ।’- बेचारी अइया एकदम से परेशान दिख रही थीं। एक बार को कका को ऐसा लगा कि गलत छत्ता पर पत्थर फेंक दिया हमने, पर अब क्या था? अब तो सुनना ही था और अइया को समझाना भी।
‘हे अइया, देखु इहइ बिधि क बिधान हउ रे अउर फेरि तंइ त खुदइ एक नम्मर के पुजारी हये, भगवान अउर ओनके धरम-करम के बारे में भला तोहंइ के समझाइ पाए तबउ हिम्मत कइ के तोंका समझावत हई कि…’
‘यंह लोक में जेइ आइ बाऽ ओका धीरे-धीरे कमइ होइके बाऽ अउर फेरि एक दिना बोरिया-बिस्तर बांधि लेइ के बाऽ। मुट्ठी बान्ही के अवाई बा त मुट्ठियइ बान्हि के जवाई। बाकी लड़िका, गदेले, मन्सेधु, मेहरारू, भाइ-बहिन केउ केहू के नाइ होतेन रेऽ। हां, जब तक सब कुछ बढ़िया से चलि रहा बाऽ, सब कुछ ठीक बा नाहि त बस सब…।’- कहते हुए कका की आंखें भर आई। कका अब दूर बंसवारी की तरफ देखने लगे थे, आंसू सम्हालने और अइया का अपने ऊपर से ध्यान हटाने के प्रयास में लग गए थे कका पर अइया लगातार उनको ही देखे जा रही थी और परेशान भी हो उठी थी कि ‘ई अउर एतनी गहिरी बात।’
कका अब बात पलटने के मूड़ में आ गए थे। ‘खैर, हे अइया जाइ दे रेऽ। ई कुल त छोट मोट घटना हउ रे जब तक जीवन बाऽ चलतइ रहेऽ। अइया हमइ तंइ गोनरा बनवइ सिखाइ देते रे। बहुत दिना से अहक बाऽ। अउर फेरि तंइ जनतइ हये कि यंह समय ठंढी में एकर केतना जरूरत होथऽ।’ ‘हल… ल… एहमे कवन मुश्किल बात बाऽ, जब कहऽ तब सिखाइ देती भइया।’
‘अये त अबहिनइ काहें नाइ सिखाइ देथये रे?’
‘जे लेइ आउ कुछ बोझिया वह रक्खा बाऽ’ बोझिया की तरफ इशारा करते हुए अइया बोली।’
‘बस अइया तंइ कहि दिहे, जना हम सिखि लिहेऽ। अबइ धान कटि रहाऽ बा जब कटाई-पिटाई से खलियाइ जाब तब एक दिना आइथऽ समय निकालि के।’ कहते हुए कका अइया को पैलगी करते हुए अब घर की तरफ मुड़ गये थे।
‘खोश्श रहऽ भइया… अये त कुछ दाना-पानी त पी लिहे होते रे बचइया’- अइया बोली।
फेरि कभंउ रे अइया।’ कका को फिर काकी की डांट याद आ गई थी। अब तक चाल तेज हो गई थी।
कका अब बिना कहीं भी रुके सीधे घर पहुंच गए थे। काकी अब तक ढेर काम निपटा चुकी थी। अब खाना बनाने की तैयारी में थीं। कका को देखते ही गुड़ और पानी रख दीं। कका हाथ-पैर धुलकर पानी पीने लगे थे। दोनों मिलकर झट-पट से सारा काम निपटाने लगे थे। एक चूल्हे पर भात और एक पर दाल पकने के लिए रखकर काकी अब अंगना धुलने लगी थीं। हमेशा एक दूसरे के दरवाजे पर लोगों का जमावड़ा रहता था पर इस समय किसी के पास इतना भी समय नहीं था कि कहीं बैठ कर गपियाया जाय। कउआ बेचारा खपड़ा पर बार-बार उछल-कूद मचा रहा था कि कुछ मिल जाय पर अभी कहां संभव था। कका-काकी खा-पीकर अब फिर से अपने संघर्ष को तैयार थे। कउआ को भी काम भर का मिल गया था। गांव ऐसा ही होता है।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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