प्रो. दयानंद तिवारी
मानव सभ्यता के वैचारिक इतिहास में मार्क्सवाद एक महत्वपूर्ण मोड़ अवश्य रहा है, पर उसके समानांतर सबसे तीखी और गंभीर आलोचनाएं भी जन्म लेती रहीं। यह स्वाभाविक था, क्योंकि जहां विचारधारा कठोर ढांचे में बदलकर मनुष्य को एक वर्ग या आर्थिक इकाई तक सीमित करती है, वहां मनुष्य का बहुआयामी स्वरूप विद्रोह करता है। विश्व के अनेक दार्शनिकों और भारत के शीर्ष साहित्यकारों ने इस संकीर्णता पर कठोर प्रश्न उठाए। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि विचार का उद्देश्य मनुष्य को मुक्त करना होता है, बांधना नहीं।
विश्व के आचार्यों की दृष्टि
कार्ल पॉपर ने मार्क्सवाद की वैज्ञानिकता पर ही मूल प्रश्नचिह्न लगाया। उनके अनुसार, किसी सिद्धांत के वैज्ञानिक होने की पहली शर्त है, उसका खंडन संभव होना। पर मार्क्सवाद स्वयं को अचूक मानकर खंडन को अस्वीकार करता है। पॉपर का यह कह देना कि मार्क्सवाद एक बंद विचार प्रणाली है, जहां तर्क प्रवेश नहीं कर सकता’ पूरे विमर्श का केंद्रबिंदु बन गया।
बर्ट्रैंड रसेल ने इसे मानव स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा कहा। उनके अनुसार, मार्क्सवाद धर्म नहीं, पर धर्म जैसी कट्टरता को जन्म देने वाला सिद्धांत है, जो राज्य को निरंकुश और व्यक्ति को महत्वहीन बना देता है। प्रâेडरिक हायक की दृष्टि में मार्क्सवाद आर्थिक रूप से अव्यावहारिक और राजनीतिक रूप से अत्याचारी है। उनका प्रसिद्ध कथन-‘जहां मार्क्सवाद जाता है, वहां स्वतंत्रता मर जाती है’, किसी भी समाज के लिए चेतावनी है।
आइजैया बर्लिन ने मार्क्सवाद की मानव-विरोधी एकरेखीयता पर कठोर प्रहार किया। मनुष्य को ‘वर्ग’ नामक एक सूत्र में बांध देना उनकी दृष्टि में मानव विविधता का अपमान था। लेशेक कोलाकोव्स्की-जो स्वयं कभी मार्क्सवादी थे, ने तो इसे ‘विनाशकारी भ्रम’ बताया। वे कहते हैं कि मार्क्सवाद इतिहास, अर्थशास्त्र और मानव-मनोविज्ञान-तीनों को गलत समझता है।
भारतीय साहित्य–परंपरा की आलोचना
भारत में मार्क्सवाद का विरोध केवल राजनीतिक धरातल पर नहीं हुआ। यह विरोध भारतीय साहित्यिक चेतना, आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक स्वभाव से उत्पन्न हुआ। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के यहां साहित्य मनुष्य के भीतर के कलुष का शोधन है, न कि वर्ग-संघर्ष का औजार। भारतीय साहित्य के मूल में करुणा, सौंदर्य, जीवन–संवेदना और सांस्कृतिक ‘रस’ है-जिसे वर्गीय संघर्ष में बांधा ही नहीं जा सकता।
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने स्पष्ट कहा कि भारतीय मन का संघर्ष बाहरी नहीं, भीतरी होता है। मार्क्सवाद आध्यात्मिकता, तप, साधना और चेतना की उस परंपरा को समझ ही नहीं सकता, जिसने भारतीय समाज का निर्माण किया है। धर्मवीर भारती ने तो इस वर्गीय दृष्टि को साहित्य–विरोधी बताया-मनुष्य को वर्ग में बदलते ही साहित्य की आत्मा नष्ट हो जाती है। अज्ञेय का मत था कि स्वतंत्रता के बिना साहित्य असंभव है और विचारधारा का दास बना लेखक प्रचारक बन जाता है।
श्री अरविंद ने मानव–उत्कर्ष की दृष्टि से मार्क्सवाद को अधूरा ठहराया। उनके अनुसार, समाज केवल आर्थिक संरचना नहीं, बल्कि चेतना की निरंतर ऊर्ध्व यात्रा है। इसी प्रकार दयानंद सरस्वती ने भी बताया कि आत्मा, धर्म और कर्म–दृष्टि को न स्वीकारने वाली कोई भी विचारधारा मनुष्य के संपूर्ण विकास को नहीं समझ सकती। कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने मार्क्सवादी साहित्य को भारतीय संस्कृति की जड़ों से अलग बताया-भारत का साहित्य वर्ग का नहीं, मनुष्य का साहित्य है।
भारतीय दार्शनिक परंपरा के प्रतिपक्ष
गांधी, विनोबा भावे और दीनदयाल उपाध्याय-ये तीन नाम भारतीय दृष्टि के तीन ध्रुव हैं, जहां मार्क्सवाद का प्रतिपक्ष पूर्णता के साथ स्थापित होता है।
गांधी का स्पष्ट मत था कि वर्ग-द्वेष मनुष्य को विभाजित करता है। उनका संघर्ष आर्थिक नहीं, नैतिक था-मन के भीतर का संघर्ष। विनोबा भावे ने मार्क्सवाद की बाह्य क्रांति को नकारते हुए कहा कि वास्तविक क्रांति भीतर होती है और वही भारतीय मार्ग है। दीनदयाल उपाध्याय ने मार्क्सवाद को ‘आधा मनुष्य-दर्शन’ कहा, क्योंकि वह केवल पेट देखता है, आत्मा नहीं। एकात्म मानववाद मनुष्य को आर्थिक, सामाजिक, आध्यात्मिक-सभी आयामों में एक साथ देखता है।
मार्क्सवाद की सीमाएं-भारतीय दृष्टि से
भारतीय सभ्यता सदैव बहुलता, विविधता और स्वातंत्र्य में विश्वास करती है। यहां मनुष्य को एक वर्ग में समेटना संभव ही नहीं। भारतीय मन हिंसा के माध्यम से समाज परिवर्तन को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि हमारा दर्शन मनुष्य के भीतर परिवर्तन को अधिक महत्व देता है। इसीलिए यहां क्रांति ‘सशस्त्र संघर्ष’ नहीं, ‘आत्मसंयम’ से पैदा होती है।
मार्क्सवाद की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह मनुष्य को मात्र आर्थिक प्राणी समझता है। जबकि भारतीय दर्शन कहता है कि मनुष्य केवल पेट नहीं, परमात्मा से जुड़ी चेतना है। जहां मनुष्य केवल साधन बन जाता है, वहां समाज कठोर हो जाता है और जहां मनुष्य केंद्र में होता है, वहां संस्कृति का विकास होता है। भारत की साहित्यिक-आध्यात्मिक परंपराओं ने सदा मनुष्य को केंद्र में रखा और यही मार्क्सवाद का सबसे बड़ा प्रतिपक्ष है।
मनुष्य बनाम विचारधारा का प्रश्न
विचारधाराएं समाज का मार्गदर्शन कर सकती हैं, पर मनुष्य को बांध नहीं सकतीं। मार्क्सवाद ने जिस वर्ग-संघर्ष को समाधान माना, वह असल में नए संघर्षों का जन्मदाता बन गया। आज जब विश्व नए मार्ग खोज रहा है तो भारतीय दृष्टि पुन: केंद्र में है, जहां व्यक्ति स्वतंत्र है, समाज समन्वयपूर्ण है और संघर्ष मन के भीतर का है।
इसलिए मार्क्सवाद की आलोचना कोई राजनीतिक आग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य को केंद्र में रखने वाली बौद्धिक चेतना का परिणाम है। विश्व और भारत-दोनों की परंपराएं इस सच को रेखांकित करती हैं कि कोई भी विचारधारा मनुष्य से बड़ी नहीं हो सकती।
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