राजन पारकर
नागपुर के शीतकालीन सत्र की हलकी सी भनक पड़ते ही सरकार को जैसे अचानक विकास, वैभव और विलासिता का दिव्य झटका लग जाता है। मानो पूरे साल राज्य को शीतनिद्रा में रखकर, दिसंबर में ही स्वर्ग का बजट खोलने का उपदेश मिला हो!
राज्य में कुल ३३ मंत्री, पर रविभवन में कॉटेज केवल २४। अब बाकी नौ माननीय नागभवन में डेरा डालेंगे। कोई महाराजा बिना महल का, तो कोई ताजमहल की तलाश में भटकता बादशाह! मगर चिंता किसे?
सरकार तो पहले से ही २३६ करोड़ के ‘अत्याधुनिक’ बंगलों का दिव्य स्वप्न संजोए बैठी है।
और जनता?
उसी की किस्मत है कि वह हर सत्र में अपनी जेब कटवाए और हर साल नए ‘महलों’ के लिए चंदन घिसती रहे!
इतना ही नहीं, भाड़े की इमारतों में चल रहे १२० सरकारी दफ्तरों के लिए ९४ करोड़ का प्रस्ताव भी तैयार।
और उस पर ताज-अधिवेशन आते ही नागपुर में उतरने वाले १८,००० अधिकारी और उनकी १,१५७ गाड़ियों का एक साल का पेट्रोल खर्च
सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए!
सचमुच, नागपुर में तो बारिश का पानी कम और नोटों की नदियां ज्यादा बहती हैं।
अब जरा विडंबना का स्वाद लीजिए- इसी शाही तफरीह के बीच ठेकेदारों ने १५० करोड़ की बकाया राशि से तंग आकर काम बंद कर दिया था! तब जाकर सरकार को ‘तोड़गा’ उर्फ समाधान याद आया।
समझौता भी हुआ, ढोल भी बजे, बयान भी आए। मगर जनता की गाढ़ी कमाई से होने वाली यह उधलपट्टी कौन रोकने वाला?
अधिवेशन के दौरान होने वाले समझौते अब राजनीति के वार्षिक ‘सांस्कृतिक उत्सव’ जैसे लगते हैं, जिसमें सरकार नृत्य करती है और जनता ढोल बजाती है!
सत्र के बहाने १९५३ का नागपुर करार फिर पॉलिश करके निकाला जाएगा—
वही करार, जिसने शहर से राजधानी का मुकुट छीना और बदले में एक माह के स्वतंत्र अधिवेशन का सांत्वना पुरस्कार दिया।
आज वही अधिवेशन सात दिन में निपटा दिया जाता है, वह भी शत-कोटी तिलक लगाकर!
इसे ‘तिलक’ कहना तो सभ्य भाषा है।
विदर्भ के आंदोलक इसकी सरल परिभाषा बताते हैं-‘चूना!’
डर बस इतना है कि इस बार की राजनीतिक गर्मी में यह ‘चूना’ शब्द कहीं गलत सिद्ध न हो जाए!
किसी न किसी भोली आशा में अभी भी कुछ लोग इंतजार कर रहे हैं कि शायद इस बार कुछ विधायक-सरीखे काम भी दिखाई दे जाएं।
पर दृश्य बिल्कुल साफ है—
सत्ता, खर्च, शाही ठाठ और ‘तिलकों’ के इस भव्य महोत्सव में
असली चूना हर बार की तरह जनता को ही लगता है।
जनता का आखिरी प्रश्न सरकार से-
‘अधिवेशन सात दिनों का’ पर सत्ता और खर्च सात जन्मों का क्यों?’
