मुख्यपृष्ठनए समाचारपड़ताल : लापरवाही का ‘जिंदा सबूत’... गोवंडी शताब्दी अस्पताल!

पड़ताल : लापरवाही का ‘जिंदा सबूत’… गोवंडी शताब्दी अस्पताल!

 -मरीज सड़क पर, सेवाएं बंद

-आखिरी मिनट पर रेफर बना शर्मनाक ‘रुटीन’

-एमआरआई-सीटी स्वैâन बाहर से कराने की सलाह

धीरेंद्र उपाध्याय

गोवंडी का पंडित मदन मोहन मालवीय शताब्दी अस्पताल इन दिनों स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली का सबसे ताजा और खतरनाक उदाहरण बन चुका है। दवाएं नदारद, स्टाफ की कमी, आईसीयू बंद और लगातार रेफरल मरीजों को इलाज की बजाय परेशानियां दी जा रही हैं। हालात इतने खराब हैं कि गंभीर मरीजों को आखिरी मिनट पर दूसरे अस्पतालों में भेजना यहां की ‘रुटीन प्रक्रिया’ बन चुका है। हाल ही में कई मरीजों ने शिकायत की कि ईसीजी या सायन के राजावाड़ी अस्पताल भेज दिया जाता है। सिद्दीकी का आरोप है कि मनपा कई सेवाओं को बंद कर रही या आउटसोर्स कर रही है, जिससे अस्पताल की गुणवत्ता गिर चुकी है।
सुविधाएं गायब
बैगनवाड़ी, शिवाजीनगर, मानखुर्द और ट्रॉम्बे जैसे इलाकों के लाखों लोग केवल शताब्दी अस्पताल पर निर्भर हैं। रोज ६००-७०० मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं, लेकिन दवाइयों की भारी कमी के कारण उन्हें निजी दुकानों से महंगी दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं।
डॉक्टरों की कमी से आईसीयू बंद
२१० बेड के अस्पताल में १० आईसीयू और १० एमआईसीयू बेड हैं, लेकिन डॉक्टर नहीं मिलने के कारण आईसीयू फरवरी २०२५ से बंद पड़ा है। इसका खामियाजा कई मरीज भुगत चुके हैं।
हंगामा, मारपीट, सुविधाओं की कमी से हालात बेकाबू
कामकाज की अव्यवस्था ऐसी है कि जनवरी २०२५ में भर्ती से इनकार पर मरीजों ने एक डॉक्टर के साथ गाली-गलौज और मारपीट की कोशिश की। पुलिस बुलानी पड़ी। एक कर्मचारी के अनुसार, सुविधाएं न होने से मरीज गुस्से में आ जाते हैं। रोज टकराव की नौबत बनती है।
मरीज खरीद रहे हैं सर्जिकल किट
मरीज अनाया खान की मां बताती हैं कि सी-सेक्शन के लिए उन्हें इंजेक्शन, दस्ताने, सलाइन सहित पूरा सर्जिकल किट २,५०० रुपए खर्च कर खुद खरीदना पड़ा। फातिमा खान को रक्त आधान ट्यूब तक बाहर से खरीदनी पड़ी। गरीब मरीजों के लिए यह खर्च असंभव है। एक्स-रे जैसे बुनियादी टेस्ट के लिए भी एक-एक घंटे की प्रतीक्षा करना पड़ रहा है।
निजी जांच केंद्रों की सलाह
जीआरडब्ल्यूए सदस्य शेख कहती हैं कि यह संकट नया नहीं, वर्षों पुराना है। कई बार अस्पताल के कर्मचारी मरीज की स्थिति गंभीर बताकर उन्हें तत्काल निजी जांच कराने भेज देते हैं, क्योंकि या तो मशीनें बंद हैं या स्टाफ नहीं।
गर्भवती महिलाएं खतरे में, अंतिम मिनट पर रेफर
अस्पताल की अपर्याप्त सुविधाओं के कारण गंभीर रूप से बीमार गर्भवती महिलाओं को अक्सर अंतिम चरण में राजावाड़ी, केईएम या सायन अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है। कई बार यह देरी मरीज की जान के लिए भारी पड़ती है।
भर्ती से इनकार, जांच बाहर
गोवंडी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन के पैâयाज शेख बताते हैं कि थोड़ा-सा बीपी बढ़ा होने पर भी मरीजों को भर्ती नहीं किया जाता। सिटी स्वैâन की सुविधा पीपीपी मॉडल पर होने के बावजूद मरीजों को अक्सर निजी केंद्रों में जांच कराने की सलाह दी जाती है। कई गरीब परिवारों के लिए यह बोझ असहनीय है।

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