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“सिनेमा मेरे लिए अपनी मिट्टी की कहानियों को जीवंत करने का जरिया है — सिद्धांत राज सिंह”

हिमांशु राज

फिल्म “दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी” को लेकर चर्चा में आए फिल्म के निर्देशक “सिद्धांत राज सिंह” ने सामना के लिए “हिमांशु राज” से कई मुद्दों पर खुल कर बातचीत की उन्होंने बिहार से लेकर अपने मुंबई यात्रा के बारे में कहा कि, ” झारखंड सैनिक स्कूल के अनुशासित माहौल से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस की कक्षाओं तक,का सफ़र मेरे लिए बिल्कुल किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसा रहा है। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने मुंबई में इवेंट मैनेजमेंट का कोर्स किया, जिसने उन्हें सिनेमा की चमकती दुनिया से जोड़ा। इसी दौरान किस्मत ने दरवाज़ा खोला जब उन्हें ‘द स्टोनमैन मर्डर्स’ की टीम से जुड़ने का मौका मिला। अरबाज़ ख़ान, विक्रम गोखले और वीरेंद्र सक्सेना जैसे दिग्गजों के साथ काम करने का यह अनुभव उनके करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।इसके बाद ‘चिंटू जी’ के मुंबई शेड्यूल ने उनके आत्मविश्वास को नई उड़ान दी। ‘काम का प्लॉट’ नाम की फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने बतौर क्रिएटिव प्रोफेशनल इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन असल निर्देशक के रूप में उनका नाम उभरा फ़िल्म ‘फियर ऑफ़ गॉड’ से, जो मुंबई के अंडरवर्ल्ड पर आधारित थी। महीनों की रिसर्च के बाद सिद्धांत ने जाना कि अब अपराध जगत का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है—जहां पहले बंदूकें चलती थीं, अब बिजनेस डील्स होती हैं। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा ने फ़िल्म देखकर कहा, “तुमने सही दिशा में सोचा है,” और यही सिद्धांत के लिए सबसे बड़ी प्रशंसा थी।धर्मा प्रोडक्शन जैसे बड़े बैनर में कदम रखकर सिद्धांत ने मेनस्ट्रीम सिनेमा की गतिशीलता को नज़दीक से देखा। ‘गुड न्यूज़’, ‘जुग जुग जियो’ और ‘सेल्फ़ी’ जैसी फिल्मों में बतौर एडवाइज़र काम करते हुए उन्होंने सीखा कि बड़े प्रोडक्शन में अनुशासन, सामंजस्य और समय प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण हैं। वे मुस्कुराकर कहते हैं, “धर्मा में हर टेक्नीशियन अपना रोल जानता है, इसलिए सेट पर ऊर्जा और पेशेवराना माहौल खुद-ब-खुद बन जाता है।”इन्हीं अनुभवों से निकली नई फ़िल्म ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’, जिसे उन्होंने निर्माता रमिक ठाकुर और लेखक प्रशांत के साथ मिलकर बनाया। कहानी बनारस की पृष्ठभूमि पर है—एक ऐसे शहर की, जहां दो परिवार, दो दृष्टिकोण और दो संस्कृतियाँ आपस में टकराती हैं। एक घर में औरतों की कमी, दूसरे में उनकी अधिकता, और इनके बीच एक लड़का और लड़की का रिश्ता जो पूरी कहानी को हंसी और भावना से जोड़ता है। संजय मिश्रा की उपस्थिति ने फ़िल्म को और गहराई दी, जबकि संवाद लेखक आदेश के अर्जुन की कलम ने कहानी में नाटकीय चमक भर दी।सिद्धांत कहते हैं, “मैं बिहार,गया का हूं,और लिट्टी-चोखा या सत्तू आज भी मेरे भीतर ज़िंदा हैं। वही सादगी, वही देसीपन मेरी फिल्मों की आत्मा है।” उनके लिए सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की कहानियों को आधुनिक पर्दे पर सजीव व जीवंत करने का माध्यम है—जहां हर फ्रेम में यथार्थ, संवेदना और संस्कृति साथ चलती दिखती है।

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