नागपुर की गुलाबी ठंड में विधानमंडल का शीतकालीन सत्र चल रहा है। हालांकि, सत्र की पूर्व संध्या पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के एक बयान से सत्र की ठंड गायब हो गई। मुख्यमंत्री ने कहा, ‘राज्य की वित्तीय स्थिति कठिन है। बहुत दबाव है, लेकिन महाराष्ट्र वित्तीय दिवालियापन की ओर नहीं बढ़ रहा है।’ और शीतकालीन सत्र में महाराष्ट्र के वित्तीय संकट पर गरमा-गरम बहस शुरू हो गई। दरअसल, देखा जाए तो मुख्यमंत्री ने जो सच है, वही कहा। ‘दिवालियापन की ओर बढ़ रहे राज्य का मैं मुख्यमंत्री हूं’ यह कटु सत्य सीधे तौर पर बताए बिना, मुख्यमंत्री ने पत्रकारों के सामने सावधानीपूर्वक अर्धसत्य प्रस्तुत किया। मुख्यमंत्री को वित्तीय दिवालियापन से इनकार करते हुए पत्रकारों को राज्य की वित्तीय स्थिति की भयावहता का सच बताते हुए एक अजीबोगरीब सर्कस करना पड़ा। दिल्ली से लेकर गल्ली तक भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता ऐसी चालों में माहिर हैं। ये मंडली भ्रामक और भ्रमित करनेवाले बयान देकर जनता को बेवकूफ बनाने में माहिर है। खजाने में एक दमड़ी भी नहीं बची है, इधर-उधर से उधारी कर, कर्ज लेकर
सरकार की गाड़ी
जैसे-तैसे धकेली जा रही है, बावजूद इसके सरकार दिवालिया नहीं है, यह डंके की चोट पर सिर्फ भाजपा के मुख्यमंत्री ही कह सकते हैं। महाराष्ट्र को कर्ज के जाल में धकेलने वाली महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री का यह बयान, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के डॉलर और रुपए को लेकर दिए गए बयान जितना ही हास्यास्पद है। जब भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर लगातार गोते लगा रहा था, तब वित्त मंत्री सीतारमण ने अजीबोगरीब तर्क दिया था कि ‘रुपया कमजोर नहीं हो रहा, डॉलर मजबूत हो रहा है।’ ‘तनाव जरूर है, लेकिन दिवालियापन नहीं है!’ मुख्यमंत्री का बयान भी कुछ ऐसा ही है। मुख्यमंत्री के बयान से ज्यादा, अगर हम महाराष्ट्र की मौजूदा आर्थिक तस्वीर देखें और यहां तक कि मुख्यमंत्री के पसंदीदा आंकड़ों पर भी नजर डालें, तो यह साफ हो जाता है कि मुख्यमंत्री वैâसे दिवालियापन को छिपा रहे हैं। महाराष्ट्र पर कर्ज का बोझ आज ९ लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है और मार्च के अंत तक इसके ९ लाख ३२ करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है। राज्य में
आमदनी कम और कर्ज ज्यादा
जैसी भयावह स्थिति पैदा हो गई है। महाराष्ट्र का पिछला कुल बजट ६ लाख १२ हजार २९३ करोड़ था और कर्ज लगभग ९ लाख करोड़ है। कर्ज का आंकड़ा आमदनी से ३ लाख करोड़ ज्यादा है! यानी जेब में बमुश्किल ७ रुपए हैं और १० रुपए बकाया है। बावजूद इसके, अगर मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि यह वित्तीय दिवालियापन नहीं है तो आखिर यह दिवालियापन क्या है? और किस चीज का है? महाराष्ट्र कभी देश का सबसे शक्तिशाली और आर्थिक रूप से सक्षम राज्य माना जाता था, लेकिन ऐसा लगता है कि महागठबंधन सरकार में शामिल तीनों घटक दलों के नेताओं ने महाराष्ट्र को कर्ज के जाल में धकेलने और एक समृद्ध राज्य की इसकी पहचान मिटाने का बीड़ा उठा लिया है। महाराष्ट्र में एक वित्तीय पागलपन है, जहां वित्तीय अनुशासन तोड़कर लोकप्रिय नारों के लिए हजारों करोड़ के कर्ज लिए जा रहे हैं और उन कर्जों को चुकाने के लिए नए कर्ज लिए जा रहे हैं। जबकि राज्य में किसानों से लेकर ठेकेदारों तक आत्महत्याओं का दौर चल रहा है, लाखों करोड़ के ये कर्ज आखिर कहां हैं? मुख्यमंत्री चाहे जितना भी कहने की कोशिश करें कि महाराष्ट्र दिवालियेपन की ओर नहीं बढ़ रहा है, लेकिन सरकार के मुखिया द्वारा कहा गया यह अर्धसत्य कि ‘तनाव जारी है’, ‘दिवालियापन’ की ही अप्रत्यक्ष स्वीकृति है!
