मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : किसान त्रस्त, सरकार मस्त... किसानों के हमदर्द खीर में व्यस्त

पॉलिटिका : किसान त्रस्त, सरकार मस्त… किसानों के हमदर्द खीर में व्यस्त

के.पी. मलिक

पश्चिमी यूपी के बागपत और आसपास के इलाकों में गन्ना किसान जिस संकट से गुजर रहे हैं, वह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित उदासीनता का परिणाम लगता है। करीब एक लाख किसान महीनों से अपने ही गन्ने के भुगतान के लिए भटक रहे हैं। सरकार भुगतान १४ दिन में होने का दावा तो करती है, लेकिन हकीकत में भुगतान १४ दिन तो क्या कई-कई हफ्तों से अटका पड़ा है। किसानों की नाराजगी वाजिब है, पर सत्ता के गलियारों में इसकी कोई गूंज सुनाई नहीं देती। क्योंकि सरकार मस्त है किसान त्रस्त है, किसानों के फर्जी हमदर्द सियासी दल खीर खाने में व्यस्त हैं और किसान नेता अपनी दलाली की दुकान चलाने में व्यस्त हैं।
टूटते किसान!
सरकार गन्ना मूल्य में ३० रुपए की बढ़ोतरी को ऐतिहासिक उपलब्धि बताती है, लेकिन खेत से खरीद केंद्र और फिर चीनी मिल तक गन्ना ढुलाई का खर्च इतना बढ़ा दिया गया कि बढ़ोतरी सिर्फ कागजों में रह गई। किसान को वास्तविक लाभ एक रुपए का भी नहीं मिला। सवाल यह है कि क्या सरकार यह बात नहीं जानती या जानकर भी अनदेखा कर रही है? मिलों द्वारा भुगतान का हाल बताता है कि व्यवस्था जर्जर है। बागपत चीनी मिल पर १८ दिनों का ८ करोड़ रुपए से अधिक बकाया, रमाला चीनी मिल पर २४ दिनों का करीब ४० करोड़ रुपए का भुगतान अटका हुआ है और किनौनी और मलकपुर मिलों ने तो एक रुपए तक का भुगतान शुरू नहीं किया है क्या कारण है कि चीनी मिल प्रबंधन सरकार से कतई खौफ नहीं खाता?
दरअसल, पश्चिम यूपी के ये वही जिले हैं, जहां गन्ना सिर्फ फसल नहीं, बल्कि जिंदगी है। यहां के लगभग ९५ हजार परिवारों के घर की रसोई गन्ने से ही चलती है। जब भुगतान नहीं मिलता तो किसान न सिर्फ आर्थिक संकट में फंसता है, बल्कि उसकी अगली फसल, बच्चों की पढ़ाई, बैंक किश्तें और परिवार की दैनिक जरूरतें सब पर असर पड़ता है, जबकि प्रदेश की योगी सरकार बार-बार कहती है कि गन्ना किसान उसकी प्राथमिकता हैं। लेकिन प्राथमिकता तब साबित होती है जब मिलों पर समय पर भुगतान के लिए दबाव डाला जाए। जब तक सरकार सिर्फ घोषणा करेगी और मिलें अपनी मनमानी चलाएंगी, तब तक किसानों की समस्या खत्म होनेवाली नहीं। यही वह विरोधाभास है, जो किसानों को टूटने पर मजबूर करता है। सरकार तस्वीर सजाती है, जबकि हकीकत किसान भुगतते हैं।
मौन से चिंगारी?
दरअसल, किसानों के नाम पर सियासत करनेवाले दलों का मौन सबसे ज्यादा चुभता है! क्योंकि जब वे सत्ता में नहीं होते हैं तो किसान की लड़ाई लड़ने का खूब नाटक करते हैं, लेकिन जब वो सत्ता के साथ होते हैं किसान को अनदेखा कर सत्ता की मलाई चाटने और खीर खाने का काम करते हैं सरकार में आने के बाद किसान से उनका कोई सरोकार नहीं होता। सबसे चिंता की बात यह है कि जिन नेताओं की राजनीति किसानों के कंधों पर खड़ी है, वे इस मुद्दे पर मौन हैं। भाजपा-रालोद गठबंधन की खुली चुप्पी समझ से परे है। यह वही इलाका है, जहां किसान आंदोलन की परंपरा रही है, जहां किसानों की आवाज कभी दबाई नहीं जा सकी। आज वही आवाज खोती जा रही है। इसके अलावा कथित किसान नेता भी अपनी-अपनी राजनीतिक दुकानें संभालने में व्यस्त हैं। उन्हें भुगतान संकट की फाइलों से अधिक मंच की चमक और तस्वीरों की राजनीति में दिलचस्पी है। किसान परेशान है, लेकिन उसकी लड़ाई लड़नेवाला कोई नहीं दिखता।
मेरा मानना है कि यह सिर्फ किसान के गन्ना मूल्य भुगतान का संकट नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। गन्ना किसान अपनी मेहनत का हक मांग रहा है। वह किसी अतिरिक्त लाभ की मांग नहीं कर रहा, लेकिन जब बार-बार वही वादा टूटता है तो विश्वास भी टूटता है। बागपत और रमाला का बकाया भुगतान संकट सिर्फ दो चीनी मिलों का मामला नहीं। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है कि क्या राज्य की कृषि नीतियां किसानों की तरफ हैं या उद्योगों की? सरकार को समझना होगा कि किसान की नाराजगी धीमी आग की तरह होती है। चुप रहती है, लेकिन एक समय के बाद जब आग भड़कती है। बुझनी मुश्किल होती है, बागपत का मौजूदा हाल उस आग की शुरुआती चिंगारी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कृषि मामलों के जानकार हैं)

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